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शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

852. उसके हिस्से में

 


वह खाना अच्छा बनाती थी,
उसके हाथों में जादू था,
चटखारे लेकर खाते थे घरवाले,
तारीफ़ करते थे उसके खाने की।
वह खाना इतना अच्छा बनाती थी
कि उसके हिस्से में तारीफ़ आती थी,
पूरा खाना कभी नहीं आता था।


8 टिप्‍पणियां:

  1. और वह कड़ाही में लगी खुरचन से ही पेट भर लेती थी अपना, हाँ, होता था ऐसा पहले, अब भी शायद कहीं होता होगा, मार्मिक रचना!

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  2. Wah!!!! Kitne kam shabdon mein kitni gehri baat!!!! - How do we know

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  3. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में सोमवार 20 एप्रिल, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!

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  4. बहुत खूब. मुझे लगा यह मेरी माँ की कहानी है.

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  5. Wahhh
    बनाने वाला कब खा पाता है भला

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  6. आपकी ये छोटी सी कविता बड़ा गहरा सच बोल देती है। आपने एक ही लाइन में उस औरत की पूरी कहानी रख दी, जो सबको खिलाती है लेकिन खुद अधूरी रह जाती है। पढ़ते ही मन में हल्की सी कसक उठती है और सोचने पर मजबूर करती है कि हम अपने घर में क्या देख रहे हैं और क्या नजरअंदाज कर रहे हैं।

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