कमल,
इतना भी मत इतराओ,
मुझमें ही हैं तुम्हारी जड़ें,
तुमसे मैं नहीं,
मुझसे तुम हो।
मैं खिला सकता हूँ
तुम जैसे कई कमल,
ज़िंदा रह सकता हूँ
तुम्हारे बिना भी।
भ्रम में मत रहो,
मैं तुम्हारे पैरों में हूँ,
पर अपने लिए नहीं,
तुम्हारे लिए।
मैं आधार हूँ तुम्हारा,
तुम्हारी ज़मीन हूँ मैं,
मैंने ही बचा रखा है तुम्हें
लहरों में बह जाने से।

वाह!! ऐसे ही तो कोई हमारा आधार है पर हम भूले रहते हैं और ख़ुद को आधारहीन मानकर भयभीत हो जाते हैं
जवाब देंहटाएंबेहद सारगर्भित अभिव्यक्ति।
जवाब देंहटाएंसादर।
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जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार ६ फरवरी २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
सुंदर
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