top hindi blogs

शुक्रवार, 20 जून 2014

१३०. आजकल

आजकल मैं कभी-कभी 
तुम्हारे बिस्तर पर लेट जाता हूँ,
मुझे लगता है, मेरी बगल में, 
मेरे साथ, तुम भी लेटे हो, 
चुपचाप...

मैं जब तुम्हारे कमरे में जाता हूँ,
मुझे तुम्हारी सांसें सुनाई देती हैं,
तुम्हारे पसंदीदा सीरियल देखता हूँ,
तो तुम्हारी हंसी सुनाई देती है.

आजकल मैं कभी-कभी 
उन पगडंडियों पर निकल पड़ता हूँ,
जहाँ तुम चला करते थे,
मुझे लगता है,
तुम मेरे साथ चल रहे हो,
बस कुछ पूछने ही वाले हो 
और मैं उत्तर देने को बेताब.

आजकल कभी-कभी 
मैं तुम्हारी पुरानी कमीज़ पहन लेता हूँ,
मुझे लगता है,
तुम मेरे बहुत करीब हो,
बिल्कुल मुझसे चिपके हुए.

अब वह पुरानी कमीज़ 
जगह-जगह से फट गई है,
उसके रंग भी उड़ गए हैं,
रफ़ू के लायक नहीं रही वह,
अब उसे पहनना संभव नहीं.

तुम परदेस क्या गए, 
वहीँ के हो गए,
सालों बीत गए तुम्हें देखे,
अब तो चले आओ.

शुक्रवार, 13 जून 2014

१२९. सूरज



पेड़ों के पीछे से झांकता सूरज
कितना अच्छा लगता है माँ !

देखो, पत्ते हिल रहे हैं,
जैसे रोक लेना चाहते हों 
सूरज की हर किरण,
पर सूरज है कि
पत्तों से छनकर
ज़मीन को छू ही लेता है.

ठीक ही तो है,
भला क्यों मिले सूरज 
सिर्फ़ किसी एक को,
हर किसी के हिस्से में 
उसकी किरण होनी चाहिए.

बस एक बात है माँ,
जो मुझे समझ नहीं आई -
आखिर एक ही सूरज 
इतने पेड़ों के पीछे से 
कैसे झाँक लेता है ?

शनिवार, 31 मई 2014

१२८. पानी सूरज से


मत सोखो मुझे,
यहीं मिट्टी में बहने दो,
प्यासे होंठों को मेरी ज़रूरत है,
बीज प्रस्फुटित होंगे मुझसे,
हरियाली को मेरी ज़रूरत है.

मुझे नहीं जाना कहीं और,
मुझे नहीं उड़ना आसमान में,
मैं नीचे ही ठीक हूँ,
जीवन को मेरी ज़रूरत है.

चलो, नहीं मानते,तो सोख लो मुझे,
ले चलो मुझे आसमान में,
मैं वहाँ खुश नहीं रहूँगा,
इधर से उधर भटकता रहूँगा 
और जैसे ही मौका मिला,
बरस जाऊँगा,
फिर से मिट्टी में मिल जाऊँगा.

रविवार, 25 मई 2014

१२७. आह्वान




बूंदों, आओ, बरस जाओ,
दूर कर दो ताप धरती का,
प्यासों की प्यास बुझा दो.

हर गांव, हर शहर,
हर जाति, हर धर्म,
स्त्री-पुरुष, छोटे-बड़े -
सब पर बरस जाओ.

गरीब की कुटिया पर बरसो,
धनी के महल पर भी,
खेत-खलिहान पर बरसो,
सूखे रेगिस्तान पर भी,
भूखों-नंगों पर बरसो,
संपन्न और तृप्त पर भी.

मेरे पड़ोसी पर बरसो,
थोड़ा-सा मुझ पर भी.

बूंदों, आज ऐसे बरसो 
कि कोई बाकी न रहे,
कोई न कह सके 
कि उसके साथ 
आज फिर भेदभाव हुआ.

शनिवार, 17 मई 2014

१२६. नदी


बहुत बह चुकी मैं हरे-भरे मैदानों में,
खेल चुकी छोटे-सपाट पत्थरों से,
देख चुकी हँसते-मुस्कराते चेहरे,
पिला चुकी तृप्त होंठों को पानी.

अब कोई भगीरथ आए,
मुझे रेगिस्तान में ले जाए,
बहने लगूं मैं तपती रेत पर,
बांटने लगूं थोड़ी ठंडक,थोड़ी हरियाली.

मैं निमित्त बनूँ 
पथराई आँखों में कौन्धनेवाली चमक का,
मुर्दा होंठों पर आनेवाली मुस्कराहट का.

मैदानों में आराम से चलकर 
समुद्र में मिल जाने 
और जीवित रहने से तो अच्छा है 
कि मैं रेगिस्तानी रेत में बहूँ 
और वहीँ मर जाऊं.