शुक्रवार, 19 मई 2017

२६१. पैसेंजर और राजधानी


धीरे-धीरे बढ़ रहा हूँ 
मैं तुम्हारी ओर,
जैसे बढ़ती है 
कोई पैसेंजर गाड़ी 
हर स्टेशन पर रुकती,
यात्रियों को चढ़ाती-उतारती.

लगता है,
यूँ ही रुकते-रुकाते,चलते-चलाते,
तुमसे हो ही जाएगी मुलाक़ात,
पर मेरा मुंह चिढ़ाती,
राजधानी ट्रेन की तरह 
तुम सर्र से निकल मत जाना.

शुक्रवार, 12 मई 2017

२६०. बोल

बोल, किस बात का डर है तुझे,
जो तेरे पास है, उसे खोने का
या उसे, जो तेरा हो सकता है?

बोल, क्यों चुप है तू,
कौन सा ताला है तेरे मुंह पर,
प्यार का, डर का या लालच का?

बोल, किस दुविधा में है तू,
क्या है, जो तेरे ज़मीर से बढ़कर है,
क्या है, जो तेरी इज्ज़त से क़ीमती है?

बोल, क्या चाह है तेरे मन में,
क्या इतनी छोटी है तेरी चादर 
कि समा नहीं सकते उसमें तेरे पांव?

क्या हुआ तेरी ज़बान को?
देख, निकला जा रहा है वक़्त,
मुंह से नहीं, तो आँखों से ही बोल,
बोल, कुछ तो बोल.

शनिवार, 6 मई 2017

२५९.बिकाऊ

वह जो बाज़ार में नहीं है,
यह मत समझना
कि बिकाऊ नहीं है.

ग़लतफ़हमी में है वह,
ग़लतफ़हमी में हैं सभी 
कि उसे ख़रीदना नामुमकिन है.

कभी कोई ख़रीदार आएगा,
उसकी ऐसी क़ीमत लगाएगा,
जैसी उसने सोची न होगी,
जो डाल देगी उसे दुविधा में,
तोड़ देगी उसका संकल्प.

अंततः उसे झुकना होगा,
उसे मानना ही होगा 
कि यहाँ सब बिकाऊ हैं,
जो बाज़ार में हैं, वे भी,
जो नहीं हैं, वे भी.

शनिवार, 29 अप्रैल 2017

२५८. रेलगाड़ी

दूर अँधेरे में चमकती एक बत्ती,
पहले एक छोटे-से बिन्दु की तरह,
फिर धीरे-धीरे बढ़ती हुई,
पास, और पास आती हुई.


जूतों के तस्मे अब बंधने लगे हैं,
खड़े हो गए हैं सब अपनी जगह,
उठा लिए हैं बक्से हाथों में,
थाम ली हैं बच्चों की उँगलियाँ.

अब अँधेरा दूर होगा,
मंज़िल की ओर कूच करेंगे सब,
बस कुछ ही देर की बात है,
रेलगाड़ी प्लेटफ़ॉर्म पर पहुँचनेवाली है.

शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017

२५७. वह दुनिया

जी करता है,
फिर से संकरी पगडंडियों पर चलूँ,
लहलहाते धान के खेतों को देखूं,
फूलों पर पड़ी ओस की बूंदों को छूऊँ,
ताज़ी ठंडी हवा जी भर के पीऊँ.

जी करता है,
टीन के छप्पर पर रात को बरसती 
बारिश का संगीत सुनूँ,
आँगन में लगे आम के पेड़ पर 
उग आए बौरों को देखूं.

जी तो बहुत करता है,
पर अब वह दुनिया कहाँ से लाऊँ,
जिसे इस दुनिया के लिए 
मैंने बहुत पहले बदल दिया था.