शनिवार, 30 सितंबर 2017

२७९. समीक्षा

सुन्दर शब्द चुने हैं तुमने,
खूबसूरती से सजाया है उन्हें,
लय का ध्यान रखा है पूरा,
पर कवि, मुझे नहीं लगता 
कि तुमने जो लिखा है,
उसे कविता कहा जाना चाहिए.

कवि, अगर अपनी कविता में तुम
किसी आम आदमी की दास्तान,
किसी मजदूर की व्यथा,
किसी किसान की वेदना,
किसी गृहिणी का दुःख
या किसी बच्चे की मुस्कराहट का ज़िक्र करते,
तो भी मुझे पक्का यकीन नहीं है
कि तुम जो लिखते, वह कविता होती.

कवि,कविता के लिए एक ही कसौटी है मेरी,
समीक्षा का एक ही मानक है मेरा,
तुम्हारे लिखे को  मैं 
कविता तभी मानूंगा,
जब वह मेरे दिल को छू ले.

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (02-010-2017) को
    "अनुबन्धों का प्यार" (चर्चा अंक 2745)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. जी सुंदर अभिव्यक्ति ओंकार जी।

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