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शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2016

२३३. दिवाली में दृष्टि परिवर्तन




दियों की रोशनी कुछ कम है इस बार,
तेल तो उतना ही है,
बाती भी वैसी ही है,
हवाएं भी नहीं हैं उपद्रवी,
फिर भी कम है रोशनी.

कहीं ऐसा तो नहीं 
कि रोशनी उतनी ही है,
पर आँखें कमज़ोर हो गई हैं
या यह भी हो सकता है 
कि आँखें कमज़ोर नहीं हुईं,
मन में ही कुछ फ़र्क आ गया है.

इस बार की दिवाली में 
सब कुछ पहले जैसा है,
कुछ भी नहीं बदला है,
पर दियों की रोशनी कुछ कम है.

मुझे लगता है 
कि इस बार की दिवाली में 
दृष्टि परिवर्तन की ज़रूरत है. 

शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2016

२३२. करवा चौथ पर चाँद से


अरे निगोड़े चाँद,
इतना भी मत तड़पाओ,
अब निकल भी जाओ.

कब से बैठी हूँ इस आस में 
कि तुम निकलोगे तो कुछ खाऊँगी,
पर तुम हो कि जैसे 
नहीं निकलने की कसम खाए बैठे हो.

रोज़ तो बड़ी जल्दी आ जाते हो,
खिड़की से झाँकने लगते हो,
आज जब तुम्हारी ज़रूरत है,
तो नखरे दिखा रहे हो,
तड़पा रहे हो.

क्या तुम भी पुरुषों की तरह हो,
हमारी वेदना से अनजान,
क्या तुम भी उन जैसे हो,
हमारी बेबसी पर हंसनेवाले.

चलो, बहुत हुआ चाँद,
अब निकल भी जाओ,
तुम्हारा क्रूर मज़ाक कहीं 
तुम्हें महंगा न पड़ जाय.

कहीं ऐसा न हो 
कि महिलाएं व्रत तोड़ने के लिए 
तुम्हारा इंतज़ार करना छोड़ दें,
कहीं ऐसा न हो 
कि करवा चौथ से तुम 
निष्कासित कर दिए जाओ. 

सोमवार, 10 अक्टूबर 2016

२३१. दशहरा


चलो, आज शाम चलते हैं,
देखते हैं रावण का जलना,
बुराई पर अच्छाई की विजय,
देखते हैं कि किस तरह 
राख हो जाते हैं दस सिर,
किस तरह मारा जाता है कुम्भकर्ण,
किस तरह बरसती हैं चिंगारियां 
बेबस मेघनाद के बदन से.

चलो, आज शाम चलते हैं
दशहरे के मैदान में,
जहाँ हज़ारों लोग जमा होंगे,
बजाएँगे तालियाँ, देखेंगे तमाशा,
फिर घर लौट आएँगे.

यही होता है दशहरे में हर साल,
हर साल जलते हैं कागज़ के पुतले,
फूटते हैं पटाखे,
कभी किसी दशहरे में 
यह ख़याल ही नहीं आता  
कि असली रावण,कुम्भकर्ण,मेघनाद 
हमारे अन्दर ही कहीं छुपे हैं,
जो हर साल दशहरे में
बच जाते हैं जलने से. 

शुक्रवार, 30 सितंबर 2016

२३०. प्यार

बहुत चाहता हूँ मैं तुम्हें,
ख़ुद से भी ज़्यादा,
कोई फ़िल्मी डायलाग नहीं है यह,
हकीक़त है,
जैसे किस्से कहानियों में
राजा की जान तोते में होती थी,
मेरी तुममें है.

सब कहते हैं
कि तुम्हारे लिए मेरा प्यार
उनकी समझ से परे है,
सब कहते हैं
कि तुम इतना प्यार डिज़र्व नहीं करते,
सच कहूं ,
तो मुझे भी यही लगता है,
पर प्यार यह देखकर तो नहीं होता
कि कौन उसके लायक है
और कितना.

मैं जानता हूँ
कि तुम उतने प्यार के हक़दार नहीं
जितना मैं तुम्हें करता हूँ,
पर मैं चाहूं भी
तो कुछ नहीं कर सकता,
क्योंकि यह मैं नहीं,
मेरा दिल है,
जो तुम्हें प्यार करता है.

शुक्रवार, 23 सितंबर 2016

२२९. पिता

पिता, तुम क्यों गए अचानक,
भला ऐसे भी कोई जाता है?
न कोई इशारा,
न कोई चेतावनी,
जैसे उठे और चल दिए.
तुम थोड़ा बीमार ही पड़ते,
तो मैं थोड़ी बातें करता,
थोड़ी माफ़ी मांगता,
तुम्हें बताता 
कि मैंने कब-कब झूठ बोला था,
कब-कब विश्वास तोड़ा था तुम्हारा,
कि मैं वह नहीं था,
जो तुम सोचते थे कि मैं था.
विस्तार से बताता तुम्हें वह सब
जो बताना चाहता था,
समय नहीं होता जो तुम्हारे पास,
तो कम-से-कम इतना ही कह देता 
कि पिता, मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ.