शनिवार, 24 जून 2017

२६५.ज़रूरी

इश्क में थोड़ा झुकना भी ज़रूरी है,
लम्बा चलना है, तो रुकना भी ज़रूरी है.

यह सोच कर तमाचा सह लिया मैंने,
कुछ पाना है अगर, तो खोना भी ज़रूरी है.

आवाज़ दूँ कभी, तो देख लेना मुड़ के,
जीना है अगर, तो उम्मीद भी ज़रूरी है.

पत्थर जो फेंको, तो ज़रा ज़ोर से फेंको,
कोशिश जो की है, तो नतीज़ा भी ज़रूरी है.

कोई डर है दिल में, तो दिल ही में रखो,
चेहरे से हौसला झलकना ज़रूरी है.

शुक्रवार, 16 जून 2017

२६४.रोना मना है

अगर किसी बात पर 
तुम्हारा दिल भर आए,
आंसू तुम्हारी पलकों तक चले आएं,
तो उन्हें पलकों में ही रोक लेना,
छलकने मत देना.

एक तो कमज़ोरी की निशानी है रोना
और कमज़ोर दिखना अच्छा नहीं है,
दूसरे, रोना सख्त़ मना  है,
क्योंकि तुम्हारे रोने से 
दूसरों की हंसी में 
ख़लल पड़ता है.

शनिवार, 10 जून 2017

२६३. आओ, चलो

आओ, अब चलो.

वह पहले सा प्रभाव,
पहले-सी सुनवाई,
तुम्हारी एक हांक पर 
दौड़े चले आना सब का,
तुम्हारी एक डांट पर 
साध लेना मौन,
तुम्हारा हर निर्णय 
पत्थर की लकीर समझा जाना -
अब बीते दिनों की बातें हैं.

देखते-ही-देखते 
छोटे हो गए हैं बड़े,
बड़े हो गए हैं समझदार,
तुम्हारी सलाह,
तुम्हारे निर्णय,
तुम्हारे विश्लेषण -
सब पर अब 
एक प्रश्न-चिन्ह लग गया है.

उठो, पहचानो सच को,
महसूसो बदली हुई फ़िज़ां,
समेटो अपनी चौधराहट,
आओ, अब चलो.

शुक्रवार, 26 मई 2017

२६२. भगवान से



भगवान,मैं मानता हूँ 
कि तुम बहुत बड़े इंजीनियर हो.

तुमने अरबों-खरबों लोग बनाए,
हर एक दूसरों से अलग,
हर एक का अलग चेहरा-मोहरा,
हर एक की अलग कद-काठी,
हर एक का अलग रंग-रूप.

पर शायद कुछ युद्ध टल जाते,
शायद कुछ भाईचारा बढ़ जाता,
शायद दुनिया कुछ रहने लायक हो जाती,
शायद दुःख कुछ कम हो जाता,
अगर तुम ऐसा नहीं करते.

भगवान, मुझे लगता है 
कि तुमने अरबों-खरबों लोग बनाए,
यहाँ तक तो ठीक था,
पर हर एक को अलग बनाकर 
तुमने अपनी प्रतिभा का इस्तेमाल 
ज़रूरत से थोड़ा ज़्यादा कर दिया.

भगवान, क्या तुम्हें नहीं लगता 
कि जो दुनिया तुमने ख़ुद बनाई,
वह तुम्हारी विलक्षण प्रतिभा की 
शिकार हो गई.

शुक्रवार, 19 मई 2017

२६१. पैसेंजर और राजधानी


धीरे-धीरे बढ़ रहा हूँ 
मैं तुम्हारी ओर,
जैसे बढ़ती है 
कोई पैसेंजर गाड़ी 
हर स्टेशन पर रुकती,
यात्रियों को चढ़ाती-उतारती.

लगता है,
यूँ ही रुकते-रुकाते,चलते-चलाते,
तुमसे हो ही जाएगी मुलाक़ात,
पर मेरा मुंह चिढ़ाती,
राजधानी ट्रेन की तरह 
तुम सर्र से निकल मत जाना.

शुक्रवार, 12 मई 2017

२६०. बोल

बोल, किस बात का डर है तुझे,
जो तेरे पास है, उसे खोने का
या उसे, जो तेरा हो सकता है?

बोल, क्यों चुप है तू,
कौन सा ताला है तेरे मुंह पर,
प्यार का, डर का या लालच का?

बोल, किस दुविधा में है तू,
क्या है, जो तेरे ज़मीर से बढ़कर है,
क्या है, जो तेरी इज्ज़त से क़ीमती है?

बोल, क्या चाह है तेरे मन में,
क्या इतनी छोटी है तेरी चादर 
कि समा नहीं सकते उसमें तेरे पांव?

क्या हुआ तेरी ज़बान को?
देख, निकला जा रहा है वक़्त,
मुंह से नहीं, तो आँखों से ही बोल,
बोल, कुछ तो बोल.

शनिवार, 6 मई 2017

२५९.बिकाऊ

वह जो बाज़ार में नहीं है,
यह मत समझना
कि बिकाऊ नहीं है.

ग़लतफ़हमी में है वह,
ग़लतफ़हमी में हैं सभी 
कि उसे ख़रीदना नामुमकिन है.

कभी कोई ख़रीदार आएगा,
उसकी ऐसी क़ीमत लगाएगा,
जैसी उसने सोची न होगी,
जो डाल देगी उसे दुविधा में,
तोड़ देगी उसका संकल्प.

अंततः उसे झुकना होगा,
उसे मानना ही होगा 
कि यहाँ सब बिकाऊ हैं,
जो बाज़ार में हैं, वे भी,
जो नहीं हैं, वे भी.

शनिवार, 29 अप्रैल 2017

२५८. रेलगाड़ी

दूर अँधेरे में चमकती एक बत्ती,
पहले एक छोटे-से बिन्दु की तरह,
फिर धीरे-धीरे बढ़ती हुई,
पास, और पास आती हुई.


जूतों के तस्मे अब बंधने लगे हैं,
खड़े हो गए हैं सब अपनी जगह,
उठा लिए हैं बक्से हाथों में,
थाम ली हैं बच्चों की उँगलियाँ.

अब अँधेरा दूर होगा,
मंज़िल की ओर कूच करेंगे सब,
बस कुछ ही देर की बात है,
रेलगाड़ी प्लेटफ़ॉर्म पर पहुँचनेवाली है.

शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017

२५७. वह दुनिया

जी करता है,
फिर से संकरी पगडंडियों पर चलूँ,
लहलहाते धान के खेतों को देखूं,
फूलों पर पड़ी ओस की बूंदों को छूऊँ,
ताज़ी ठंडी हवा जी भर के पीऊँ.

जी करता है,
टीन के छप्पर पर रात को बरसती 
बारिश का संगीत सुनूँ,
आँगन में लगे आम के पेड़ पर 
उग आए बौरों को देखूं.

जी तो बहुत करता है,
पर अब वह दुनिया कहाँ से लाऊँ,
जिसे इस दुनिया के लिए 
मैंने बहुत पहले बदल दिया था.

शुक्रवार, 14 अप्रैल 2017

२५६. मंज़िल

मुसाफ़िर,
न जाने क्यों मुझे लगा 
कि मैं तुम्हारी मंज़िल हूँ.

इसमें तुम्हारा क़सूर नहीं,
मेरी ही ग़लती थी 
कि मुझे ऐसा लगा,
पर जब लग ही गया,
तो मुसाफ़िर,
बस इतना कर देना 
कि जब मेरी गली से गुज़रो,
तो मेरी ओर देख लेना.

अगर देख कर मुस्करा सको,
तो और भी अच्छा,
मुझे लगेगा 
कि मेरी ग़लतफ़हमी से 
तुम नाराज़ नहीं हो,
मुझे लगेगा 
कि मैं तुम्हारी मंज़िल नहीं था,
पर मुझे मेरी मंज़िल मिल गई.

शुक्रवार, 7 अप्रैल 2017

२५५. अहम्

मुझे पता था
कि तुम दरवाज़े पर हो,
तुम्हें भी पता था 
कि मुझे पता है.

मैं इंतज़ार करता रहा 
कि तुम दस्तक दो,
तुम सोचती रही 
कि मैं बिना दस्तक के 
खोल दूं दरवाज़ा.

दोनों ही चाहते थे 
कि दरवाज़ा खुल जाय,
पर न तुमने दस्तक दी,
न मैंने दरवाज़ा खोला. 

शनिवार, 1 अप्रैल 2017

२५४. नीयत

अर्जुन, तुम्हें याद है ?
द्रोणाचार्य ने मुझसे 
गुरु-दक्षिणा में 
अंगूठा माँगा था,
उस ज्ञान के लिए,
जो उन्होंने मुझे दिया नहीं,
मैंने उनसे लिया था.

दुर्भावना थी उनके मन में,
कोई विराट उद्देश्य नहीं था,
बस एक चाह थी
कि कोई निकल न जाय 
तुमसे आगे....
इसके लिए चाहे जो करना पड़े-
अनीति,अधर्म,छल-कपट.

अर्जुन, नादान था मैं,
सच में उन्हें गुरु मान बैठा,
उनकी चालाकी से बेख़बर 
झट से अपना अंगूठा दे दिया,
उस गुरु-दक्षिणा का वे क्या करते?
क्या भला होना था उससे किसी का?

अर्जुन, अंगूठा खोकर मैंने जाना 
कि देना तभी चाहिए,
जब माँगनेवाले की नीयत ठीक हो.


शुक्रवार, 24 मार्च 2017

२५३. मैं और वो

शहर की सुंदर लड़की,
तेज़-तर्रार,
नाज़-नखरेवाली,
साफ़-सुथरी,
सजी-धजी,
शताब्दी ट्रेन की तरह 
सरपट दौड़ती.

मैं, गाँव का लड़का,
सीधा-सादा, भोला-भाला,
पटरी पर खड़ा हूँ,
जैसे कोई पैसेंजर ट्रेन.

उसे मुझसे आगे निकलना है.

शुक्रवार, 17 मार्च 2017

२५२. उलझन

आजकल मैं उलझन में हूँ.

देख नहीं पाता खुद को
आईने में,
सुन नहीं पाता
अपनी ही आवाज़,
रोक नहीं पाता खुद को 
चलने से.

सोता हूँ,
तो लगता है,
जाग रहा हूँ,
जागता हूँ,
तो लगता है,
सो रहा हूँ.

आजकल मैं उलझन में हूँ,
अक्सर रात में 
मैं उठ जाता हूँ,
तसल्ली कर लेता हूँ 
कि मैं बस सोया हूँ,
अभी ज़िन्दा हूँ.

शुक्रवार, 10 मार्च 2017

२५१.होली

होली में तुम्हें 
जो ख़त लिखने बैठा,
तो अचानक स्याही फ़िसल गई,
नीला हो गया सब कुछ- 
कुरता -पाजामा, उँगलियाँ -
और अपनी ही उंगलियों ने 
चेहरा भी रंग डाला थोड़ा-सा.

ऐसा लगा जैसे तुमने 
चुपके से रंग दिया हो मुझे.

ख़त तो मैं लिखूंगा ही,
पर जब तक तुम पढ़ोगी,
स्याही सूख चुकी होगी,
रंग नहीं पाएगी 
तुम्हारा कुरता,
तुम्हारी सलवार,
तुम्हारा दुपट्टा,
तुम्हारी उँगलियाँ.

पर ख़त पढ़ते-पढ़ते 
जब तुम्हारे चेहरे का रंग 
गुलाबी हो जाय,
तो समझ लेना 
कि मैंने तुम्हें 
और तुमने मुझे 
रंग दिया है,
समझ लेना 
कि हमारी होली 
आख़िर मन गई है. 

शुक्रवार, 3 मार्च 2017

२५०. मैं और पुराना टी.वी.

सालों-साल इस टी.वी. ने दिखाई हैं तुम्हें
रंगीन जीवंत तस्वीरें,
पंहुचाई हैं तुम तक 
प्रिय-अप्रिय आवाजें.

सालों-साल तुम्हें सिखाया है
इस पुराने टी.वी. ने,
तुम्हारा दिल लगाया है इसने.

अब इस टी.वी. के रंग 
कुछ फ़ीके पड़ गए हैं,
इसकी आवाज़ में थोड़ी 
खरखराहट आ गई है,
पर तुम्हें लगता है 
कि अब भी बहुत दम है इसमें.
थोड़ी मरम्मत हो जाय,
तो घर में रखा जा सकता है इसे,
काम आ सकता है यह पुराना टी.वी.

तुम्हारे टी.वी. से तो बेहतर हालत है मेरी,
फिर मुझे निकालने की बातें क्यों?
एक जीते-जागते से इतनी बेरुख़ी क्यों ?

मुझसे तो ज़्यादा किस्मतवाला 
तुम्हारा यह पुराना टी.वी. है,
काश, मैं इंसान नहीं,टी.वी.होता.

शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

२४९. चले गए

बरसों से जो साथ थे, अचानक बिछड़ गए,
जाने कहाँ से आए थे, कहाँ चले गए.

आसां नहीं होता दिल की बात कह देना,
मैं सोचता ही रह गया,वे उठकर चले गए.

अरसे बाद लौटकर वे घर को आए हैं,
लौटना ही था, तो फिर किसलिए चले गए.

न जाने मेरी नज़रों में क्या दिखा उनको,
वे तमतमाए,उठे,महफ़िल से चले गए.

मत सोचो,क्या होगा,जब तुम नहीं होगे,
कितने यहाँ आए, कितने चले गए.

शनिवार, 18 फ़रवरी 2017

२४८.अच्छी पत्नी

अच्छी पत्नियाँ वे होती हैं,
जो अपने पतियों के 
पीछे-पीछे चलती हैं,
जैसा वे कहें, वैसा करती हैं,
उनकी पसंद का पकाती हैं,
घर में सब खा लेते हैं,
तब खाती हैं.

अच्छी पत्नियाँ वे होती हैं,
जिनके पति तय करते हैं 
कि उन्हें कहाँ जाना है,
किससे बात करना है,
कब जगना है,
कब सोना है.

अच्छी पत्नियाँ वे होती हैं,
जो डांट-फटकार 
यहाँ तक कि मार भी 
चुपचाप सह लेती हैं
और इस तरह मुस्कराती हैं,
जैसे कुछ हुआ ही न हो.

अच्छी पत्नी न इंसान होती है,
न देवी,
कठपुतली होना 
अच्छी पत्नी होने की 
पहली शर्त है.

शनिवार, 11 फ़रवरी 2017

२४७.पिता

पिता, कभी-कभी जी करता है 
कि कोई ज़ोर से डांटे,
पूछताछ करे,टोकाटाकी करे,
कहे कि आजकल तुम्हारे 
रंग-ढंग ठीक नहीं हैं.
घर से निकलूं तो कहे,
जल्दी वापस आ जाना,
देर से लौटूं तो कहे,
मेरी बात ही नहीं सुनते,
बिना कहे जाऊं तो पूछे,
कहाँ गए थे,
किसी के साथ जाऊं तो पूछे,
उसका नाम क्या है?

पिता, जब तुम पूछते थे,
तो सोचता था, क्यों पूछते हो,
अब तुम नहीं हो,
तो तरस गया हूँ,
उसी डांट-फटकार, टोका-टाकी,
पूछताछ के लिए.

पिता, तुम गए तो मैंने जाना
कि बड़ा होकर भी 
बच्चा होने का सुख 
आख़िर क्या होता है.

शनिवार, 4 फ़रवरी 2017

२४६. गाँव का स्टेशन

गाँव के लोग उठ जाते हैं 
मुंह अँधेरे,
पर गाँव का स्टेशन सोया रहता है.
उसे जल्दी नहीं उठने की,
उठ भी जाएगा तो करेगा क्या?
हांफते-हांफते 
दोपहर बाद पंहुचेगी 
गाँव में रुकनेवाली 
इकलौती पैसेंजर ट्रेन 
और फिर सन्नाटा.
कभी गाड़ी लेट हो जाती है 
या रद्द हो जाती है,
तो अकेलापन महसूस करता है 
गाँव का स्टेशन,
बहुत उदास हो जाता है 
गाँव का स्टेशन,
सोचता है कि अगर वह नहीं होता 
तो भी गाँव को 
शायद ही कोई फ़र्क पड़ता.

शुक्रवार, 27 जनवरी 2017

२४५.गुठली




चूसकर फेंकी गई जामुन की एक गुठली 
नरम मिट्टी में पनाह पा गई,
नन्ही-सी गुठली से अंकुर फूटा,
बारिश के पानी ने उसे सींचा,
हवा ने उसे दुलराया.

धीरे-धीरे एक पौधा,
फिर पेड़ बन गई 
जामुन की वह छोटी-सी गुठली,
चूसनेवाले बेख़बर रहे.

अब हज़ारों-लाखों जामुनों से,
लदा है यह विशाल पेड़,
आ पहुंचे हैं पेड़ के आस-पास
अब फिर से वही लोग,
जिन्होंने कभी जामुन को चूसकर 
बेरुख़ी से कहीं फेंक दिया था. 

शनिवार, 21 जनवरी 2017

२४४. वे महिलाएं

बल्लियों के सहारे,
सिर पर बोझ लिए,
आसमान की ओर 
धीरे-धीरे बढ़ती 
दुबली-पतली महिलाओं को देखकर 
मुझे बड़ा डर लगता है.

कहीं बल्ली टूट गई तो,
कहीं पैर फ़िसल गया तो,
बुरे-बुरे ख्याल 
मन में आते हैं.

और उस वक़्त तो 
मेरा दिल धक्क से रह जाता है,
जब वे अपनी गरदन को 
हल्का-सा मोड़कर 
मुस्करा देती हैं.

शनिवार, 14 जनवरी 2017

२४३. जाड़े की धूप


दिसम्बर की कंपकंपाती ठण्ड में,
जब निकलता है सूरज,
तो आ जाती है जान में जान,
बहुत सुहाता  है अकड़े बदन पर 
धूप का स्पर्श,
शायद यही होता है स्वर्ग.

शिव, अपना तीसरा नेत्र खोलो,
तो कुछ ऐसे देखना 
कि जल जाय एक-एक कर सब कुछ,
पर बची रह जाय आख़िर तक 
जाड़े की यह गुनगुनी धूप.

शुक्रवार, 6 जनवरी 2017

२४२. गाँव का स्टेशन




मैं गाँव का स्टेशन,
अकेला, अनदेखी का मारा,
पटरियां गुज़रती हैं मेरे सामने से,
गाड़ियाँ सरपट दौड़ जाती हैं,
मैं बस देखता रह जाता हूँ.

दिनभर में एकाध पैसेंजर 
हालचाल पूछ लेती है रूककर,
फिर निकल जाती है आगे,
मेरा प्लेटफ़ॉर्म सूना रह जाता है.

ओ राजधानी, रोज़ नहीं,
तो कभी-कभी ही रुक जाया करो,
दुआ-सलाम कर लिया करो,
यात्री चढ़ाने-उतारने के लिए नहीं,
तो क्रॉसिंग के लिए ही सही,
तकनीकी ख़राबी के बहाने ही सही,
पांच साल में एक बार ही सही,
जैसे चुनाव के दिनों में कभी-कभी 
राजधानीवाले गाँव चले आते हैं.