क़तार के आख़िर में खड़ा आदमी
अनंत से अपनी बारी के इंतज़ार में है,
वह क़तार के आख़िर में इसलिए है
कि नए-नए लोग आते गए
और यह कहकर आगे खड़े होते गए
कि हम जहां खड़े हो जाते हैं,
लाइन वहीं से शुरू होती है।
क़तार के आख़िर में खड़ा आदमी
अनंत से अपनी बारी के इंतज़ार में है,
वह क़तार के आख़िर में इसलिए है
कि नए-नए लोग आते गए
और यह कहकर आगे खड़े होते गए
कि हम जहां खड़े हो जाते हैं,
लाइन वहीं से शुरू होती है।
जीतू मुंडा,
मुश्किल रहा होगा तुम्हारे लिए
अपनी बहन को मरते देखना,
उसे क़ब्र में लिटाना,
उसके शव पर मिट्टी डालना,
फिर कोई जंगली फूल चढ़ाना।
ऐसा करते वक़्त
तुमने सपने में भी नहीं सोचा होगा
कि तुम्हें कभी निकालना होगा
क़ब्र से उसका कंकाल।
कैसे चले होगे तुम
बहन को कांधे पर लादे,
कितनी दूर जाना पड़ा होगा तुम्हें,
ज़्यादा भारी रहा होगा
उसके शव से उसका कंकाल।
जीतू मुंडा,
यहाँ मुश्किल है ज़िंदा लोगों के लिए
ख़ुद को ज़िंदा साबित करना,
मुश्किल है लाशों के लिए
ख़ुद को मृत साबित करना,
असंभव है कंकाल के लिए
यह साबित करना
कि वह तुम्हारी बहन है।
जीतू मुंडा,
जिनके कारण तुम कंकाल ढो रहे हो,
वे चल-फिर रहे हैं,
सांस ले रहे हैं,
पर ज़िंदा नहीं हैं।
मत ढोओ अपने कंधों पर
इतना बड़ा बोझ,
सोने दो अपनी बहन को क़ब्र में,
बड़े भोले हो तुम,
इतना भी नहीं जानते
कि नहीं पसीजता लाशों का दिल
कंकालों को देखकर।
सुनो सीता,
अच्छा होता,
अगर रावण से युद्ध आज होता,
न उतना समय लगता,
न उतना कष्ट होता।
न कहीं जाने की ज़रूरत होती,
न बंदर-भालू इकट्ठा करने की,
न समुद्र पर पुल बनाना पड़ता,
बस कुछ मिसाइलें काफ़ी होतीं।
जला देते लंका बिना हनुमान के,
गुप्तचरों से पूछ लेते ज़रूरी ठिकाने,
चुपके से गिरा देते वहाँ बम,
मार देते रावण, कुंभकर्ण, मेघनाद को।
सुनो, सीता,
मैं राम हूँ, मर्यादा पुरुषोत्तम हूँ,
तुम्हारा अपहरण नहीं होता,
तो मैं युद्ध नहीं करता,
पर मेरी जगह कोई और होता,
तो चढ़ाई कर देता बिना कारण,
उठवा लेता लंका का सारा सोना।
एक गोरी-चिट्टी बच्ची,
जो युद्ध में मारी गई,
ईरानी थी,
वह अमेरिका के स्कूल में होती,
तो कहना मुश्किल था
कि वह अमेरिकी नहीं, ईरानी है।
जानता हूँ तुम्हें
नौ महीने हो गए गर्भ में,
पर छटपटाओ मत,
हो सके, तो अंदर ही रहो,
बाहर हवा ज़हरीली है,
ड्रोन, बम और मिसाइलें
तुम्हारे इंतज़ार में हैं।
**
एक ऐसा युद्ध करते हैं,
जिसमें मिसाइलें बरसाएँ फूल,
तोपों की नलियाँ फेंकें गुलाल,
बंदूकों से निकले इत्र,
सिपाही खुरचकर मिटा दें
मुल्कों के बीच खींची लकीरें।
रात को बार-बार चौंकती है,
झटके से उठ जाती है लड़की,
पसीने से लथपथ हो जाती है,
डरकर सहम जाती है लड़की।
पानी के घूंट हलक से उतारती है,
उठकर खिड़की तक जाती है,
चुपके से गली में झाँकती है,
सब कुछ ठीक पाती है लड़की।
फिर से बिस्तर पर आकर
नींद का इंतज़ार करती है,
आज तय करती है लड़की,
कल से टी.वी. नहीं देखेगी,
न ही अख़बार पढ़ेगी लड़की।
एक ख़ूबसूरत-सा ख़्वाब देखा मैंने,
गुलाब के हाथों में गुलाब देखा मैंने।
कहते हैं आँखें उसकी झील सी हैं,
गुलाब में झील, झील में गुलाब देखा मैंने।
न कभी सुना था, न कभी सोचा था,
एक चलता-फिरता गुलाब देखा मैंने।
जहां न खिला था, न खिल सकता था,
उसी सहरा में गुलाब देखा मैंने।
गुलाब नावाक़िफ़ था गुलाब होने से,
उसने माना ही नहीं कि गुलाब देखा मैंने।
जानता हूँ, उसने कांटे देखे मुझमें,
उसे पता है, उसमें गुलाब देखा मैंने।
इस बात से वह नाराज़ है मुझसे,
उसमें काँटा नहीं, गुलाब देखा मैंने।
न नींद आती है, न चैन पड़ता है,
किस मनहूस घड़ी में गुलाब देखा मैंने?
कमल,
इतना भी मत इतराओ,
मुझमें ही हैं तुम्हारी जड़ें,
तुमसे मैं नहीं,
मुझसे तुम हो।
मैं खिला सकता हूँ
तुम जैसे कई कमल,
ज़िंदा रह सकता हूँ
तुम्हारे बिना भी।
भ्रम में मत रहो,
मैं तुम्हारे पैरों में हूँ,
पर अपने लिए नहीं,
तुम्हारे लिए।
मैं आधार हूँ तुम्हारा,
तुम्हारी ज़मीन हूँ मैं,
मैंने ही बचा रखा है तुम्हें
लहरों में बह जाने से।
बहुत पतंगें थीं आसमान में,
जिनमें से एक हठात कट गई,
बड़ी देर से उड़ रही थी,
हिचकोले खा रही थी,
फिर संभल भी रही थी।
लड़ना आता था उसे,
मज़बूत थी उसकी डोर,
तेज़ था उसका माँझा,
लग नहीं रहा था कि कटेगी,
हिम्मतवाली थी वह बूढ़ी पतंग।
कोई नहीं जानता
कि कब तक उड़ेगी कौन सी पतंग ,
पर इतना तो तय है
कि कितनी भी जीवटवाली हो पतंग,
कितना भी तेज़ हो उसका माँझा,
कितनी भी मज़बूत हो उसकी डोर,
कटना ही पड़ता है हर पतंग को,
फटना ही पड़ता है कभी-न-कभी।