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शुक्रवार, 29 जनवरी 2021

५३०. सुख



रेल की पटरियाँ 

न जाने कब से बिछी हैं 

अपनी जगह पर,

इनपर से रोज़ गुज़रती हैं

बहुत सी रेलगाड़ियाँ.


कभी-कभार कोई आता है,

इनके पेंच कस जाता है,

इनपर हथौड़ा मार जाता है,

फिर भी ये डटी रहती हैं.


दर्द सहकर भी अपनी जगह 

पड़ी रहती हैं रेल की पटरियाँ,

उन्हें महसूस करना होता है 

यात्रियों को उनकी 

मंज़िल तक पहुँचाने का सुख.

बुधवार, 27 जनवरी 2021

५२९. बूँदें



बहुत देर हुई,

थम गई है बारिश,

पर बूँदें हैं 

कि चिपकी हैं पत्तों से.


उन्हें नहीं पता

कि उन्हें उतरना ही होगा,

मिलना ही होगा मिट्टी में,

हारना ही होगा 

धूप से, हवा से. 


बूँदें नहीं जानतीं 

कि इतना ज़्यादा लगाव 

नहीं सुहाता किसी को  

किसी का, किसी से.

रविवार, 24 जनवरी 2021

५२८. असली चमक


आसमान वही है,

चाँद वही है,

सितारे भी वही हैं,

पर बहुत देख लिया तुमने 

खिड़की के पीछे से इन्हें.


अब ज़रा घर से बाहर निकलो,

खुले में आओ,

तुम्हें पता तो चले 

कि जिस आसमान और चाँद को देखकर 

तुम ख़ुश हो लिया करते थे,

वे वास्तव में कितने सुन्दर हैं

और जिन सितारों को देखकर 

तुम्हारी आँखें खुली रह जाती थीं,

उनकी असली चमक तो 

तुमने कभी देखी ही नहीं.

शुक्रवार, 22 जनवरी 2021

५२७.घर की सेहत


बहुत दिनों से बंद है यह घर,

बदबू भर गई है इसमें,

अब खोल दो खिड़कियाँ,

खोल दो रोशनदान,दरवाज़े,

निकाल दो अन्दर की गर्द,

गुस्सा, मनमुटाव , घृणा, 

वह बदला, जो तुम्हें लेना है.


ताज़ी हवा अन्दर आएगी,

तभी बासी बाहर निकलेगी,

घर की सेहत को सुधारना है,

तो बासी हवा का निकास ज़रूरी है.

बुधवार, 20 जनवरी 2021

५२६. चिड़िया से



चिड़िया,

क्यों चीं-चीं कर रही हो,

कौन है जो सुनेगा तुम्हें,

किसे फ़ुर्सत है इतनी,

अगर सुनना भी चाहे,

तो इस भीषण कोलाहल में 

किसके कानों तक पहुँच पाएगी 

तुम्हारी कमज़ोर सी आवाज़?


चिड़िया,

कुछ नहीं मिलेगा तुम्हें इस शहर में,

घोंसला बनाने की जगह तक नहीं,

घुट-घुट कर मर जाओगी यहाँ 

मेरी मानो, गाँव लौट जाओ.