शुक्रवार, 28 दिसंबर 2012

६२.सांता से

सांता, अगली बार क्रिसमस पर आओ 
तो कुछ अलग-से तोहफे लाना.

अगली बार लाना एक सड़क,
जिस पर चल सके दीदी बेखौफ़,
एक बाज़ार जिससे गुज़रने पर 
फब्तियां न कसी जांय उस पर, 
एक गली जो गहरे अँधेरे में भी
उसे लगे महफूज़... 

और सांता, मैंने सुना है कि
कुछ बसों में बैठकर रात को 
जानवर शिकार पर निकलते हैं,
बहुत डर लगता है उनसे दीदी को,
बहुत चिंता होती है माँ-पिताजी को.

इस बार क्रिसमस पर थोड़ा समय लेकर आना,
इन जानवरों को चुन-चुन कर साथ ले जाना,
ध्यान रखना, कहीं वापस न लौट आएं ये.

सांता, अगले क्रिसमस पर मेरे लिए 
टाफियां, केक और खिलौने मत लाना,
बस उतना कर देना जितना मैंने कहा है,
अभी तो तुम्हारे पास एक साल का वक्त है.

रविवार, 23 दिसंबर 2012

६१.सूरज

सूरज, कहाँ-कहाँ से चले आते हो तुम 
बेगाने घरों में अपनी किरणें बिखेरने,
दरवाज़ों,खिड़कियों, रोशनदानों से,
यहाँ तक कि छोटे-छोटे सूराखों से.

कितनी परवाह है तुम्हें ठिठुरनेवालों की,
कितने प्यार से लुटाते हो तुम ऊष्मा,
महल-झोंपड़ी, खेत-खलिहान, वन-उपवन,
कुछ भी तो नहीं है तुम्हारे स्नेह से परे.

जब कभी तुम कोहरे से घिर जाते हो,
कितना छटपटाते हो बाहर निकलने को,
अपनी बेबसी पर रोना आता होगा तुम्हें 
ठिठुरनेवालों का ख्याल सताता होगा तुम्हें.

सूरज, तुम कभी थकते क्यों नहीं,
सूरज, तुम कभी रुकते क्यों नहीं,
ठिठुरनेवाले जब यहाँ कम्बलों में दुबके होंगे,
तुम कहीं और चमक रहे होगे.

सूरज,क्या अपने बारे में भी सोचा है तुमने,
क्या बांटने का तुम्हारा काम कभी खत्म होगा,
क्या अपने लिए भी कुछ बचाया है तुमने,
तुम्हारी दरियादिली की कोई तो सीमा होगी ?



शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

६०. असंतुलन

आजकल मेरे सिर का बोझ 
मेरी गर्दन से सहन नहीं होता, 
सिर से अलग तो हो नहीं सकती,
बस दर्द से कराहती रहती है.

मेरे घुटनों से सहन नहीं होता 
आजकल मेरे बदन का बोझ,
साथ रहना तो मजबूरी है,
बस दर्द से परेशान रहते हैं.

मेरी ज़रूरतों का बोझ नहीं उठता 
आजकल मेरी मेहनत से,
मेरी ख्वाहिशों का बोझ 
मेरे ईमान से सहन नहीं होता.

इन दिनों मैं संतुलन में नहीं हूँ,
लड़ रहा हूँ अपने आप से,
आजकल मेरे ही दो हिस्से 
एक दूसरे के विरोध में हैं.

शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012

५९.मैं और तुम

कभी-कभी मुझे लगता है 
कि मैं तुम्हारी तरह चलूँ,
तुम्हारी तरह हँसू,
तुम्हारी तरह सोचूँ,
तुम्हारी तरह बोलूँ,
क्यों न मैं तुम बन जाऊँ,
तुम्हें भी लगता है 
कि क्यों न तुम मैं बन जाओ.

देखो न, इस कोशिश में,
न मैं तुम बन पा रहा हूँ 
और न तुम मैं,
बल्कि मैं मैं नहीं रहा 
तुम तुम नहीं रही.

अच्छा होगा कि 
मैं बस मैं बना रहूँ
और तुम बस तुम.

मैं तुम बनूँ 
और तुम मैं 
इससे तो अच्छा है 
कि मैं और तुम
हम बन जाएँ.

शुक्रवार, 30 नवंबर 2012

५८. गृहिणी और चपातियाँ

गृहिणी बना रही है चपातियाँ,
जो फूल उठती हैं हर कोने से,
बन जाती हैं नर्म,मुलायम,जायकेदार.

कभी-कभी जब कहीं खो जाती है गृहिणी,
तो फट जाती हैं फूलती हुई चपातियाँ,
चिपक जाते हैं उनके पेट पीठ से,
फिर कभी नहीं फूलतीं चपातियाँ.

गृहिणी सोचती है,क्यों नहीं फटती वह
इन चपातियों की तरह,
न जाने कितनी जगह है उसके अंदर 
कि वह  फूलती ही चली जाती है.

कभी-कभी गृहिणी को लगता है,
बस बहुत हुआ, अब और नहीं,
अब तो वह फट के ही मानेगी,
पर वह फट नहीं पाती,
थोड़ा और फूल के रह जाती है.

शुक्रवार, 23 नवंबर 2012

५७.डाकिया



अरे निगोड़े डाकिए,
आजकल तुम देर से क्यों आते हो?
क्या घोड़े बेचकर सोते रहते हो 
या अफीम खाकर पड़े रहते हो?

तुम्हारी साईकिल धीरे क्यों चलती है,
क्या टायरों में हवा कम हो गई है?
नुक्कड़ पर आते ही बीड़ी क्यों सुलगाते हो,
घर से फूंककर क्यों नहीं आते?

थैला भर चिट्ठियाँ लाते हो,
एक मुझे देने में जान क्यों निकलती है?
क्यों तुम्हें ख्याल नहीं आता 
कि सुबह से कोई तुम्हारे इंतज़ार में है?

कहीं-न-कहीं कुछ-न-कुछ तो गड़बड़ है,
मैं डाकबाबू से शिकायत करूंगी,
तुमसे अच्छा तो वो पुराना डाकिया था,
जो कभी-कभार उनका खत तो लाता था.


रविवार, 18 नवंबर 2012

५६. मेरे अलावा

आजकल जिससे भी मिलता हूँ,
उसमें कमी नज़र आती है मुझे,
किसी का चेहरा-मोहरा नहीं जंचता
तो किसी की चाल-ढाल,
किसी का चाल-चलन चुभता है,
तो किसी के बोलने का अंदाज़,
किसी के मुंह की दुर्गन्ध नहीं सुहाती,
तो किसी के पसीने की बदबू.

आजकल जल्दी उकता जाता हूँ मैं,
बना नहीं पाता किसी को भी अपना,
भागता फिरता हूँ हर किसी से,
बस खुद के साथ रहता हूँ मैं.

आजकल बहुत परेशान हूँ मैं,
यही सोचता रहता हूँ 
कि बाकी सब वैसे क्यों नहीं 
जैसा मैं हूँ,
मेरे अलावा ऐसा कोई क्यों नहीं 
जो मुझे अच्छा लगे.

शनिवार, 10 नवंबर 2012

५५. इस बार की दिवाली

इस बार दिवाली पर अंधेरों में चलें.

उन अंतड़ियों से मिलें,जो कुलबुलाती हैं रोटी को,
उन आँखों से मिलें, जो घबराती हैं रौशनी से,
उन कानों से मिलें, जो तरसते हैं संगीत को,
उन होठों से मिलें, जो थरथरा कर रह जाते हैं.

इस बार दिवाली पर झुकी गर्दनों से मिलें,
उन जुबानों से मिलें, जो उगल न पाईं ज़हर,
उन रोंगटों से मिलें, जो खड़े रहे हमेशा,
उन दांतों से मिलें,जो कटकटा नहीं पाए.

इस बार अनउगी मूंछों से मिलें,
उन बाजुओं से मिलें, जो वज़न से डरते हैं,
उन पाँओं से मिलें, जो पहुंचे नहीं मंजिल तक,
उन दिलों से मिलें, जो डर-डर कर धड़कते हैं.

उन उँगलियों से मिलें, जो उठीं खुद की तरफ,
उन घुटनों से मिलें, जो कराहते रहे दर्द से,
उन आंसुओं से मिलें, जो बह नहीं पाए,
उन मुस्कराहटों से मिलें, जो होठों तक नहीं पंहुचीं.

इस बार चलती-फिरती लाशों से मिलें,
जिंदगी ढो रहे कंकालों से मिलें,
उन चेहरों से मिलें,जिन्होंने ओढ़ी है मुस्कराहट,
उन निशानों से मिलें, जो चोट से बने हैं.

इस बार दिवाली पर अंधेरों में चलें,
साथ में ले चलें-
उम्मीद के दिए,
हिम्मत की बातियाँ,
इरादों का तेल 
और प्यार की माचिस,
देखते हैं, अंधेरों में कितने दिए जलते हैं.

शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

५४.तान

कान्हा, कब से खामोश है तुम्हारी बांसुरी,
कोई मीठी तान छेड़ो ना,
वन-उपवन,नदी-तालाब छोड़ो,
अब बस्तियों में आओ ना.

इंतज़ार में हैं लाखों देवियाँ,
जिनके कानों को झिड़कियों की
आदत सी पड़ गई है,
तिरस्कृत,उपेक्षित,अपमानित-
उनके कानों में थोड़ा शहद घोलो ना.

कान्हा, एक ऐसी तान छेड़ो
कि जाग उठे उनकी जीजिविषा,
अंगड़ाई ले उनमें कोई आशा,
कि खून खौल उठे उनका.

एक तान जो फूँक दे उनमें नई जान,
जगा दे उनका आत्म-सम्मान,
भगा दे सारा डर, सारी दुविधा,
करा दे उनकी खुद से पहचान.

बहुत देर हो गई कान्हा,
अब बस दौड़े चले आओ,
रख लो अपने होठों पर मुरली
और छेड़ दो एक ऐसी तान 
कि सब-की-सब लांघ जायं देहरी,
कि सब-की-सब राधा बन जायं.

शुक्रवार, 26 अक्तूबर 2012

५३.चिड़िया

चिड़िया, बहुत अच्छा लगता है
सुबह-सुबह मेरी खिड़की पर
तुम्हारा ज़ोर-ज़ोर से,
अधिकार से चहचहाना.

मैं आँखें बंद करके 
महसूस करता  हूँ तुम्हारी आवाज़, 
फिर निहारता हूँ तुम्हें 
जब तक तुम फुर्र नहीं हो जाती.

चिड़िया, तुम खूब खिड़की पर आया करो,
खूब चहचहाया करो,
यहाँ तक कि रातों को भी,
नींद उड़ा दो मेरी 
ताकि चैन आ जाय मुझे.

ईंट-पत्थर के इस जंगल में 
कहाँ दिखती हो तुम,
दिखती भी हो तो गुमसुम,
चिड़िया,आजकल तुम्हारी आवाज़ 
सुनाई कहाँ पड़ती है ?

शुक्रवार, 19 अक्तूबर 2012

५२.मिट्टी

अच्छी-भली पड़ी थी मैं
अपने शांत कोने में,
मुलायम घास के नीचे,
पहाड़ी की गोद में.

तुमने फावड़ा चलाया,
विस्थापित किया मुझे,
तोडा-फोड़ा, कीचड़ बनाया,
फिर छोड़ दिया यूँ ही.

अब ज़रा रहम खाओ,
गागर बना दो मुझे,
जिसमें पानी भरकर 
गांव की औरत 
रख ले मुझे सर पर 
या कोई सुन्दर मूरत 
जिसे सजा दे कोई मंदिर में.

चलो, कोई मामूली-सा खिलौना बना दो,
जिससे बच्चे खेलें कुछ दिन,
फिर तोड़ दें ठोकर मारकर 
या फेंक दें कूड़ेदान  में.

कुछ तो आकार दो मुझे,
अर्थ दो मेरे जीवन को,
पर्वत और घास से अलग होकर
कुछ तो बन जाऊं मैं 
किसी के कुछ तो काम आऊं मैं.

रविवार, 14 अक्तूबर 2012

५१. गुमशुदा

कल रात सपने में 
कुछ विचार चले आए 
मेरे पास भूले-भटके.
मैंने उन्हें रोका,
कविता में ढाला,
बस कलम-दवात लेकर 
कागज़ पर उतारने ही वाला था 
कि कविता गायब हो गई.
न जाने कहाँ खो गई,
बहुत खोजा, पर मिली ही नहीं.
ध्यान रखना,
कहीं दिखे तो बताना,
पर इतना याद रखना 
कि वह कविता मेरी है, सिर्फ मेरी,
किसी और की नहीं.
अगर कहीं मिल जाय,
तो ईमान बनाए रखना,
मुझे हिफाज़त से सौंप जाना.

रविवार, 30 सितंबर 2012

५०.बारिश

जब आकाश में बादल छाए,
लगा कि तुम रूठ गई,
फिर अचानक बिजली चमकी,
जैसे एक झलक मिली 
और फिर तुम गायब.

जब बादल जोर से टकराए, 
लगा, मेरी किसी बात पर 
तुम्हें गुस्सा आ गया.

कभी-कभार का तुम्हारा थोड़ा सा प्यार,
जैसे अचानक बूंदा-बांदी हुई 
और बस...

सूख रही हैं उम्मीदें,
अब तो तरस खाओ,
मेरे छप्पर पर एक बार 
जम के बरस जाओ.

शनिवार, 22 सितंबर 2012

४९. चपातियाँ और गृहिणी

जल रहा है चूल्हे पर तवा,
सेंक रही है चपातियाँ गृहिणी.

सोच रही है, उसे भी सेंका जाता है 
इसी तरह उलट-पलटकर हर रोज,
पर लगता है पूरी तरह सिंकी नहीं वह,
वरना सिंकने  के बाद कहाँ लौटती हैं 
वापस गर्म तवे पर चपातियाँ.

गृहिणी सोचती है,
उससे ज्यादा भाग्यवान हैं चपातियाँ,
जो कभी लापरवाही से जल जाती हैं,
कम-से-कम मुक्त तो हो जाती हैं.

एक वह है, जो न सिंकती है,
न जलती है, न राख होती है,
बस सुर्ख लाल तवे पर
हर समय चढ़ी रहती है.

शनिवार, 15 सितंबर 2012

४८.कोरा कागज़

कोरा पड़ा हूँ न जाने कब से,
अब तो भरो मुझे,
लिख डालो कोई सुन्दर कविता,
कोई दमदार कहानी
या कोई असरदार लेख.

यह सब मुश्किल हो 
तो अपशब्द भी चलेंगे,
या कुछ शब्द जो वाक्य न बनें,
कुछ वर्ण जो शब्द न बनें.

आड़ी-तिरछी रेखाएँ भी चलेंगीं,
यहाँ तक कि छिड़की हुई स्याही भी,
पर उपेक्षा सहन नहीं होती,
कम-से-कम मुझे फाड़ तो दो.

गुरुवार, 6 सितंबर 2012

४७.जूता

बहुत बुरा लगा मुझे,
जब उसने पहली बार पावों में डालकर
मुझे धूल,मिट्टी और कीचड़ में घसीटा.

अपमानित महसूस किया मैंने,
बहुत कसमसाया,बहुत कुनमुनाया,
यहाँ तक कि उसके मुलायम पावों को 
कहीं-कहीं से काट खाया,
पर वह ढीठ बना रहा,
मुझे ऊपर उठने ही नहीं दिया.

अब मैं अपमान का आदी हो गया हूँ,
न कसमसाता हूँ, न कुनमुनाता हूँ,
न काट खाने की कोशिश करता हूँ,
बस उसके पावों की हिफाज़त करता हूँ,
उसके आराम का ख्याल रखता हूँ.

कभी-कभी वह मेरी धूल झाड़ देता है,
मुझ पर पालिश कर देता है,
मैं सम्मानित महसूस करता हूँ,
मारे खुशी के मैं दमक उठता हूँ.

सोमवार, 27 अगस्त 2012

४६. पेड़

कभी-कभी ऐसा क्यों लगता है
कि बीज से निकलकर 
डालियों,टहनियों, फूल-पत्तों के साथ
मैं जिस तरह से फैला,
उससे अलग तरह से फैलता 
तो शायद अच्छा होता.

ज़रुरी तो नहीं था छितर जाना 
फैलकर छायादार बन जाना,
अगर सीधे-सीधे ऊपर निकलता 
तो शायद आसमान छू लेता,
कम-से-कम आस-पास के पेड़ों से 
नीचा तो नहीं रहता.

अगर बीज थोड़ा बेहतर होता,
मिट्टी थोड़ी मुलायम होती,
सही खाद मिल जाती,
पानी थोड़ा और मिल जाता,
तो जहाँ पहुँचने में मुझे सालों लगे,
शायद महिनों में वहाँ पहुँच जाता.

अब इंतज़ार है 
कि कोई लकडहारा आए,
मुझे पूरी तरह काट डाले,
या कोई तूफ़ान आए,
मुझे धराशायी कर जाए,
मैं फिर किसी बीज में समाऊँ,
एक बार फिर अपनी किस्मत आज़माऊँ.

सोमवार, 20 अगस्त 2012

४५. चाह

जब कभी मैं कहीं से गुज़रता हूँ 
और कोई आईना सामने आ जाता है,
तो खुद-ब-खुद मेरे कदम रुक जाते हैं.

एक पल को मैं ठहर जाता हूँ,
निहार लेता हूँ खुद को,
ठीक कर लेता हूँ बाल,
(जो पहले से ठीक होते हैं)
और फिर चल पड़ता हूँ आगे.

आईना न हो, कहीं  ठहरा पानी हो,
जिसमें अपना अक्स देखा जा सके,
तो भी मेरे कदम रुक जाते हैं,
निहारना नहीं भूलता मैं खुद को.

अपने आप में मुझे ऐसा क्या दिखता है,
जिसे निहारने की चाह कभी नहीं मिटती?

बुधवार, 15 अगस्त 2012

४४.कुंभ

जिंदगी भर जो पाप किए थे,
सारे धो लिए थे मैंने 
पिछले कुंभ में.
तब से बहुत नेक काम किये हैं,
अब धोने को नहीं हैं कुछ खास पाप.
अगले साल फिर कुंभ आएगा 
और यूँ ही चला जाएगा.
फिर बारह साल बाद मिलेगा 
पाप धोने का मौका.

मैं बहुत जल्दी में हूँ,
निपटाने हैं बहुत सारे पाप,
ताकि कुछ तो हो धोने को 
अगले साल कुंभ में.

शनिवार, 4 अगस्त 2012

४३.डर

बिल्कुल पसंद नहीं मुझे तुम्हारे नाक-नक्श,
न ही बोलने का तुम्हारा अंदाज़,
तुम्हारी आवाज़ कानों में चुभती है,
बेढंगी लगती है तुम्हारी चाल,
उठने-बैठने खाने-पीने का तुम्हारा तरीका,
तुम्हारा हंसना, तुम्हारा रोना,
कुछ भी नहीं सुहाता मुझे.


बात-बात पर मुझसे चिपकने की तुम्हारी कोशिश,
हर वक्त मेरा ध्यान खींचने की तुम्हारी ललक,
बहुत नागवार गुज़रती है मुझे.


फिर भी मैं चुप रहूँगा,
कभी नहीं ज़ाहिर करूँगा 
अपने मन की बात,
क्योंकि मैं जानता हूँ 
कि तमाम कमियों के बावज़ूद
तुम मुझसे बहुत प्यार करती हो.


सब कुछ सह सकता हूँ मैं,
पर नहीं बर्दाश्त कर सकता 
उस प्यार का खो जाना 
जो तुम्हारे दिल में मेरे लिए है.

शनिवार, 28 जुलाई 2012

४२.माँ

जब तुम नहीं रहोगी
तो कौन बंद कराएगा टी.वी.
ताकि बहराते कानों को सुन सके 
ट्रेन की सीटी की आवाज़.


कौन झांक-झांक कर देखेगा
खिड़की के परदे की ओट से 
कि स्टेशन से आकर कोई रिक्शा
घर के बाहर रुका तो नहीं.


कौन कहेगा कि आज खाने में 
भरवां भिन्डी ज़रूर बनाना,
कौन कहेगा कि चाय में 
चीनी बहुत कम डालना.


कौन बतियाएगा घंटों तक,
पूछेगा छोटी से छोटी खबर,
साझा करेगा हर गुज़रा पल
सुख का या दुःख का.


जब मैं हँसूंगा तो कौन कहेगा,
अब बस भी करो,
मेरी आँखें कमज़ोर ही सही,
पर क्या मैं नहीं जानती 
कि तुम दरअसल हँस नहीं रहे 
हँसने का नाटक कर रहे हो. 

शनिवार, 21 जुलाई 2012

४१.सफ़ेद झूठ

सब सराहते हैं मेरे नाक-नक्श,
सब कहते है अच्छा लगता हूँ मैं,
पर यह आईना क्यों टांग अड़ाता है,
क्यों कहता है हर रोज बार-बार 
कि तुम बहुत बदसूरत हो,
इतने कि मैं भी नहीं देखना चाहता तुम्हें.


चलो, मैं भी नहीं देखूँगा कभी आईना,
जो इतना सफ़ेद झूठ बोलता है,
कैसे मान लूं मैं कि सारे लोग गलत हैं 
और यह बेजान आईना सही है?

शुक्रवार, 13 जुलाई 2012

४०. दूध और गृहिणी

भगोने में उबल रहा है दूध,
गृहिणी देख रही है एकटक
अपने अंदर ही अंदर उबलता
अपमान और अनदेखी का गुस्सा.


भगोने पर लगे ढक्कन से
ठहरता नहीं उफनता दूध,
पर गृहिणी का गुस्सा रुका है
शर्म,डर और संस्कार के ढक्कन से.


उफन-उफन के गिर रहा है दूध
किसी विकराल झरने की तरह,
अब तो उसने बुझा भी दी है
चूल्हे में जल रही आग.


गृहिणी सोचती है,
क्या वह भी उफनेगी कभी,
क्या वह भी बुझा सकेगी कभी,
अपमान और अनदेखी की आग
जो जला रही है उसे
न जाने कब से
बिना रुके, लगातार...

शनिवार, 7 जुलाई 2012

39. प्यार या सहारा

यह जो तुम्हारे कंधे पर 
मैंने अपना हाथ रखा है,
प्यार से रखा है,
क्या तुमने समझा है?

मेरी हथेलियों की 
थोड़ी अतिरिक्त  ऊष्मा,
एक अलग-सी कोमलता,
क्या तुमने महसूस की है?

यह जो तुम्हारे कंधे पर 
मैंने अपना हाथ रखा है,
सहारे के लिए नहीं रखा है,
सहारा ही लेना होता 
तो लाठी बेहतर होती,
न कसमसाती,
न एहसान जताती,
न इस दुविधा में रहती 
कि मैंने उसपर अपना हाथ 
सहारे के लिए रखा है 
या सिर्फ प्यार से...

शनिवार, 30 जून 2012

३८.पत्ते हवाओं से

हवाओं, मत उमेठो हमारे कान,
दुखते तो नहीं, पर देखो,
ये निगोड़े फूल मुस्कराते हैं,
कल की जन्मी कलियाँ 
मन-ही-मन खिलखिलाती हैं.


हवाओं, कभी तुम यहाँ, कभी वहाँ,
ठहरना तो सीखा ही नहीं तुमने,
तुम्हीं कहो, कैसे बदला लें,
कैसे रोकें तुम्हें खींचकर?
ये डालियाँ, ये टहनियाँ 
हमारी होकर भी 
साथ नहीं देती हमारा,
न जाने कब से जकड़ रखा है,
तय कर रखी है हमारी उड़ान की सीमा.


बुरा न मानो, हवाओं,
ठिठोली तो समझो,
मत रोकना हमारे कान उमेठना,
मत छीनना हमसे ये खुशी,
कोई तो हो, जो हमसे ये आज़ादी ले.

रविवार, 17 जून 2012

३७. रिटायरमेंट

मैं रिटायरमेंट से बहुत डरता हूँ ।

उस दिन समारोह होंगे,
उपहार दिए जायेंगे,
दुश्मन भी मुस्कराकर स्वागत करेंगे,
भाषणों में बखान होगा
मेरी योग्यता और योगदान का,
मेरे गुण, जो हैं या नहीं हैं,
चुन चुन कर गिनाये जायेंगे,
खुद को पह्चानना भी मुश्किल होगा,
कन्नी काट कर निकलने वाले भी
रुवांसे हो जायेंगे ।

बहुत कुछ वैसा ही होगा,
जैसा मौत पर होता है ।

पर अगले दिन से
बदल जायेगी दुनिया,
न किसी का फोन आएगा,
न किसी से बात होगी,
मिलने पर भी लोग
बेगानों जैसे पेश आयेंगे ।

मैं रिटायरमेंट से बहुत डरता हूँ,
इतना तो मौत से भी नहीं डरता,
मौत के बाद कुछ दिन ही सही
लोग याद तो रखते हैं !

रविवार, 10 जून 2012

३६.शर्म

देखो, कभी तुम थक जाओ 
तो सुस्ता लेना,
थकने में कोई शर्म नहीं है,
थकान को कभी मत छिपाना,
कुछ भी छिपाना गलत है.


कभी नींद आए तो सो जाना,
ज़रुरी नहीं कि रात को ही सोया जाए,
गलत नहीं है दिन में सोना,
सोने के लिए नींद ज़रुरी है,
अँधेरा नहीं. 


कभी दिल करे तो सोए रहना,
उठना ज़रुरी नहीं है,
नहीं उठने में कोई शर्म नहीं है,
हर कोई एक बार तो ऐसे सोता ही है 
कि फिर कभी न उठे.

रविवार, 3 जून 2012

३५.नई पगडंडी

बहुत चल चुके 
इन पुरानी पगडंडियों पर 
आओ, एक नई पगडंडी बनाएँ.


इन पत्तों,इन झाड़ियों से होकर 
निकलने का प्रयास करें,
देखें,क्या है उस तरफ,
कहाँ छिपे हैं साँप और बिच्छू,
कितनी दलदल है उधर,
कितने कांटे,कितना ज़हर?


चाहें तो ले लें कुछ हथियार,
जुटा लें थोड़ी हिम्मत,
(कौन सा हथियार है 
हिम्मत से बड़ा?)
छोड़ दें यह पगडंडी,
उतर पड़ें खतरों में,
शुरुआत हो जाय अब 
एक नई पगडंडी की.

रविवार, 27 मई 2012

34. ईमानदार 

बहुत  पसंद हैं मुझे 
ईमानदार  लोग ,
धारा के विरुद्ध  चलनेवाले ,
निज़ी स्वार्थों से परे,
अन्दर से मजबूत,
फिसलन  पर भी जो 
डटकर खड़े रहते हैं।

बेईमानों की दुनियां में 
ईमानदार  मिलते कहाँ हैं?
इनको सहेजना ज़रूरी है,
देखना ज़रूरी है 
कि इनकी ज़मात  
कहीं लुप्त न हो जाय .

बहुत  पसंद हैं मुझे 
ईमानदार लोग,
बहुत  इज्ज़त  है 
मेरे मन  में उनकी,
मुझे बस  उनकी 
यही बात  पसंद नहीं 
कि वे अपने अलावा सबको 
बेईमान  समझते हैं।

शनिवार, 19 मई 2012

33.सरल  रास्ते 

थक  चुका हूँ मैं
सीधे-सरल  रास्तों पर चलते-चलते.

शुक्रगुज़ार हूँ मैं उनका,
जिन्होंने क़दमों तले  फूल  बिछाए,
पर अब इन  फूलों से तलवे जलने लगे हैं,
पेड़ों की घनी छांव  में 
अब दम  घुटता है,
सीधी सपाट सड़क 
अब उबाऊ  लगती है।

क्या फ़ायदा  इस  तरह चलने का 
कि पसीना भी न  निकले,
इतनी भी थकान  न  हो कि 
सुस्ताने का मन  करे?
घर से ज्यादा आराम  सफ़र में हो,
तो क्या फ़ायदा  बाहर  निकलने का,
बैठने से ज्यादा आराम  चलने में हो,
तो क्या फ़ायदा ऐसे चलने का?

मुझे दिखा दो उबड़-खाबड़ राह ,
जिसमें कांटे बिछे हों,
जहाँ दूर-दूर तक  कहीं 
पेड़ों कि  छांव  न  हो,
जिस  पर चल कर लगे कि  चला हूँ,
फिर मंजिल  चाहे मिले न  मिले।


शुक्रवार, 11 मई 2012

32.बंटवारा 

धन-दौलत ,ज़मीन -जायदाद ,
यहाँ तक  कि रिश्ते-नाते,
सब कुछ  तो बंट  गया,
कुछ  भी शेष नहीं बंटने को।

साझा अब कुछ  भी नहीं,
कुछ  भी नहीं ऐसा 
जिसका आधा तुम्हें भेज  सकूं,
न  ही ऐसा कुछ  तुम्हारे पास  है 
जिसका आधा तुम  मुझे भेज  सको।

बस  एक  आंसू जो बंद था पलकों में
गालों पर छलक  आया है,
कहो तो आधा तुम्हें भिजवा दूं,
ऐसा ही कुछ  तुम्हारे पास  हो 
तो आधा इधर भिजवा देना। 

रविवार, 6 मई 2012

31.पगडण्डी 

कौन  चला होगा यहाँ पहली बार,
जो भी चला होगा क्यों चला होगा,
किसी से मिलने चला होगा 
या किसी से बिछड़कर ?

जोश  से भरा होगा या डर से,
काँपते क़दमों से  चला होगा 
या संकल्प और दृढ़ता से,
स्वेच्छा से चला होगा या मजबूरी से ?

कितने सालों पहले चला होगा,
अकेले चला होगा या किसी के साथ,
चलकर कहाँ तक  पहुंचा होगा,
पहुंचा भी होगा या नहीं?

जो भी चला हो, जैसे भी चला हो,
डरकर चला हो या साहस  से भरकर,
उसके चलने से कोई राह तो मिली,
घने जंगल  में पगडण्डी तो बनी.

सब चुप बैठ जाएँ तो कुछ  नहीं होता,
साहस  के साथ  बैठने से अच्छा है 
डर के साथ  चलते रहना,
पगडंडियों के लिए चलना ज़रूरी है.

शनिवार, 28 अप्रैल 2012

३०. भ्रम 

इतनी बेरुखी से 
मुझे अकेला छोड़कर 
इस तरह मत जाना,
तुम्हें पुराने दिनों का वास्ता.

उन रातों का वास्ता
जो कभी चाँद को देखते 
हमने एक साथ बिताई थीं.
.
भूल तो नहीं गई तुम
वो जन्मों के साथ का वादा,
और वे बेशुमार पल,
जिनमें कहना मुश्किल था 
कि हम दो हैं या एक.

मेरी बात पर गौर करना,
जाने की ज़िद न करना,
फिर भी तुम्हें लगे कि
जाना ही है,तो चली जाना,
बस एक बार मुड़कर देख लेना,
भ्रम रहेगा कि मैं आज भी 
तुम्हारे दिल के किसी कोने में हूँ.

सच्चाई के साथ जीना मुश्किल है,
जीने के लिए बहुत ज़रूरी है 
भ्रम...






शनिवार, 21 अप्रैल 2012

२९.चाँद में दाग 

क्या आपने चाँद देखा है?
अगर हाँ, तो उसमें धब्बे भी देखे होंगे.
दरअसल ये धब्बे नहीं हैं,
चाँद पर हो रहे वार के निशान हैं.
जैसे ही पूरा चाँद आकाश पर आता है,
उस पर चौतरफा हमले शुरू हो जाते हैं.
पूरे पखवाड़े लड़ता रहता है चाँद,
होता रहता है क्षत-विक्षत,
टुकड़े-टुकड़े हो गायब हो जाता है अंततः

हर रोज़ सहता है चाँद,
हर रोज़ कटता है चाँद
पूरी तरह खत्म होने से पहले,
और हम कहते हैं,
'कितना खूबसूरत होता चाँद
अगर उसमें दाग नहीं होते !'

शनिवार, 7 अप्रैल 2012

२८.दीवार 


एक दीवार बनाई थी मैंने
अपने और तुम्हारे बीच,
ईंट,पत्थर और रेत से,
मजबूत और ऊंची,
पर न जाने कहाँ से 
आ जाती हैं उछलकर 
उधर की हवाएं इधर,
ठन्डे पानी की बूँदें
और कभी-कभार 
तुम्हारे बदन की खुशबू
और तुम्हारे साथ बिताए
शहदी पलों की यादें.


आओ, एक ऐसी दीवार बनाएं
जिसे फांद न सकें
पानी की बूँदें,
हवाओं के झोंके 
तुम्हारी यादें-
कुछ भी नहीं.


अगर ऐसी दीवार न बन सके,
तो तोड़ दें यह दीवार,
जो खड़ी है मेरे और तुम्हारे बीच 
बेवज़ह, बेमतलब...





शनिवार, 24 मार्च 2012

२७. आओ, हंसें 


बहुत दिन हो गए हँसे,
आओ, आज तोड़ दें बंधन,
भुला दें शिकवे-शिकायतें,
निकाल फेंकें मन का गुबार,
निहारें काँटों के बीच खिले फूल,
याद करें  पुराने मीठे पल.


आओ, आज खुलकर हंसें,
ऐसे कि पागलों से लगें,
कि आंसू आ जाय आँखों में,
कि लोग देखें मुड़-मुड़ कर,
जैसे कि बाढ़ आ जाय 
किसी गुमसुम नदी में अचानक.


आओ, आज खूब हंसें,
हँसते रहें सुबह से शाम तक,
जैसे आज हमें मरना हो.

शनिवार, 17 मार्च 2012

२६.निशाना


तुम्हें पता है न 
कि रंगीन पानी से भरा गुब्बारा,
जो तुम पिछले साल
खिड़की से फेंक कर भाग गई थी,
सड़क पर गिरकर बेकार हो जाता
अगर मैं लपककर पकड़ न लेता
और अपने सरपर फोड़ न लेता.


इस बार होली में
इस तरह फेंकना गुब्बारा
कि मुझपर आकर फूटे 
या जिसे मैं लपक सकूँ
आसानी या मुश्किल से 
और कर सकूँ
तुम्हारा प्रयास सार्थक.


भगवान न करे 
कि तुम्हारा निशाना कभी चूके,
खासकर तब जब निशानेपर मैं होऊं 
और तुम्हारा मकसद मुझे रंगना हो.


गुरुवार, 8 मार्च 2012

२५. इस बार की होली 


बहुत देर खड़ा रहा मैं
तुम्हारी खिड़की के नीचे,
पर न तुमने खिड़की खोली,
न गुब्बारा फेंका.


बड़ा इंतज़ार था होली का,
पर तुम्हारी बेरुखी ने 
पानी फेर दिया उम्मीदों पर
और मुझे पता भी नहीं 
कि बेरुखी कि वज़ह क्या थी.


बड़ी फीकी रही इस साल की होली,
बहुत डला अबीर-गुलाल,
पर मैं रँगा ही नहीं,
बहुत पड़े गुब्बारे,
पर मैं भीगा ही नहीं.

रविवार, 4 मार्च 2012

२४.शहर की सड़कें


शहर की चौड़ी-चमचमाती सड़कें
लगातार फुट-पाथों को लीलतीं
ताकि बढाई जा सकें लेनें
और गाड़ियाँ दौड़ सकें सरपट.


मीलों लम्बे flyover
छलांगों में पार कर रहे चौराहे,
चिढ़ा रहे नीचे जलती-बुझती
बेबस-सी लाल बत्तियों को.


एक बूढ़ा थका-सा, बदहवास,
निढाल निरंतर कोशिश से
कि सड़क के उस पार पहुँच जाय,
जहाँ पिछले आधे घंटे से
उसका परिवार इंतज़ार में खड़ा है.



रविवार, 26 फ़रवरी 2012

२३.गृहिणी 


सुबह से शाम तक जुटी रहती है गृहिणी,
चौका-चूल्हा,झाड़ू-पोंछा,खेत-खलिहान,
हर जगह पिली रहती है गृहिणी.


खाना कम, डांट ज्यादा खाती है गृहिणी,
बात-बात पर झिड़की,अपमान अनदेखी,
मर-मर कर जीती रहती है गृहिणी.


सब कुछ चुपचाप सहती है गृहिणी,
देखकर अनदेखा,सुनकर अनसुना,
बस मन ही मन उबलती है गृहिणी.


गृहिणी को पसंद है ओखली-मूसल, सिलबट्टा,
कूट डालती है अन्दर का सारा गुस्सा,
पीस डालती है सारी टीस चटनी के साथ 
तैयार हो जाती है अगले दिन के लिए गृहिणी.

शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

२२.वसंत


कितना सुंदर है वसंत!


बीत गए दिन अब
कडकडाती सर्दी के,
ख़त्म हुई खींचतान
फटी-पुरानी चादर-सी
कम्बल के लिए.


नहीं चिपकना पड़ता अब
लड़ाई के बाद भाई से,
नहीं सहनी पड़ती रातों को
बदबू उसके बदन की -
तपिश की खोज में.


नहीं खोजनी पड़ती टहनियां 
सुबह से शाम तक 
ताकि रातें बीत सकें 
उनके सहारे जैसे-तैसे.


जाड़े को लील गया,
कितना सुन्दर है वसंत!

गुरुवार, 9 फ़रवरी 2012

२१.माँ

कितनी अच्छी हो तुम, माँ !

कह सकता हूँ तुमसे
मन की सारी बातें,
यह कि मेरे दोस्त आएँ
तो अंदर ही रहना,
सामने आओ भी
तो अच्छी साड़ी पहन 
बाल संवारकर आना
और दूरवाली कुर्सी पर बैठना.

उनकी नमस्ते का उत्तर
हाथ जोड़कर देना,
हो सके तो चुप ही रहना,
बोलना ही हो तो
ज़रा ध्यान रखना,
शर्म को सर्म,
ग़ज़ल को गजल मत कहना.

उनके सामने चाय न पीना,
सुड़कने कि आवाज़ आएगी.

मेरी इतनी सी बात मानोगी न,
मेरी अच्छी,प्यारी, माँ ?

सोमवार, 30 जनवरी 2012

२०.मेरी खोज में मैं 

मैं कहीं खो गया हूँ  
और मेरी खोज में 
मुझे ही लगाया गया है.

बहुत खोजा मैंने खुद को,
पर मुझे कहीं नहीं मिला मैं,
थक-सा गया हूँ खोजकर,
हिम्मत भी हार बैठा हूँ  
छोड़ दी है सारी उम्मीद
कि कभी मिल पाऊंगा मैं खुद से.

अब कोई और प्रयास करे,
ढूंढ निकाले मुझे कहीं से
और जब मैं मिल जाऊं 
तो मुझे भी खबर भिजवा दे 
कि मैं जो कहीं खो गया था
आख़िरकार मिल गया हूँ. 

गुरुवार, 26 जनवरी 2012

१९. इंसान 

मेरे गम में वह रोया,
मेरी खुशी में मुस्कराया,
जब लगी चोट 
तो मरहम लगाया.

गिरने से बचाया उसने 
जब-जब मैं लडखडाया,
मैं कभी गिरा तो
उसने बढ़कर उठाया.

घर से निकला तो 
फूल बिछाए उसने,
चुन-चुन कर हटाये उसने 
कांटे और कंकर.

वह मेरा कोई न था,
न मेरे घर का,
न पड़ोस का,
न ही कोई दोस्त,
दूर का रिश्तेदार भी नहीं.

मैंने पूछा, 'इतना सब किसलिए?'
उसने कहा,'क्योंकि मैं भी इन्सान हूँ.'

शुक्रवार, 13 जनवरी 2012

१८. आधा-आधा 


आधा-आधा बँट गया सब कुछ,
पर लगता है, ठीक से नहीं  बँटा.


जो आधा तुम्हारे पास है,
कितना अच्छा होता 
अगर मेरे पास होता,
तुम्हें भी लगता होगा
कि जो आधा मेरे पास है,
तुम्हें मिलता तो अच्छा होता.


तुम्हारा आधा मुझे 
आधे से ज़्यादा लगता है,
और अपना आधा तुम्हें 
आधे से कम लगता होगा.


पूरे को इस तरह बाँटना 
संभव ही नहीं लगता 
कि दोनों आधे बराबर लगें.

शनिवार, 7 जनवरी 2012

१७.मोहलत 


बीते साल ने जाते-जाते मुझसे कहा,
"कितना वक़्त दिया मैंने,
पर कुछ भी नहीं हुआ तुमसे,
न कोई ख़ुशी, न कोई उत्साह,
न कुछ करने की ललक
अपने या किसी और के लिए,
जीवित होकर भी मृत बने रहे तुम,
बोझ बाँटने की जगह बोझ बने रहे,
मेरे विदा होते-होते 
थोड़ा और पिछड़ गए तुम."


मैंने कहा,"कोशिश तो की थी,
पर कुछ कर नहीं पाया,
लगता है, समय कम पड़ गया,
थोड़ी मोहलत क्यों नहीं दी तुमने ?"


बीता साल हंसा और बोला,
"लो मान ली तुम्हारी बात,
आनेवाले साल में दे दिया 
तुम्हें एक अतिरिक्त दिन,
चलो, अब तो कुछ करो."