मंगलवार, 27 अक्तूबर 2020

४९७. दुर्गा से



दुर्गा,

इस बार मैंने देखा,

तुम ज़रा उदास थी,

सिंह,जिस पर तुम सवार थी,

थोड़ा सुस्त-सा था,

शस्त्र जो तुमने थामे थे,

थोड़े कुंद-से थे,

महिषासुर के चेहरे पर 

थोड़ी निश्चिन्तता थी.


दुर्गा,

तुम्हें विदा करते हुए 

मैंने महसूस किया 

कि इस बार यहाँ आकर 

तुम्हें अच्छा नहीं लगा.


सोमवार, 26 अक्तूबर 2020

४९६. रावण का क़द


वे हर साल दशहरे पर 

रावण का पुतला जलाते हैं,

पर अगले साल उन्हें

बड़े क़द का रावण चाहिए,

वे ख़ुद नहीं जानते 

कि वे चाहते क्या हैं,

रावण को जलाना

या उसका क़द बढ़ाना.

***

हर साल जुटते हैं 

लाखों-करोड़ों लोग

रावण का पुतला जलाने,

पर न जाने क्यों 

अगले साल बढ़ जाता है 

रावण का क़द,

मैंने कभी बढ़ते नहीं देखा

जलानेवालों का क़द.

***

दस सिर हैं रावण के,

क़द भी बहुत बड़ा है,

पर डरो मत,

एक चिंगारी की देर है,

धधक उठेगा रावण,

जलकर राख हो जाएगा 

बस ज़रा-सी देर में.

शुक्रवार, 23 अक्तूबर 2020

४९५. बच न जाय रावण



इस बार दुर्गापूजा फीकी है,

पंडालों में भीड़ कम है,

संगीत थोड़ा धीमा है,

रौशनी कुछ मद्धिम है,

लोग ज़रा सहमे से हैं,

देवी उदास-सी दिखती है.


दूर मैदान में खड़ा 

अट्टहास कर रहा है रावण,

मुझे डर है 

कि इस बार दशहरे में 

कहीं वह बच न जाय.

बुधवार, 21 अक्तूबर 2020

४९४. रावण की नाभि का अमृत



जब सोख लिया था 

रावण की नाभि का अमृत 

राम के अग्नि-वाण ने,

तभी मरा था रावण.


सदियाँ बीत गईं,

पर लगता है,

पूरा नहीं किया था काम

राम के अग्नि-वाण ने,

बच गया था 

रावण की नाभि में 

थोड़ा-सा अमृत.


तभी तो जीवित है 

अब तक रावण,

लौट आता है बार-बार 

किसी-न-किसी रूप में,

जलता है हर दशहरे में,

पर अट्टहास करता 

फिर आ धमकता है 

अगले दशहरे में.


क्या कोई राम आएगा,

जो मार दे रावण को

हमेशा के लिए,

क्या कोई ऐसा तीर होगा,

जो सोख सके 

रावण की नाभि का 

बचा-खुचा अमृत? 


सोमवार, 19 अक्तूबर 2020

४९३. ज़िन्दा



शांत पड़ा हूँ मैं बड़ी देर से,

यह चुप्पी अब खलने लगी है,

मुझ पर एक उपकार करो,

कहीं से कोई पत्थर उठाओ,

खींचकर मारो मेरी ओर,

हलचल मचा दो मुझमें,

चोट लगे तो लग जाय ,

पर महसूस तो हो मुझे 

कि मैं अभी ज़िन्दा हूँ.

शुक्रवार, 16 अक्तूबर 2020

४९२. तूफ़ान में दूब



उस दिन तेज़ तूफ़ान आया,

ज़ोर की आंधियां चलीं,

धुआंधार बारिश हुई,

धराशाई हो गए विशालकाय पेड़,

टेढ़े-मेढ़े हो गए बिजली के खम्भे.

गिर गईं बहुत-सी झोपड़ियाँ,

ढह गए कच्चे मकान,

पक्के मकानों ने भी सहा 

ख़ूब सारा नुकसान.


इस भीषण तबाही में भी 

बच गई सही-सलामत 

धरती की गोद में छिपी 

नन्ही, कमज़ोर-सी दूब.

बुधवार, 14 अक्तूबर 2020

४९१. कविता




जब भी बैठता हूँ मैं कविता लिखने,

न जाने क्यों,

मेरे शब्द अनियंत्रित हो जाते हैं,

कोमल शब्दों की जगह 

काग़ज़ पर बिखरने लगते हैं 

आग उगलते शब्द,

काँटों से चुभने लगते हैं उन्हें,

जो मेरी कविताएँ पढ़ते हैं.


उन्हें लगता है 

कि मैं वैसी कविताएँ क्यों नहीं लिखता,

जो राजाओं की तारीफ़ में लिखी जाती थीं,

जिन्हें कवि दरबार में सुनाते थे,

वाहवाही और ईनाम पाते थे.


मैं चाहता तो हूँ,

पर लिख नहीं पाता ऐसी कविताएँ,

अवश हो जाता हूँ मैं,

मेरी लेखनी मुझे अनसुना कर 

एक अलग ही रास्ते पर चल पड़ती है,

उसे दुनियादारी की कोई समझ नहीं है.

 


शनिवार, 10 अक्तूबर 2020

४९०. कैसे लोग हो तुम?



कैसे लोग हो तुम,

जो लड़ते ही रहते हो,

कभी किसी छोटी,

तो कभी बड़ी बात पर,

कभी इस बात पर,

तो कभी उस बात पर.


अगर एक बार लड़ाई 

शुरू हो जाय,

तो उसे बढ़ाते ही रहते हो,

ख़त्म ही नहीं करते.


तुम ख़ुद को बड़ा कहते हो,

पर तुमसे अच्छे तो बच्चे हैं,

जो अगर आज लड़ते हैं,

तो कल साथ खेलने लगते हैं.

मंगलवार, 6 अक्तूबर 2020

४८९. शिव से




शिव,

तुम अनाचार देख रहे हो न,

कौन किसके गले में 

सांप डाल रहा है,

ख़ुद अमृत पीकर 

दूसरों को विषपान करा रहा है,

कौन ज़िम्मेदारियों से मुक्त होकर 

कर्तव्य की गंगा का बोझ 

दूसरों के सिर डाल रहा है.


कौन है,

जो ख़ुद रह रहा है 

आलीशान इमारतों में 

और दूसरों को भेज रहा है 

हिमालय के एकांत में,

ख़ुद भोग रहा है सारे सुख 

और दूसरों को रख रहा है 

नंग-धडंग....


शिव,

कब खोलोगे तुम तीसरा नेत्र,

कब बजेगा तुम्हारा डमरू, 

कब चलेगा तुम्हारा त्रिशूल,

शिव, कब करोगे तुम तांडव?

शनिवार, 3 अक्तूबर 2020

४८८. उन दिनों की वापसी

सुनो,

मुझे वे दिन याद आते हैं,

जब सड़कों पर मिलने के 

ढेर सारे मौक़े हुआ करते थे,

पर हम कतराकर निकल जाते थे.


तब किसी को गले लगाना 

कोई डर की बात नहीं थी,

हम फिर भी बचते रहते थे,

पर अब सालता है दर्द 

इन मौक़ों के खो जाने का.


कभी तो कोरोना हारेगा,

कभी तो वे मौक़े फिर आएँगे,

पर क्या हम ख़ुद को बदल पाएंगे?

क्या हम किसी को गले लगा पाएंगे?




बुधवार, 30 सितंबर 2020

४८७. शिकायत



रेलगाड़ी,

रोज़ तो तुम देर से आती हो,

आज उन्हें जाना है,

तो समय पर आ धमकी?

कौन-सी बदनामी हो जाती,

जो आज भी तुम देर से आती?

क्या बिगड़ जाता तुम्हारा,

जो सिग्नल पर ज़रा रुक जाती?

कौन सा अनर्थ हो जाता,

जो थोड़ी देर सुस्ता लेती?

जिन्हें जाना था,वे तो नहीं माने,

पर तुमने कौन सी दुश्मनी निभाई,

मैंने क्या बिगाड़ा था तुम्हारा, 

रेलगाड़ी, तुमने क्यों जल्दी दिखाई?

रविवार, 27 सितंबर 2020

४८६. मिलन



नदी समंदर से मिली,

तो पता चला 

कि वह तो खारा था,

नदी ने सोचा,

खारे समंदर के साथ रह लेगी,

दोनों की अलग पहचान होगी,

पर समंदर को यह मंज़ूर नहीं था,

वह आमादा था 

कि मीठी नदी भी 

उसकी तरह खारी हो जाय.


अंत में वही हुआ 

जो समंदर चाहता था,

समंदर अब ख़ुश है.

शुक्रवार, 25 सितंबर 2020

४८५. अंतरात्मा



सुनो, महामारी के दौर में 

ख़ुद से ज़रा बाहर निकल जाना,

थोड़ी दूर रहकर 

ध्यान से देखना

कि क्या कुछ बचा है तुममें,

ख़ासकर अंतरात्मा बची है क्या,

अगर मर गई है, तो कैसे,

कोरोना तो नहीं मार सकता उसे.

मंगलवार, 22 सितंबर 2020

४८४. गाँव का स्टेशन


गाँव का छोटा-सा स्टेशन

अच्छा लगता है मुझे,

दिन में एकाध गाड़ी रूकती है यहाँ,

थोड़े-से यात्री चढ़ते हैं यहाँ से,

थोड़े-से उतरते हैं यहाँ.


इसी स्टेशन की बेंच पर बैठकर 

मैंने बुने थे भविष्य के सपने,

बनाई थीं तमाम योजनाएं,

लिखी थीं दर्जनों कविताएँ,

इसी के कोने पर बैठकर 

मैंने पहली बार उसे देखा था.


गाँव का यह स्टेशन न होता,

यह बेंच न होती,

तो बहुत से रिश्ते 

शायद रह जाते बनने से.


क्या अब भी आप पूछेंगे 

कि गाँव का यह छोटा-सा स्टेशन 

मुझे इतना पसंद क्यों है?

रविवार, 20 सितंबर 2020

४८३. ख़ुशी



ज़िन्दगी बीत गई तुम्हें ढूंढ़ते,

पर तुम मिली ही नहीं,

अब तो बता दो अपना पता,

अब वक़्त ज़रा कम है.

           ***

मैंने दुखी लोगों से पूछा,

ख़ुशी कहाँ है?

वे बोले,पता होता,

तो दुखी क्यों होते?

मैंने उनसे भी पूछा 

जो ख़ुश  रहते  हैं,

वे बोले, यह क्या सवाल है?

ख़ुशी कहाँ नहीं है?

          ***

मैं तुम्हें खोजता रहा बाहर,

पर तुम तो अन्दर ही थी,

कभी तुमने आवाज़ नहीं दी,

कभी मैंने अन्दर नहीं झाँका.


शुक्रवार, 18 सितंबर 2020

४८२.सेमल




बगीचे में चुपचाप खड़ा 

एक सेमल का पेड़ 

कितने रंग दिखाता है,

कभी हरे पत्ते,

कभी गहरे लाल फूल,

तो कभी सूखे पीले पत्ते.


कभी-कभी तो सेमल 

बिल्कुल ठूंठ बन जाता है,

न पत्ते, न फूल,

उसकी एक-एक हड्डी 

साफ़-साफ़ दिखाई पड़ती है.


जब लगता है 

कि अब सेमल चुक गया,

दिन लद गए उसके,

वह लौटता है पूरी ताक़त से 

और बिछा देता है ज़मीन पर 

सफ़ेद,कोमल रूई का ग़लीचा.

मंगलवार, 15 सितंबर 2020

४८१. इन दिनों



आजकल मेरे साथ कोई नहीं,

पर मैं अकेला नहीं हूँ.


सुबह-सवेरे आ जाते हैं 

मुझसे मिलने परिंदे,

मैं अपनी बालकनी में 

आराम-कुर्सी पर बैठ जाता हूँ,

वे मुंडेर पर जम जाते हैं,

फिर ख़ूब बातें करते हैं हम.


मैं खिड़की के पार 

पेड़ों पर उग आईं

कोमल पत्तियों को देखता हूँ,

हवा में झूमती 

डालियों को देखता हूँ.


मैं गमलों में खिल रहे 

फूलों को देखता हूँ,

कलियों को देखता हूँ,

जो फूल बनने के इंतज़ार में हैं.


मैं देखता हूँ 

आकाश को लाल होते,

सूरज को निकलते,

उसे रंग बदलते.


शाम को सूरज से मिलने 

मैं फिर पहुँच जाता हूँ,

देखता हूँ उसका रंग बदलना

और धीरे-धीरे डूब जाना.


रात को बालकनी से 

मैं देखता हूँ घटते-बढ़ते चाँद को,

बादलों से उसकी लुकाछिपी,

फिर थककर सो जाता हूँ.


आजकल मैं अकेला नहीं हूँ,

न ही फ़ुर्सत में हूँ,

आजकल मैं उनके साथ हूँ 

जिनकी मैंने हमेशा अनदेखी की है.


रविवार, 13 सितंबर 2020

४८०. फ़ोटो

Photographer, Camera, Lens, Photo

मुझे रहने ही दो 

फ़ोटो से बाहर,

मुझे शामिल करोगे,

तो दिक्कत होगी तुम्हें.


मैं साफ़ कपड़े पहन लूँगा,

बाल बनवा लूँगा,

दाढ़ी-मूंछ कटवा लूँगा,

इत्र भी छिड़क लूँगा,

भले ही वह फ़ोटो में न आए,

पर क्लिक करते वक़्त 

जब तुम कहोगे 

कि मुस्कराओ,

तो मैं मुस्करा नहीं पाऊंगा.


मुझे नहीं आती

अन्दर से दुखी होकर 

बाहर से मुस्कराने की कला 

और तुम नहीं चाहोगे 

कोई ऐसा फ़ोटो खींचना,

जो सच बयाँ करे.

शुक्रवार, 11 सितंबर 2020

४७९. अनुभूति

silhouette of trees near mountain during sunset

आज कहीं नहीं जाना,

तो ऐसा करो,

अपने अन्दर उतरो,

गहरे तक उतरो.


तुम हैरान रह जाओगे,

वहां तुम्हें जाले मिलेंगे,

गन्दगी मिलेगी,

फैली हुई मिलेगी 

सड़ांध हर कोने में.


अपने अन्दर उतरोगे,

तो तुम्हें वह सब मिलेगा,

जो तुम हमेशा सोचते थे 

कि तुम्हारे अन्दर नहीं,

कहीं बाहर है.

मंगलवार, 8 सितंबर 2020

४७८. तीन कविताएँ


'रागदिल्ली' वेबसाइट पर प्रकाशित मेरी तीन कविताएँ.

बारिश से

बारिश, आज ज़रा जम के बरसना,
उन काँपती बूढ़ी हथेलियों में
थोड़ी देर के लिए ठहर जाना,
बहुत दिन हुए,
उन झुर्रियों को किसी ने छुआ नहीं है....

(पूरा पढ़ने के लिए लिंक खोलें)

https://www.raagdelhi.com/hindi-poetry-onkar/?


शनिवार, 5 सितंबर 2020

४७७.तीर

दशरथ ने चलाया है 

शब्दभेदी वाण,

मारा गया है श्रवण,

अनाथ हो गए हैं 

उसके अंधे माँ-बाप.


अफ़सोस है दशरथ को,

अयोध्यापति है वह,

पर उसके वश में नहीं है 

नुकसान की भरपाई करना.


मैं समझ नहीं पाता 

कि जिनके निशाने अचूक होते हैं,

वे किस अधिकार से 

बिना सोचे समझे 

कहीं भी तीर चला देते हैं?

बुधवार, 2 सितंबर 2020

४७६. बादलों से

Cloudy, Dark, Full Moon, Luna, Moon

बादलों,

मैं चाँद को देख रहा था 

और चाँद मुझे,

तुम क्यों आ गए बीच में ?

इतनी बड़ी दुनिया में 

कहीं भी चले जाते,

बस चाँद-भर आकाश छोड़ देते,

बाक़ी सब तुम्हारा था.

***

बादलों,

चाँद को छिपाकर

इतना मत इतराओ,

मैं देख सकता हूँ उसे 

आँखें बंद करके,

तुम्हारे होते हुए भी.

***

बादलों,

मैं कब से इंतज़ार में था 

कि चाँद निकले,

वह निकला भी,

पर तुमने उसे छिपा लिया,

बिना उससे पूछे 

कि वह छिपना चाहता था क्या?

अब हट भी जाओ रास्ते से,

तुम्हें नहीं पता,

पर मैं जानता हूँ 

कि चाँद बहुत उदास होगा.

शनिवार, 29 अगस्त 2020

४७५. तूफ़ान

Key West, Florida, Hurricane Dennis

कल शाम तेज़ तूफ़ान आया,

भटकता रहा गलियों में,

चिल्लाता रहा ज़ोर-ज़ोर से,

पेड़ों को झकझोरता रहा 

काग़ज़ के टुकड़े उड़ाता रहा,

पीटता रहा दरवाज़े-खिड़कियाँ.


कोई नहीं मिला उसे, 

न सड़कों पर,न गलियों में,

किसी ने नहीं खोला दरवाज़ा.


कल शाम तूफ़ान 

मिलना चाहता था किसी से,

मुलाक़ात नहीं हुई,

तो फूट-फूट रोया,

सबने कहा,

तेज़ बरसात हो रही है.

गुरुवार, 27 अगस्त 2020

४७४. औरतें

Cacti, Cactus, Cactuses, Plants, Cactus

कैक्टस जैसी होती हैं औरतें,

तपते रेगिस्तान में 

बिना पानी, बिना खाद के 

जीवित रहती हैं.

उनके नसीब में नहीं होते 

फूल,पत्ते,कलियाँ, 

ठूंठ की तरह उम्र भर 

जीना पड़ता है उन्हें.

काँटों-भरी होती हैं औरतें,

उनके कांटे हरदम 

उन्हीं को चुभते रहते हैं.


सोमवार, 24 अगस्त 2020

४७३.नाम

Girl, Woman, Female, Person, Mountain

मुझे अच्छा लगता है अपना नाम,

जब पुकारता है कोई धीरे से 

अक्षर-अक्षर में भरकर 

ढेर-सारा प्यार.


भीगी हवाओं की तरह 

मेरे कानों तक पहुँचता है मेरा नाम,

ख़ुशी से भर देता है मेरा पोर-पोर.


मैं कोई जवाब नहीं देता,

बस कान खुले रखता हूँ,

चाहता हूँ कि पुकारनेवाला 

पुकारता ही रहे मेरा नाम,

जवाब दे दूंगा,तो कैसे सुनूँगा

बार-बार लगातार 

उसके मुँह से अपना नाम?

शुक्रवार, 21 अगस्त 2020

४७२.गठरी

Old, Lady, Woman, Elderly, Clothing, Women, Scarf

वह गठरी,

जो कोनेवाले कमरे में पड़ी है,

आज ख़ुश है,

थोड़ी हिलडुल रही है.


गठरी को उम्मीद है 

कि बरसों बाद फिरेंगे 

उसके भी दिन,

आएगा कोई-न-कोई,

पूछेगा उसका हालचाल.


गठरी ने सुना है,

आज सब घर में हैं,

घर में ही रहेंगे,

अगले कई दिनों तक.


गठरी सोचती है,

वह खुलेगी नहीं,

कुछ बोलेगी नहीं,

बस चुपचाप सुनेगी,

गंवाएगी  नहीं  ऐसे पल,

जो बड़ी मुश्किल से मिलते हैं.

मंगलवार, 18 अगस्त 2020

४७१. आँसू

Sad, Cry, Tear, Facebook, Reaction

मेरे आँसू मेरी बात नहीं सुनते,

मैं बहुत कहता हूँ 

कि पलकों तक मत आना,

अगर आ भी जाओ,

तो बाहर मत निकलना,

पर आँसू कहते हैं,

'सब कुछ तुम पर निर्भर है,

तुम बहुत ख़ुश

या बहुत उदास मत हुआ करो,

हम दूर ही रहेंगे,

किसी को पता नहीं चलेगा 

कि तुम रोते भी हो.

वैसे हमें इतना समझा दो 

कि हम सामने आते हैं,

तो तुम्हें शर्म क्यों आती है,

आख़िर तुम भी तो आदमी हो.'

शुक्रवार, 14 अगस्त 2020

४७०. दीवारें

Door, Contemporary, Within, Wall


अक्सर मैं सोचता हूँ 

कि मेरे दफ़्तर जाने के बाद 

घर की दीवारें 

मेरे बारे में क्या सोचती होंगी.


मेरी आलोचना करती होंगी 

या तारीफ़?

मेरे साथ उदास रहती होंगी 

या ख़ुश?

मुझे अच्छा समझती होंगी 

या बुरा?


मैं सालों से यहीं रहता हूँ,

पर दीवारों ने मुझे

कभी कुछ नहीं कहा,

न ही मैंने कभी पूछा.


कभी-कभार मैं 

जल्दी घर आ जाता हूँ,

पर न जाने कैसे 

दीवारों को पता चल जाता है 

और वे हमेशा की तरह 

ख़ामोश हो जाती हैं.



बुधवार, 12 अगस्त 2020

४६९. खेतों की कविताएँ

 Seed, Sowing, Shoots, Young, Fresh

इस बार जब  

खेत में बोओ 

धान या गेहूँ,

तो मुझे बता देना .


मैं भी बो दूंगा 

आस-पास वहीं 

कविताओं  के बीज,

डाल दूंगा थोड़ी 

कल्पनाओं की खाद,

भावनाओं का पानी.


उन्हीं बीजों से निकलेंगी

खेतों की कविताएँ,

जिनमें महकेगी मिट्टी,

झूमेंगी बालियाँ,

जिनको खोलो,

तो दिखेंगे

धान और गेंहूं के दाने.

रविवार, 9 अगस्त 2020

४६८. पानी

Water, Wastage, Save, Water Public, Tap


मेरे गाँव की औरतें 

जमा होती हैं रोज़ 

सुबह-शाम पनघट पर.

घर से लेकर आती हैं 

मटका-भर उदासी,

वापस ले जाती हैं 

थोड़ा-सा पानी 

और ढेर सारी ख़ुशी.

शुक्रवार, 7 अगस्त 2020

४६७. सरहद के उस ओर

 'रागदिल्ली' वेबसाइट पर प्रकाशित मेरी कविता:


मैं सरहद के इस ओर से देखता हूँ

उस ओर की हरियाली,

कंटीली तारें नहीं रोक पातीं

मेरी लालची नज़रों को.

सतर्क खड़े हैं बाँके जवान

इस ओर भी, उस ओर भी,

पर वे चुप हैं,

उनकी संगीनें भी चुप हैं.


पूरी कविता पढ़ने के लिए लिंक खोलें. https://www.raagdelhi.com/poetry-onkar-3/

बुधवार, 5 अगस्त 2020

४६६. चोरी

Sunset, Village, Sun, Indian, Dawn

गाँव में बरगद है,
उसके नीचे है चबूतरा,
वहीं बैठते हैं गाँव के लोग,
वहीं करते हैं सुख-दुःख की बातें.

अगली बार गाँव गया,
तो छिप के सुनूंगा 
गाँववालों की बातें,
चुरा लूँगा उनमें से 
कुछ कविताएँ 
और थोड़ी-सी कहानियाँ.

रविवार, 2 अगस्त 2020

४६५ . नाम

Woman, Girl, Freedom, Happy, Sun

मेरा नाम पुराने स्टाइल का है,
थोड़ा लम्बा भी है,
मुझे बिल्कुल पसंद नहीं है,
पर यही नाम जब कभी 
उसके होंठों पर होता है,
मुझे अच्छा लगता है.

उसकी आवाज़ में घुलकर 
मेरा नाम बन जाता है सुरीला,
मिल जाती है उसे नई पहचान.

यही वह पल है,
जब मुझे लगता है,
शेक्सपियर ने सही कहा था
कि नाम में कुछ नहीं रखा.

यही वह पल है,
जब मुझे लगता है
कि नाम लम्बा होना चाहिए,
कुछ देर होंठों पर तो रहे.

शुक्रवार, 31 जुलाई 2020

४६४. चाय और कविता

Black Coffee, Coffee, Cup, Desk, Drink

इन दिनों मुझसे 
रूठी हुई है मेरी कविता.

कभी वे भी दिन थे,
जब एक कप चाय पर 
मुकम्मल हो जाती थीं 
मेरी कई सारी कविताएँ.

अब लग जाता है मेज़ पर 
ख़ाली कपों का ढेर,
पर काग़ज़ है  
कि कोरा ही पड़ा रहता है.

शायद चाय पी-पीकर 
ऊब गई है मेरी कविता,
अब क्या पिलाऊँ उसे 
कि लौट आए मेरी कविता. 

मंगलवार, 28 जुलाई 2020

४६३.साझा संपत्ति

Boy, Child, Dad, Family, Father, Female

कैसे तय कर दी तुमने 
उसकी नियति अकेले-अकेले?
कैसे भूल गए तुम 
कि वह मेरी भी संतान है?

मैंने रचा है उसे 
ख़ुद में छिपाकर,
महीनों तक सींचा है उसे 
अन्दर-ही-अन्दर.

याद रखना
कि जिस संपत्ति का भविष्य
तुम तय करना चाहते हो,
वह तुम्हारी अकेले की नहीं 
साझा संपत्ति है.

शनिवार, 25 जुलाई 2020

४६२. अनदेखा

Rays, Sun, Light, Fog, Forest, Sky

किसी रोज़ समय मिले,
तो अपने अन्दर भी झांक लो,
बहुत कुछ दिखेगा वहां,
जो तुम्हें पता ही नहीं था 
कि तुम्हारे अन्दर छिपा है.

कितनी  अजीब बात है 
कि हम दूर-दूर जाते हैं,
देख लेते हैं सब कुछ,
पर उसे नहीं देख पाते,
जो हमारे सबसे क़रीब है.

गुरुवार, 23 जुलाई 2020

४६१. गहने

grayscale photography of person wearing hoodie hiding face with both hands

बहुत प्यार करते थे 
सारे बच्चे माँ से,
सबने ले लिए 
धीरे-धीरे उसके गहने - 
किसी ने कंगन,
किसी ने हार,
किसी ने पायल,
किसी ने झुमके.

अब गहने ख़त्म हुए,
सिर्फ़ माँ बची है,
बच्चों में ढूंढती फिरती है 
वह पहले जैसा प्यार.

देर से समझ पाई है माँ 
गहनों से प्यार का रिश्ता.

सोमवार, 20 जुलाई 2020

४६०. यात्रा

कौन थे वे,
जो सिर पर घर लादे 
चले जा रहे थे 
अपने घरों की ओर?

छालों भरे पांव,
भूख से अकड़े पेट -
न जाने कहाँ से चलकर 
आए थे वे,
न जाने कहाँ तक चलकर 
जाना था उन्हें?

कौन थे वे,
जिनकी उंगलियाँ थामे
चले जा रहे थे बच्चे,
जिनकी औरतें 
भारी पाँवों के साथ 
बढ़ी जा रही थीं 
मंज़िल की ओर.

कोरोना के डर से बेख़बर,
हिदायतों को दरकिनार कर 
लाठी,डंडे,गालियां खाकर, 
कभी खुलकर,कभी छिपकर 
बढ़े चले जा रहे थे वे.

यक़ीन नहीं होता था उन्हें देखकर 
कि मौत से सब डरते हैं. 

शुक्रवार, 17 जुलाई 2020

४५९.मनचाही मृत्यु

'रागदिल्ली' वेबसाइट पर प्रकाशित मेरी कविता:


उन्होंने कहा,
मरने के लिए तैयार रहो,
सारा इंतज़ाम है हमारे पास-
गोली, चाकू, डंडा, फंदा,
तुम ख़ुशकिस्मत हो,
बता सकते हो
कि तुम्हें कैसे मरना है.
पूरी कविता पढ़ने के लिए लिंक खोलें. https://www.raagdelhi.com/poetry-onkar-2/

बुधवार, 15 जुलाई 2020

४५८. छोटा

Mother, Son, Baby, Beach, Sunset

जब वह गर्भ में आया,
निढाल हो चुकी थी माँ
बच्चे जनते-जनते,
हाँफते-हाँफते दौड़कर 
मंज़िल तक पहुँची थी.

छोटे से बहुत प्यार है माँ को,
छोटा उसके श्रम का निचोड़ है.

सोमवार, 13 जुलाई 2020

४५७. दंड

Hanging Rope, Rope, Hangman, Hanging, Hang, Punishment

यह कहना सही नहीं है 
कि उसे मृत्युदंड मिला है,
दंड अपराध के लिए होता है,
उसका अपराध तो साबित ही नहीं हुआ,
उसे मौक़ा ही नहीं मिला,
तुमने दिया ही नहीं,
तुमने कभी चाहा ही नहीं 
कि उसके साथ न्याय हो.

सुनो,
तुम जिसे मृत्युदंड कहते हो,
वह दरअसल हत्या है.

शनिवार, 11 जुलाई 2020

४५६.उपलब्धि

Road, Forest, Season, Autumn, Fall

एक मंज़िल है,
जिसकी तरफ़  
न जाने कब से 
चला जा रहा हूँ मैं,
पर मंज़िल है कि 
बहुत दूर लगती है.

मुझे नहीं लगता 
कि मैं मंज़िल तक पहुंचूंगा,
पर कम-से-कम
जहाँ से चला था,
वहां से तो आगे निकलूँगा 

मंज़िल न मिले तो न सही,
आगे बढ़ते रहना 
और चलते रहना ही होगी 
मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि.

गुरुवार, 9 जुलाई 2020

४५५.उद्घोष


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वह बगीचा वीरान था,
न फूल थे वहां,न फल,
डालियाँ सूख गई थीं,
कलियाँ कुम्हला गई थीं,
पौधे निर्जीव से खड़े थे.

बस एक पत्ता था,
जो अब भी हरा था,
पूरी सृष्टि उसे  
सुखाने पर आमादा थी.

वह अदना-सा पत्ता 
मृत्यु के सन्नाटे में 
जीवन का उद्घोष था.

सोमवार, 6 जुलाई 2020

४५४. घर

House, Residence, Blue, House, House

नए घर में आई थी वह औरत,
बड़ा आरामदेह घर था वह,
हर कमरा हवादार था उसका,
धूप आती थी उसकी बालकनी में.

औरत ने सुन रखा था यह सब,
महसूस नहीं किया था कभी,
क्योंकि घर के किचन के बाहर 
उस औरत का कोई घर नहीं था.

शुक्रवार, 3 जुलाई 2020

४५३. गिलहरी

Squirrel, Young, Young Animal, Mammal

सूखी डालियों पर 
इधर से उधर 
भागती रहती है गिलहरी,
गुदगुदी होती है पेड़ को,
पत्ता-पत्ता हिलता है उसका.
**
वह गिलहरी,
जो फुदकती रहती थी 
पेड़ पर दिनभर,
कहीं चली गई है,
बूढ़ा लगने लगा है पेड़ 
उसके इंतज़ार में.
**
एक नन्ही-सी गिलहरी 
फुदकती रहती है
कभी इस डाल पर,
कभी उस डाल पर,
कभी इस पेड़ पर,
कभी उस पेड़ पर.
कितनी अमीर है 
एक छोटी सी गिलहरी,
पूरा जंगल उसका है.

मंगलवार, 30 जून 2020

४५२. मौत से

हज़ारों मील के सफ़र का 
एक बड़ा हिस्सा 
तय कर लिया है मैंने.

बदन थक कर चूर है,
पाँव छालों से भरे हैं,
पेट अकड़ रहा है भूख से,
पर अभी दूर है गाँव.

मैं चलता रहूँगा,
जब तक सांस चलेगी,
मौत, तुम्हें उसकी कसम,
जो तुम्हें सबसे प्रिय है,
मेरे गाँव पहुँचने से पहले 
मेरे पास मत आना.

शनिवार, 27 जून 2020

४५१. कोयल से

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कोयल, 
तुम किसी भी समय 
क्यों गाने लगती हो?
इस भरपूर उदासी में,
जब सब घरों में बंद हैं,
तुम्हारी ख़ुशी का राज़ क्या है?
ज़रा हमें भी बताओ,
हम भी भर लें 
अपनी ज़िन्दगी में 
थोड़ी-सी ख़ुशी,
हम भी गा लें
तुम्हारे साथ-साथ,
तुम्हारे जितना नहीं,
तो थोड़ा-सा ही सही.

मंगलवार, 23 जून 2020

४५०. मत लौटना

'रागदिल्ली' वेबसाइट पर प्रकाशित मेरी कविता: 

बेटे,
बहुत राह देखी तुम्हारी,
बहुत याद किया तुम्हें,
अब आओ, तो यहीं रहना....

शनिवार, 20 जून 2020

४४९. शहर से

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बड़ी उम्मीद से आया था 
मैं तुम्हारे पास कभी,
बहुत रोका था गाँव ने,
वहां के खेतों,बगीचों ने,
वहां के फूलों, पत्तों ने,
दूर तक पुकारता रहा था कोई,
पर मैं आ गया था अनसुना करके.

मेरे क़दमों में उत्साह था,
मेरी आँखों पर सपनों की पट्टी थी,
बड़ी अच्छी लग रही थी दूर से मुझे 
तुम्हारी चौंधियाती रौशनी.

पर तुमने सब कुछ लूट लिया,
दर-दर का भिखारी बना दिया,
छीन लिया मुझसे मेरा 
आत्म-विश्वास,आत्म-सम्मान.

कम-से-कम अब इतना तो करो
कि मुझे वापस गाँव जाने दो,
वादा है,इस बार गया, 
तो कभी तुम्हारा मुँह नहीं देखूँगा.

गुरुवार, 18 जून 2020

४४८.अपने गाँव से

मेरे गाँव,
मैं वापस लौट रहा हूँ.

सिर पर गठरी उठाए,
छालों भरे पाँवों से 
थके बदन को घसीटते 
मैं निकल पड़ा हूँ 
सैकड़ों मील की यात्रा पर.

गिरते-पड़ते, ठोकरें खाते 
लहूलुहान पांव लिए 
शायद पहुँच जाऊं तुम तक.

अगर पहुँच जाऊं,
तो दुत्कारना नहीं मुझे,
माफ़ कर देना वह पाप,
जो तुम्हें छोड़कर मैंने किया था. 

अगर पूरी न कर पाऊँ यात्रा,
तो भी स्वीकार कर लेना मुझे,
मुझे फूल बनकर खिलना है ,
ख़ुश्बू बनकर तुम्हारी 
हवाओं में बिखरना है .


सोमवार, 15 जून 2020

४४७. मंज़िल

Epidemic, Coronavirus, Lurking

न जाने कहाँ से चले आ रहे हैं 
इतने सारे थके-थके कदम,
भूखे पेट का बोझ लादे.
सामान का बोझ कम हो सकता है,
पर भूखे पेट का कैसे कम हो?

मीलों से चले आ रहे हैं ये कदम,
मीलों तक चलना है इन्हें,
उन्हीं घरों तक पहुँचना है,
जहाँ से निकले थे ये कभी,
उन्हीं गलियों तक पहुँचना है,
जो इन्होंने छोड़ी थीं कभी.

कोरोना ने समझाया है इन्हें
कि जिसे मंज़िल समझा था,
वह तो बस एक छलावा था,
मंज़िल तो इनकी वहीं थी,
जहाँ से ये कभी चले थे.



शुक्रवार, 12 जून 2020

४४६. पुरानी दुनिया

Coronavirus, Virus, Mask, Corona

सड़कें सूनी हैं,
पक्षी ख़ामोश हैं,
हवाएँ लौट रही हैं
बंद दरवाज़ों से टकराकर.

सूरज उगता है,
मारा-मारा फिरता है
सुबह से शाम तक,
फिर डूब जाता है.

मुँह पर पट्टी बंधी है,
पहले की तरह बोलना 
अब संभव नहीं,
किसी को गले लगाना 
ख़तरे से ख़ाली नहीं.

अब हर आदमी 
शक के घेरे में है,
अब हर चीज़ से 
डर लगता है.

कोरोना ने बदल दी है 
हम सब की दुनिया,
जी चाहता है लौट जाएँ
अब उसी पुरानी
बेतरतीब दुनिया में.

मंगलवार, 9 जून 2020

४४५. जाले

Cobweb, Dark, Smoke, Mystical

वह जो पहले अच्छा नहीं लगता था,
अब बहुत अच्छा लगता है,
वह जिसे देखना भी नहीं चाहता था,
अब उसे गले लगाना चाहता हूँ.

घर में रहकर सोचता रहा मैं 
कि क्यों अच्छा नहीं  लगता था वह,
क्यों नहीं करता था मन उसे देखने का,
पर वज़ह कोई मिली ही नहीं.

बहुत नुकसान किया लॉकडाउन ने,
पर हटा दिए उसने बहुत सारे जाले.