गुरुवार, 18 अक्तूबर 2018

३२९. रावण की सेल्फ़ी


हर बार जाता हूँ 
रावण का फोटो खींचने 
मैं दशहरे के मेले में,
पर रावण है 
कि बच जाता है 
अच्छे-से-अच्छे कैमरे से. 

सालों बाद समझ पाया हूँ 
कि रावण का फोटो लेना हो,
तो कैमरा अपनी ओर करना पड़ता है,
सेल्फ़ी लेना पड़ता है.

शनिवार, 13 अक्तूबर 2018

३२८.जड़ें

मैंने जड़ों से पूछा,
क्यों घुसी जा रही हो ज़मीन में,
कौन सा खज़ाना खोज रही हो,
किससे छिपती फिर रही हो ?

जड़ों ने कहा,
हमारे सहारे टिका है पेड़,
जुटाना है उसके लिए हमें 
पोषक आहार,
हरे रखने हैं उसके पत्ते,
बनाना है उसे विशाल।

क्या फ़र्क़ पड़ता है,
जो गुमनाम हैं हम?
हमारे लिए इतना बहुत है 
कि हमने थाम रखा है किसी को,
ज़मीन के अंदर ही सही,
किसी की ज़िन्दगी हैं हम.


शुक्रवार, 28 सितंबर 2018

३२७.चाय


दार्जीलिंग के चाय बागानों में 
फटे-पुराने कपड़े पहने 
भीषण ठण्ड में कांपता 
एक मज़दूर  जानता है, 
निकट है उसका अंत.

गंगाजल थामे हाथों से 
उखड़ती सांसों के बीच 
उसकी डूबती आँखें मांगती हैं 
दार्जीलिंग के बागानों की 
दो घूँट गर्म चाय.

शुक्रवार, 21 सितंबर 2018

३२६. आदमी


नदी किनारे 
झाड़ियों में खिला
नन्हा-सा फूल,
डाली से जकड़ा,
जन्म से क़ैद,
पर झूमता मुस्कराता।

बिना आराम 
अनवरत बहती नदी,
हमेशा गुनगुनाती,
बिना शिकवा,
बिना शिकायत।

आदमी,
हर हाल में उदास,
सुख में भी,
दुःख में भी,
चलने में भी,
रुकने में भी,
मौत से घबराता,
ज़िन्दगी से परेशान। 


शुक्रवार, 14 सितंबर 2018

३२५. रास्ते


रास्ते,
कहीं कच्चे, कहीं पक्के,
कहीं समतल, कहीं गढ्ढों-भरे,
कहीं सीधे, कहीं घुमावदार,
अकसर पहुँच ही जाते हैं 
किसी-न-किसी मंज़िल पर.

बस, इसी तरह चलते चलें,
गिरते-पड़ते, हाँफते-दौड़ते,
रोज़ थोड़ा-थोड़ा, 
अनवरत,
पहुँच ही जाएंगे आख़िर,
कहीं-न-कहीं,
कभी-न-कभी.