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गुरुवार, 8 जनवरी 2026

829. किसे ले गई ट्रेन ?



कई लोग थे प्लेटफॉर्म पर,

एक को चढ़ना था,

बाक़ी सब चढ़ाने आए थे।


ट्रेन आई, तो वह चढ़ गया,

जो चढ़ाने आया था,

जिसका कोई इरादा नहीं था

यात्रा पर निकलने का, 

जिसका सामान घर पर रखा था।

 

जिसे चढ़ना था,

उसका सामान बंधा ही रह गया,

वह प्लेटफॉर्म पर बैठा

इंतज़ार कर रहा है अगली ट्रेन का

जो न जाने कब आएगी,

न जाने किसे ले जाएगी।

 

मंगलवार, 30 दिसंबर 2025

828. वह कमरा

 


इन दिनों अजीब सा लगता है वह कमरा।

 

आवाज़ें आती हैं उससे, पर ग़ायब है

वह जानी-पहचानी बुलंद-सी आवाज़,

हँसता है कोई उसमें कभी-कभी,

पर उदास लगता है वह कमरा।

 

खिड़की-रोशनदान तो हैं उसमें,

पर धूप है कि ठिठक जाती है,

हवा है कि फंस के रह जाती है।

 

रोज़ सफ़ाई होती है उसकी,

पर धूल है कि हटती ही नहीं,

चमकती है वहाँ रखी हुई चीज़ें,

पर साफ़ नहीं लगतीं पहले-सी।

 

बिस्तर भी है वहाँ, अलमारी भी,

कुर्सी भी है, तिपाई भी,

पर खाली-खाली सा लगता है,

वह अकेला उदास कमरा।

 

कुछ हो गया है उसे अचानक,

बीमार-सा लगता है वह इन दिनों,

कभी जो अपनी ओर खींचता था,

अब काटने को दौड़ता है वह कमरा।

 

 

 


बुधवार, 10 दिसंबर 2025

827. वह थी

 


वह जब थी,

तो पता ही नहीं था 

कि वह थी। 


वह बताती भी थी,

तो कोई समझता नहीं था 

कि वह थी। 


अब जब वह नहीं है,

तो पता चला है 

कि वह थी,

पर उसे कभी पता नहीं चलेगा 

कि हमें पता चल गया है 

कि वह थी। 


मंगलवार, 2 दिसंबर 2025

826. एक ग़ज़ल

 



क़लम नहीं रही अब भरोसे के लायक़,
बीच ग़ज़ल स्याही जम सी गई है।
मै भी नहीं पहले सा, वह भी नहीं पहले सी,
दूरियाँ मगर कुछ कम सी गई हैं।
मिली थी मुझसे, तो फुलझड़ी थी वो,
छोड़कर गई है, तो बम सी गई है।
नज़र जब से आने लगी मुझे मंज़िल,
रफ़्तार चलने की थम सी गई है।
दिक़्क़तें यहां कुछ कम नहीं फिर भी,
तबीयत यहीं पर रम सी गई है।

गुरुवार, 27 नवंबर 2025

825.रिश्तों की वारंटी

 


नया रिश्ता ऑर्डर करो,

तो ध्यान से करना,

अच्छी तरह ठोक-बजाकर

सोच-समझकर करना।

 

मार्केटिंग से सावधान रहना,

पैकिंग पर मत जाना,

थोड़ा भी शक़ हो,

तो मत लेना डिलिवरी।

 

यह कोई पिज़्ज़ा नहीं है

कि खा लिया और हो गया,

कोई ए. सी. नहीं है

कि चला, तो चला,

नहीं चला, तो नहीं चला।

 

तुम्हें पता भी नहीं चलेगा,

कि कब धीरे-धीरे

तुम्हारी ज़िंदगी का

हिस्सा बन जाएगा रिश्ता।

 

बहुत तकलीफ़ होगी,

जब आएंगी इसमें दरारें,

साबुत नहीं बचोगे तुम भी,

अगर यह टूटा कभी।

 

ऐसे ही होते हैं रिश्ते,

पकड़ लेते हैं कसकर,

नहीं मिलता इनसे

आसानी से छुटकारा,

नहीं होती रिश्तों की

कोई लाइफ़लॉन्ग वारंटी।