शनिवार, 23 जून 2018

३१४.महाराजा

वे महाराजा हैं,
वही करेंगे,
जो करना चाहेंगे,
इक्कीसवीं सदी के हैं,
इसलिए थोड़ा नाटक करेंगे,
जताएंगे
कि वे पूर्वाग्रह से ग्रस्त नहीं हैं,
खुले मन से तुम्हें सुनना चाहते हैं,
पर तुम चुप रहना।

किसी का बोलना उन्हें
पसंद नहीं है,
तुम कितना भी संभल कर बोलो,
न जाने उन्हें क्या बुरा लग जाए.


कायदे-कानून की बात मत करना,
ये उनके लिए नहीं बने हैं,
उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं
कि कोई उन्हें
उन नियमों की याद दिलाए
जो उन्होंने खुद बनाए हैं
तुम्हारे और मेरे लिए।

ज़्यादा बोलोगे
तो उन्हें ज़्यादा लिखना पड़ेगा
सोचना पड़ेगा
कि तुम्हारे तर्कों को कैसे काटें
कैसे तुम्हें सबक सिखाएं,
कैसे खुद को सही ठहराएं।

अपना मुंह बंद,
नज़रें नीची रखना,
मत भूलना
कि वे राजा हैं
और तुम कुछ भी नहीं,
प्रजा भी नहीं।

शनिवार, 16 जून 2018

३१३. अमलतास से


अच्छे लगते हो तुम अमलतास,
जब खिल उठते हो वसंत में,
पर मैं जब तुम्हें देखता हूं,
तो सोचता हूं
कि तुम इतने पीले क्यों हो.

तुम सुंदर तो बहुत हो,
पर कमज़ोर भी लगते हो,


मेरी मानो अमलतास,
तो बगल में खड़े गुलमोहर से
थोड़ी सी सुर्ख़ी ले लो,
सुंदर भी लगोगे, ताकतवर भी,
वरना बेवजह पत्थर झेलोगे.

जो कमज़ोर दिखते हैं,
उन्हें अपनी ख़ूबियों के बावज़ूद
पत्थर खाने ही पड़ते हैं.

शनिवार, 9 जून 2018

३१२. तितलियां


आजकल ख़तरे में हैं तितलियां।

आजकल कोई भी, 
कहीं भी,
किसी भी तितली के
पर नोच सकता है,
महफूज़ नहीं हैं आजकल तितलियां।

नहीं मिलती आजकल
रंग - बिरंगी,मस्त,
उड़नेवाली तितलियां,
ऐसी तितलियों पर
प्रतिबंध है आजकल।

खुले घूमते हैं नोचने वाले,
तितलियों से पूछा जाता है,
क्या किया उन्होंने
कि नोच लिए गए उनके पर।

दरवाजे बंद हैं सब
तितलियों के लिए,
अब ख़ुद ही करनी होगी उन्हें 
अपने परों की हिफाज़त,
तमाम तितलियों के लिए
यह परीक्षा का समय है।

रविवार, 27 मई 2018

३११. बारिश


क्या तुमने कभी रात में 
बिस्तर पर लेटे-लेटे
छत पर टपकती 
बारिश की बूंदों को सुना है?

कभी धीरे से,
तो कभी ज़ोर से
बारिश की बूँदें 
तुम्हें पुकारती हैं,
तुमसे बात करना चाहती हैं,
पर तुम जागकर भी 
कुछ सुन नहीं पाते.

कहीं नाराज़ न हो जाएं 
ये बारिश की बूँदें,
छोड़ न दें 
तुम्हारी छत पर बरसना,
पर क्या फ़र्क पड़ेगा तुम्हें,
तुम्हें तो मालूम ही नहीं 
कि छत पर बरसती बूंदों का 
संगीत कैसा होता है?

मेरी मानो,
कंक्रीट की छत हटा दो,
टीन की डाल लो,
इतनी ग़रीबी में भी क्या जीना 
कि बारिश की आवाज़ भी न सुने.

शनिवार, 5 मई 2018

310. लोग

बड़े स्वार्थी होते हैं लोग,
अपना काम हो,
तो गधे को भी 
बाप बना लेते हैं,
काम निकल जाने के बाद 
दूध से मक्खी की तरह 
निकाल फेंकते हैं 
किसी को भी.

एहसानफ़रमोश होते हैं लोग,
धोखेबाज़ भी,
ज़रूरत पड़े,
तो किसी की भी पीठ में 
छुरा भोंक सकते हैं.

दोगले होते हैं लोग,
अपने लिए उनके नियम अलग 
और दूसरों के लिए अलग होते हैं,
अंदर से वे वैसे नहीं होते,
जैसे बाहर से दिखते हैं,
वे कहते कुछ और हैं, 
सोचते कुछ और हैं.

मुझे पूरा यक़ीन है
कि जो मैंने कहा है,
बिल्कुल सही है,
क्योंकि मैं ख़ुद भी 
ऐसा ही हूँ.