जितना झुक सकता था,
उससे ज़्यादा झुक गया हूँ मैं,
जीने के लिए अब उठना,
खड़ा होना ज़रूरी है।
और मत झुकाओ मुझे,
ज़रा सीधा होने दो,
इतना झुक चुका हूँ मैं
कि मुझे साफ़-साफ़ दिखने लगा है
अपना ज़रूरत से ज़्यादा झुकना,
तुम्हारा ज़रूरत से ज़्यादा तनना।
जितना झुक सकता था,
उससे ज़्यादा झुक गया हूँ मैं,
जीने के लिए अब उठना,
खड़ा होना ज़रूरी है।
और मत झुकाओ मुझे,
ज़रा सीधा होने दो,
इतना झुक चुका हूँ मैं
कि मुझे साफ़-साफ़ दिखने लगा है
अपना ज़रूरत से ज़्यादा झुकना,
तुम्हारा ज़रूरत से ज़्यादा तनना।
मैं गीता हूँ,
बाइबल हूँ,
क़ुरान हूँ।
मुझे पढ़ो,
मगर वैसे नहीं,
जैसे पढ़ा गया है अब तक।
मुझे थोड़ा पढ़ो,
ज़्यादा समझो,
मुझे अनपढ़ों की तरह पढ़ो,
पढ़े-लिखों की तरह समझो।
बहुत कोशिशों से मैंने
कांटे उगाए हैं खुद में,
पर इसका मतलब यह नहीं
कि अब फूल नहीं खिलते मुझमें।
मेरे पास आओगे,
तो काँटों का सामना करना पड़ेगा,
मैं कमज़ोर-सा पौधा ही सही,
अपने नाज़ुक फूलों की हिफ़ाज़त के लिए
कोशिश तो कर ही सकता हूँ।
वह चलता जाता था
काँटों-भरी राह पर नंगे पैर,
कभी तेज़ धूप में,
कभी गहरे अंधेरे में।
लड़खड़ा जाता था कभी-कभी,
पर मैं उसके कंधों पर
बेफ़िक्र बैठा रहता था,
जानता था कि वह
गिरने नहीं देगा मुझे ।
मैंने महसूस नहीं किए
उसके पाँव के छाले,
उसकी फूलती साँसे,
उसकी दुखती पीठ।
पहली बार मैंने महसूस किया
उसका प्रेम, उसका दर्द,
जब कोई बैठ गया आकर
मेरे कंधों पर।
वह जो कंधों पर उठाता है,
कर्तव्य समझता है अपना,
पर जो कंधों पर बैठता है,
इसे कुछ नहीं समझता
अपने हक़ के सिवा।
बांसुरियों, सज जाओ होंठों पर,
बजो,
पायलों, बंध जाओ पाँवों में,
खनको,
गीतों,चढ़ जाओ भीगी जीभों पर,
गूँजो।
बरस रहा है पानी रिमझिम,
तर हो गई है सूखी मिट्टी,
जुताई के लिए तैयार हैं खेत,
अब गूंजना चाहिए फ़ज़ाओं में
उल्लास में पगा संगीत।
क़तार के आख़िर में खड़ा आदमी
अनंत से अपनी बारी के इंतज़ार में है,
वह क़तार के आख़िर में इसलिए है
कि नए-नए लोग आते गए
और यह कहकर आगे खड़े होते गए
कि हम जहां खड़े हो जाते हैं,
लाइन वहीं से शुरू होती है।
जीतू मुंडा,
मुश्किल रहा होगा तुम्हारे लिए
अपनी बहन को मरते देखना,
उसे क़ब्र में लिटाना,
उसके शव पर मिट्टी डालना,
फिर कोई जंगली फूल चढ़ाना।
ऐसा करते वक़्त
तुमने सपने में भी नहीं सोचा होगा
कि तुम्हें कभी निकालना होगा
क़ब्र से उसका कंकाल।
कैसे चले होगे तुम
बहन को कांधे पर लादे,
कितनी दूर जाना पड़ा होगा तुम्हें,
ज़्यादा भारी रहा होगा
उसके शव से उसका कंकाल।
जीतू मुंडा,
यहाँ मुश्किल है ज़िंदा लोगों के लिए
ख़ुद को ज़िंदा साबित करना,
मुश्किल है लाशों के लिए
ख़ुद को मृत साबित करना,
असंभव है कंकाल के लिए
यह साबित करना
कि वह तुम्हारी बहन है।
जीतू मुंडा,
जिनके कारण तुम कंकाल ढो रहे हो,
वे चल-फिर रहे हैं,
सांस ले रहे हैं,
पर ज़िंदा नहीं हैं।
मत ढोओ अपने कंधों पर
इतना बड़ा बोझ,
सोने दो अपनी बहन को क़ब्र में,
बड़े भोले हो तुम,
इतना भी नहीं जानते
कि नहीं पसीजता लाशों का दिल
कंकालों को देखकर।
सुनो सीता,
अच्छा होता,
अगर रावण से युद्ध आज होता,
न उतना समय लगता,
न उतना कष्ट होता।
न कहीं जाने की ज़रूरत होती,
न बंदर-भालू इकट्ठा करने की,
न समुद्र पर पुल बनाना पड़ता,
बस कुछ मिसाइलें काफ़ी होतीं।
जला देते लंका बिना हनुमान के,
गुप्तचरों से पूछ लेते ज़रूरी ठिकाने,
चुपके से गिरा देते वहाँ बम,
मार देते रावण, कुंभकर्ण, मेघनाद को।
सुनो, सीता,
मैं राम हूँ, मर्यादा पुरुषोत्तम हूँ,
तुम्हारा अपहरण नहीं होता,
तो मैं युद्ध नहीं करता,
पर मेरी जगह कोई और होता,
तो चढ़ाई कर देता बिना कारण,
उठवा लेता लंका का सारा सोना।
एक गोरी-चिट्टी बच्ची,
जो युद्ध में मारी गई,
ईरानी थी,
वह अमेरिका के स्कूल में होती,
तो कहना मुश्किल था
कि वह अमेरिकी नहीं, ईरानी है।
जानता हूँ तुम्हें
नौ महीने हो गए गर्भ में,
पर छटपटाओ मत,
हो सके, तो अंदर ही रहो,
बाहर हवा ज़हरीली है,
ड्रोन, बम और मिसाइलें
तुम्हारे इंतज़ार में हैं।
**
एक ऐसा युद्ध करते हैं,
जिसमें मिसाइलें बरसाएँ फूल,
तोपों की नलियाँ फेंकें गुलाल,
बंदूकों से निकले इत्र,
सिपाही खुरचकर मिटा दें
मुल्कों के बीच खींची लकीरें।
रात को बार-बार चौंकती है,
झटके से उठ जाती है लड़की,
पसीने से लथपथ हो जाती है,
डरकर सहम जाती है लड़की।
पानी के घूंट हलक से उतारती है,
उठकर खिड़की तक जाती है,
चुपके से गली में झाँकती है,
सब कुछ ठीक पाती है लड़की।
फिर से बिस्तर पर आकर
नींद का इंतज़ार करती है,
आज तय करती है लड़की,
कल से टी.वी. नहीं देखेगी,
न ही अख़बार पढ़ेगी लड़की।
एक ख़ूबसूरत-सा ख़्वाब देखा मैंने,
गुलाब के हाथों में गुलाब देखा मैंने।
कहते हैं आँखें उसकी झील सी हैं,
गुलाब में झील, झील में गुलाब देखा मैंने।
न कभी सुना था, न कभी सोचा था,
एक चलता-फिरता गुलाब देखा मैंने।
जहां न खिला था, न खिल सकता था,
उसी सहरा में गुलाब देखा मैंने।
गुलाब नावाक़िफ़ था गुलाब होने से,
उसने माना ही नहीं कि गुलाब देखा मैंने।
जानता हूँ, उसने कांटे देखे मुझमें,
उसे पता है, उसमें गुलाब देखा मैंने।
इस बात से वह नाराज़ है मुझसे,
उसमें काँटा नहीं, गुलाब देखा मैंने।
न नींद आती है, न चैन पड़ता है,
किस मनहूस घड़ी में गुलाब देखा मैंने?