सोमवार, 19 अक्तूबर 2020

४९३. ज़िन्दा



शांत पड़ा हूँ मैं बड़ी देर से,

यह चुप्पी अब खलने लगी है,

मुझ पर एक उपकार करो,

कहीं से कोई पत्थर उठाओ,

खींचकर मारो मेरी ओर,

हलचल मचा दो मुझमें,

चोट लगे तो लग जाय ,

पर महसूस तो हो मुझे 

कि मैं अभी ज़िन्दा हूँ.

12 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सटीक रचना बहुत ख़ूब ।आदरणीय शुभकामनाएँ

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  2. चिकोटी से भी काम चल सकता है जहां पत्थर किसलिये? :)

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (21-10-2020) को   "कुछ तो बात जरूरी होगी"   (चर्चा अंक-3861)    पर भी होगी। 
    -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
    -- 
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
    --

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  4. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज मंगलवार 20 अक्टूबर 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  5. वाह , झकझोरने वाली चेतना ही चाहिए सभी को

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  6. चिंतन परक भावाभिव्यक्ति ।

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  7. महसूस तो हो मुझे

    कि मैं अभी ज़िन्दा हूँ.

    वाह!

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  8. आदरणीय ओंकार जी, नमस्ते 🙏!
    कहीं से कोई पत्थर उठाओ,
    खींचकर मारो मेरी ओर,
    हलचल मचा दो मुझमें,
    चोट लगे तो लग जाय ,
    पर महसूस तो हो मुझे
    कि मैं अभी ज़िन्दा हूँ.
    जिंदा महसूस कराने के लिए पत्थर से चोट करना जरूरी है। कभी -कभी सचमुच जरूरी हो जाता है। --ब्रजेन्द्रनाथ

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  9. संक्षिप्त और सुंदर रचना गागर में सागर सुंदरम मनोहरम

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