शनिवार, 7 अप्रैल 2012

२८.दीवार 


एक दीवार बनाई थी मैंने
अपने और तुम्हारे बीच,
ईंट,पत्थर और रेत से,
मजबूत और ऊंची,
पर न जाने कहाँ से 
आ जाती हैं उछलकर 
उधर की हवाएं इधर,
ठन्डे पानी की बूँदें
और कभी-कभार 
तुम्हारे बदन की खुशबू
और तुम्हारे साथ बिताए
शहदी पलों की यादें.


आओ, एक ऐसी दीवार बनाएं
जिसे फांद न सकें
पानी की बूँदें,
हवाओं के झोंके 
तुम्हारी यादें-
कुछ भी नहीं.


अगर ऐसी दीवार न बन सके,
तो तोड़ दें यह दीवार,
जो खड़ी है मेरे और तुम्हारे बीच 
बेवज़ह, बेमतलब...





13 टिप्‍पणियां:

  1. सही है.......................
    इस पार या उस पार....................

    बहुत सुंदर भाव ओंकार जी.

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  2. आओ, एक ऐसी दीवार बनाएं
    जिसे फांद न सकें
    पानी की बूँदें,
    हवाओं के झोंके
    तुम्हारी यादें-
    कुछ भी नहीं.
    waah

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  3. गलतफहमियों से खड़ी, ऊंची बड़ी दीवार |
    जुल्फों की बूंदे उछल, खुश्बू आये पार |

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  4. अगर ऐसी दीवार न बन सके,
    तो तोड़ दें यह दीवार,
    जो खड़ी है मेरे और तुम्हारे बीच
    बेवज़ह, बेमतलब...
    वाह!!!!!!बहुत सुंदर रचना,अच्छी प्रस्तुति........

    MY RECENT POST...काव्यान्जलि ...: यदि मै तुमसे कहूँ.....

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  5. अनूठे बिम्ब प्रस्तुत किये हैं आपने अपनी रचना में...बधाई

    नीरज

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  6. ऐसी दीवारों को तोड़ना ही अच्छा होता है ... आकाश तक ऊँची दिवार तो नहीं बन सकती ...
    बहुत खूब ...

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  7. बहुत मुश्किल है ऐसी दीवार बनाना जो रोक सके यादों को... अनुपम विम्ब...बहुत सशक्त प्रस्तुति..

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  8. बहुत सुन्दर वाह!
    आपकी यह ख़ूबसूरत प्रविष्टि आज दिनांक 09-04-2012 को सोमवारीय चर्चामंच पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

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  9. बहुत खूबसूरत लगी पोस्ट....शानदार।

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  10. अच्छी प्रस्तुति के लिये बहुत बहुत बधाई....

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