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शुक्रवार, 28 सितंबर 2018

३२७.चाय


दार्जीलिंग के चाय बागानों में 
फटे-पुराने कपड़े पहने 
भीषण ठण्ड में कांपता 
एक मज़दूर  जानता है, 
निकट है उसका अंत.

गंगाजल थामे हाथों से 
उखड़ती सांसों के बीच 
उसकी डूबती आँखें मांगती हैं 
दार्जीलिंग के बागानों की 
दो घूँट गर्म चाय.

शुक्रवार, 21 सितंबर 2018

३२६. आदमी


नदी किनारे 
झाड़ियों में खिला
नन्हा-सा फूल,
डाली से जकड़ा,
जन्म से क़ैद,
पर झूमता मुस्कराता।

बिना आराम 
अनवरत बहती नदी,
हमेशा गुनगुनाती,
बिना शिकवा,
बिना शिकायत।

आदमी,
हर हाल में उदास,
सुख में भी,
दुःख में भी,
चलने में भी,
रुकने में भी,
मौत से घबराता,
ज़िन्दगी से परेशान। 


शुक्रवार, 14 सितंबर 2018

३२५. रास्ते


रास्ते,
कहीं कच्चे, कहीं पक्के,
कहीं समतल, कहीं गढ्ढों-भरे,
कहीं सीधे, कहीं घुमावदार,
अकसर पहुँच ही जाते हैं 
किसी-न-किसी मंज़िल पर.

बस, इसी तरह चलते चलें,
गिरते-पड़ते, हाँफते-दौड़ते,
रोज़ थोड़ा-थोड़ा, 
अनवरत,
पहुँच ही जाएंगे आख़िर,
कहीं-न-कहीं,
कभी-न-कभी.

शुक्रवार, 7 सितंबर 2018

३२४. अंत


रात बड़ी कंजूस है,
समेट रही है 
अपने आँचल में 
ओस की बूँदें,
नहीं जानती वह 
कि चले जाना है उसे 
ओस की बूंदों को 
यहीं छोड़कर।

ओस की बूँदें भी 
कहाँ समझती हैं 
कि ज़िंदा हैं वे 
बस सूरज निकलने तक,
सोख लिया जाएगा 
उन्हें भी.

सूरज भी न रहे 
किसी मद में,
ढक लेगा उसे भी 
कोई आवारा बादल,
अगर न ढके तो भी 
डूबना होगा उसे 
अंततः 

शनिवार, 1 सितंबर 2018

३२३. बारिश से


बारिश,अब थम भी जाओ.

भर गए हैं नदी-नाले,
तालाब,बावड़ियां,गड्ढे,
नहीं बची अब तुम्हारे लिए 
कोई भी जगह.

अब भी नहीं रुकी तुम,
तो बनाना होगा तुम्हें 
ख़ुद अपना ठिकाना,
उजाड़ना होगा दूसरों को,
क्या अच्छा लगेगा तुम्हें 
यह सब?
क्या अच्छा लगेगा तुम्हें 
कि लोग तुमसे डरें?

बारिश, 
देखो,हमेशा की तरह सजी है 
आसमान की डाइनिंग टेबल,
पर सूरज नहीं कर पा रहा 
नाश्ता या लंच.

सूरज को ज़रा निकलने दो,
बैठने दो आसमान की मेज़ पर,
बारिश, अब थम भी जाओ.