दियों की रोशनी कुछ कम है इस बार,
तेल तो उतना ही है,
बाती भी वैसी ही है,
हवाएं भी नहीं हैं उपद्रवी,
फिर भी कम है रोशनी.
कहीं ऐसा तो नहीं
कि रोशनी उतनी ही है,
पर आँखें कमज़ोर हो गई हैं
या यह भी हो सकता है
कि आँखें कमज़ोर नहीं हुईं,
मन में ही कुछ फ़र्क आ गया है.
इस बार की दिवाली में
सब कुछ पहले जैसा है,
कुछ भी नहीं बदला है,
पर दियों की रोशनी कुछ कम है.
मुझे लगता है
कि इस बार की दिवाली में
दृष्टि परिवर्तन की ज़रूरत है.



