गुरुवार, 2 फ़रवरी 2023

६९६. पिता

 



पिता के जाने के बाद 

मैंने जाना 

कि बहुत गहरे धंसे हुए हैं वे

मेरे अंदर,

फैलती ही जा रही हैं 

उनकी जड़ें, 

मरे नहीं हैं पिता,

पहले से ज़्यादा ज़िंदा हैं वे 

मरने के बाद मुझमें. 

**

पिता,

बहुत दिन हुए 

तुम्हारी आवाज़ सुने,

कभी मैं भी आऊंगा,

लेटूँगा तुम्हारी बग़ल में,

तुम कुछ कह पाओगे न,

मैं कुछ सुन पाऊंगा न ?



रविवार, 29 जनवरी 2023

६९५.लाठी

 


उसे बहुत पसंद है 

अपनी लाठी,

एक वही है,

जो उसके पास रहती है, 

वरना उसके साथ से   

बड़ी जल्दी ऊब जाते हैं 

सब-के-सब. 

**

तुम्हें लगता है 

कि बिना लाठी के तुम 

चल नहीं पाओगे,

पर एक बार अपनी लाठी 

ख़ुद बन के तो देखो,

शायद किसी और लाठी की तुम्हें 

ज़रूरत ही न पड़े. 

**

मेरी लाठी मुझे 

सहारा तो देती है,

पर मुझे अच्छा नहीं लगता,

वह जब चलती है,

तो शोर बहुत करती है. 

**

उसने इतना बोझ डाल दिया 

कि लाठी ही टूट गई,

जिन्हें सहारा चाहिए,

उन्हें अपना वज़न 

कम रखना पड़ता है.


बुधवार, 25 जनवरी 2023

६९४.मच्छर

 


रात-भर भिनभिनाता है 

कानों में एक मच्छर,

मैं उसे दूर भगाता हूँ,

वह फिर लौट आता है. 


वह कुछ कहना चाहता है,

पर मैं सुनना नहीं चाहता,

जो बोलने पर आमादा हो,

उसे दूर रखना चाहिए,

वह काट भी सकता है. 



शनिवार, 21 जनवरी 2023

६९३. गांव की तलाश में

 


अपने गांव में मैं 

पुराना गांव खोजता हूँ. 


बेख़ौफ़ खड़े 

पीपल के पेड़,

वे कच्चे रास्ते,

लबालब भरे कुएं,

घरों के सामने रखे 

वे तुलसी के पौधे.  


वे मंदिर की घंटियां,

वह गायों का रंभाना,

चिड़ियों का चहचहाना,

लोगों का बतियाना. 


यहाँ की हवाओं में अब

पहले-सी ताज़गी नहीं है, 

न फूलों की महक है,

न घरों से उठती 

नाश्ते की ख़ुशबू है.   


मैं दस्तक देता हूँ 

अनचिन्हे दरवाज़ों पर,

खोजता हूँ पुराने चेहरे,

पर जो भी मिलता है,

पूछता है, ‘कौन हो?

कहाँ से आए हो?’


अब यहाँ पहले-सा 

कुछ भी नहीं है,

मुझे तो शक़ है 

कि क्या यही वह जगह है,

जहाँ किसी ज़माने में 

मेरा गांव हुआ करता था.



मंगलवार, 17 जनवरी 2023

६९२. बूढ़ी सड़क

 


तुम्हें याद है न 

कि इसी पतली सड़क पर चलकर 

तुम कभी हाईवे तक पहुंचे थे?

अब यह सड़क जगह-जगह से 

टूट-फूट गई है,

किसी काम की नहीं रही,

पर अच्छा नहीं लगता 

कि कोई सड़क इस हाल में रहे. 

एहसान चुकाने के लिए ही सही,

इसकी थोड़ी मरम्मत करवा दो

या यही सोचकर करवा दो 

कि कल किसने देखा है,

कौन जाने, कभी इसी सड़क से 

तुम्हें वापस लौटना पड़े?