मेजी** की आंच मद्धिम है,
चिड़वा थोड़ा कच्चा,
दही खट्टा है,
गुड़ का रंग अच्छा है,
पर स्वाद वैसा नहीं है।
गुनगुना तो रहे हैं सभी,
पर गीतों में रस नहीं है,
नाच भी रहे हैं, पर पाँवों में
वह थिरकन नहीं है।
सब कुछ पहले-सा है,
पर ध्यान से देखूँ,
तो बदला-बदला,
बुझा-बुझा सा है ।
समय लगता है मौसम को
करवट बदलने में,
ज़्यादा दूर नहीं है रंगाली बिहू,
न जाने कितना अलग होगा वह
इस साल के भोगाली बिहू से ।
*भेलाघर- एक अस्थाई झोपड़ी, जो भोगाली बिहू के अवसर पर बनाई जाती है।
**मेजी- पवित्र अग्नि

बिहू नृत्य.. दही -चिड़वा .., असमिया संस्कृति..,अति सुन्दर ॥
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर चित्रण
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