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शुक्रवार, 24 मार्च 2017

२५३. मैं और वो

शहर की सुंदर लड़की,
तेज़-तर्रार,
नाज़-नखरेवाली,
साफ़-सुथरी,
सजी-धजी,
शताब्दी ट्रेन की तरह 
सरपट दौड़ती.

मैं, गाँव का लड़का,
सीधा-सादा, भोला-भाला,
पटरी पर खड़ा हूँ,
जैसे कोई पैसेंजर ट्रेन.

उसे मुझसे आगे निकलना है.

शुक्रवार, 17 मार्च 2017

२५२. उलझन

आजकल मैं उलझन में हूँ.

देख नहीं पाता खुद को
आईने में,
सुन नहीं पाता
अपनी ही आवाज़,
रोक नहीं पाता खुद को 
चलने से.

सोता हूँ,
तो लगता है,
जाग रहा हूँ,
जागता हूँ,
तो लगता है,
सो रहा हूँ.

आजकल मैं उलझन में हूँ,
अक्सर रात में 
मैं उठ जाता हूँ,
तसल्ली कर लेता हूँ 
कि मैं बस सोया हूँ,
अभी ज़िन्दा हूँ.

शुक्रवार, 10 मार्च 2017

२५१.होली

होली में तुम्हें 
जो ख़त लिखने बैठा,
तो अचानक स्याही फ़िसल गई,
नीला हो गया सब कुछ- 
कुरता -पाजामा, उँगलियाँ -
और अपनी ही उंगलियों ने 
चेहरा भी रंग डाला थोड़ा-सा.

ऐसा लगा जैसे तुमने 
चुपके से रंग दिया हो मुझे.

ख़त तो मैं लिखूंगा ही,
पर जब तक तुम पढ़ोगी,
स्याही सूख चुकी होगी,
रंग नहीं पाएगी 
तुम्हारा कुरता,
तुम्हारी सलवार,
तुम्हारा दुपट्टा,
तुम्हारी उँगलियाँ.

पर ख़त पढ़ते-पढ़ते 
जब तुम्हारे चेहरे का रंग 
गुलाबी हो जाय,
तो समझ लेना 
कि मैंने तुम्हें 
और तुमने मुझे 
रंग दिया है,
समझ लेना 
कि हमारी होली 
आख़िर मन गई है. 

शुक्रवार, 3 मार्च 2017

२५०. मैं और पुराना टी.वी.

सालों-साल इस टी.वी. ने दिखाई हैं तुम्हें
रंगीन जीवंत तस्वीरें,
पंहुचाई हैं तुम तक 
प्रिय-अप्रिय आवाजें.

सालों-साल तुम्हें सिखाया है
इस पुराने टी.वी. ने,
तुम्हारा दिल लगाया है इसने.

अब इस टी.वी. के रंग 
कुछ फ़ीके पड़ गए हैं,
इसकी आवाज़ में थोड़ी 
खरखराहट आ गई है,
पर तुम्हें लगता है 
कि अब भी बहुत दम है इसमें.
थोड़ी मरम्मत हो जाय,
तो घर में रखा जा सकता है इसे,
काम आ सकता है यह पुराना टी.वी.

तुम्हारे टी.वी. से तो बेहतर हालत है मेरी,
फिर मुझे निकालने की बातें क्यों?
एक जीते-जागते से इतनी बेरुख़ी क्यों ?

मुझसे तो ज़्यादा किस्मतवाला 
तुम्हारा यह पुराना टी.वी. है,
काश, मैं इंसान नहीं,टी.वी.होता.

शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

२४९. चले गए

बरसों से जो साथ थे, अचानक बिछड़ गए,
जाने कहाँ से आए थे, कहाँ चले गए.

आसां नहीं होता दिल की बात कह देना,
मैं सोचता ही रह गया,वे उठकर चले गए.

अरसे बाद लौटकर वे घर को आए हैं,
लौटना ही था, तो फिर किसलिए चले गए.

न जाने मेरी नज़रों में क्या दिखा उनको,
वे तमतमाए,उठे,महफ़िल से चले गए.

मत सोचो,क्या होगा,जब तुम नहीं होगे,
कितने यहाँ आए, कितने चले गए.