मुझे लगता है
कि हर घर में
एक खूँटी होनी चाहिए,
ख़ासकर हर उस घर में,
जहाँ कोई बड़ा-बूढ़ा रहता है,
जिसके लिए न कमरों में जगह है,
न आँगन में, न बालकनी में.
उसे भी जगह मिलनी चाहिए,
किसी खूँटी पर ही सही,
जहाँ उसे लटकाया जा सके,
जब तक कि वह मर न जाए.
मुझे लगता है
कि हर घर में
एक खूँटी होनी चाहिए,
ख़ासकर हर उस घर में,
जहाँ कोई बड़ा-बूढ़ा रहता है,
जिसके लिए न कमरों में जगह है,
न आँगन में, न बालकनी में.
उसे भी जगह मिलनी चाहिए,
किसी खूँटी पर ही सही,
जहाँ उसे लटकाया जा सके,
जब तक कि वह मर न जाए.
माँ थाली में आटा लेती है,
मिलाती है उसमें थोड़ा-सा नमक,
थोड़ी-सी अजवाइन, थोड़ा-सा घी
और गूँध देती है सब कुछ एक साथ.
माँ थोड़े-से आलू लेती है,
टुकड़े करती है उनके
और छौंक देती है
प्याज,मिर्च,मसालों के साथ.
माँ भर देती है डिब्बे में
पूरियाँ,भाजी और थोड़ा-सा अचार,
रख देती है थैले में पानी के साथ
और पकड़ा देती है मुझे जाते-जाते.
भरपेट नाश्ता करके
मैं निकलता हूँ सफ़र पर,
मगर गाड़ी में बैठते ही
नज़र जाने लगती है थैले पर.
मैं अक्सर महसूस करता हूँ
कि जब भी माँ खाना बांधती है,
मुझे भूख बहुत लगती है.
अक्सर मैं रातों को चौंक जाता हूँ,
नींद जो टूटती है, तो जुड़ती ही नहीं,
दिन में सुनी गई बातों के ख़ंजर
रात के सन्नाटे में बेहद क़रीब लगते हैं.
जो हथियार दिन में चलते हैं,
रातों को बहुत ज़ख़्म देते हैं,
मैं हर रोज़ मर जाता हूँ,
हर रोज़ बच भी जाता हूँ.
ऐसे तिलस्मी ख़ंजर भी होते हैं,
तभी जाना, जब वे मुझपर चले.
रिटायरमेंट की अगली सुबह
मैं अच्छे मूड में था,
अख़बार खोल रखा था,
इत्मीनान से पढ़ रहा था,
बीच-बीच में गर्म चाय की
चुस्कियाँ भी चल रही थीं.
सोचा,बेटी,जो बड़ी हो गई थी,
उससे ख़ूब बातें करूंगा,
सालों बाद फ़ुर्सत मिली थी,
सालों की क़सर पूरी करूंगा.
अचानक वह अंदर से आई
और सर्र से निकल गई,
अब जब मेरे पास फ़ुर्सत थी,
उसके पास वक़्त नहीं था.
पिता की मौत के अरसे बाद
मायके आना हुआ बहन का,
किसी ने उसे बुलाया ही नहीं
कि कहीं हिस्सा न मांग ले.
अपने साथ लेकर आई
कपड़े,चॉकलेट, मिठाई, मेवे
और न जाने क्या-क्या,
हंस-हंस कर बांटती रही
सुबह से शाम तक सब में.
अगली सुबह लौट गई,
बिन बुलाई मेहमान जो थी,
गाड़ी में चढ़ते समय बोली,
इतना मत डरो मुझसे,
नहीं चाहिए मुझे कोई हिस्सा,
हाँ, कभी कोई ज़रूरत हो,
तो मुझे बता देना,
याद रखना,
तुम्हारी बहन हूँ मैं,
मुझे पराया मत समझना.