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मंगलवार, 29 सितंबर 2026

870. मालगाड़ी




मैं मालगाड़ी हूँ,

धीरे-धीरे चलती हूँ,

हर पैसेंजर, हर एक्सप्रेस को 

चुपचाप रास्ता देती। 


मेरी राह में भी आते हैं 

बहुत सारे स्टेशन,

पर किसी को नहीं रहता   

मेरा इंतज़ार,

किसी को फ़र्क़ नहीं पड़ता 

मेरे आने, न आने से। 


कोई सूचना नहीं दी जाती 

मेरे पहुँचने या छूटने की,

अफ़रा-तफ़री नहीं मचती 

मेरे स्टेशन पहुँचने पर। 


ऊँघते रहते हैं कुली अपनी जगहों पर, 

चायवाले नहीं संभालते अपनी केतलियाँ,

हॉकर नहीं दौड़ते उठकर,

मनचले नहीं झाँकते खिड़कियों से। 


अपमान, अनदेखी को अनदेखा कर,

मैं बढ़ती रहती हूँ मंज़िल की ओर,

जहां हो रहा होता है 

उस सामान का बेसब्री से इंतज़ार,

जो मैं चुपचाप ढो रही हूँ। 

5 टिप्‍पणियां:

  1. बिना किसी यश या दिखावे की परवाह किए, धैर्य और निरंतरता के साथ अपने कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा देती आपकी कविता लाज़वाब है सर।
    सादर।
    ------

    जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार २ अक्टूबर २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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  2. बहुत सुंदर सृजन ओंकार जी । मालगाड़ी फिर भी निरंतर अपनें काम में लगी रहती है ....

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  3. मालगाडी महत्वपूर्ण होते हुए भी 'इंतेजार रहित' रहता है - बखूबी उकेरा है इस जीवन दर्शन को

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