मंगलवार, 15 सितंबर 2020

४८१. इन दिनों



आजकल मेरे साथ कोई नहीं,

पर मैं अकेला नहीं हूँ.


सुबह-सवेरे आ जाते हैं 

मुझसे मिलने परिंदे,

मैं बालकनी में 

आराम-कुर्सी पर बैठ जाता हूँ,

मुंडेर पर जम जाते हैं वे,

फिर ख़ूब बातें करते हैं हम.


मैं खिड़की के पार 

पेड़ों पर उग आईं

कोमल पत्तियों को देखता हूँ,

हवा में झूमती 

डालियों को देखता हूँ.


मैं गमलों में खिल रहे 

फूलों को देखता हूँ,

कलियों को देखता हूँ,

जो फूल बनने के इंतज़ार में हैं.


मैं देखता हूँ 

आकाश को लाल होते,

सूरज को निकलते,

उसे रंग बदलते.


शाम को सूरज से मिलने 

मैं फिर पहुँच जाता हूँ,

देखता हूँ उसका रंग बदलना

और धीरे-धीरे डूब जाना.


रात को बालकनी से 

मैं देखता हूँ घटते-बढ़ते चाँद को,

बादलों से उसकी लुकाछिपी,

फिर थककर सो जाता हूँ.


आजकल मैं अकेला नहीं हूँ,

न ही फ़ुर्सत में हूँ,

आजकल मैं उनके साथ हूँ 

जिनकी मैंने हमेशा अनदेखी की है.


रविवार, 13 सितंबर 2020

४८०. फ़ोटो

Photographer, Camera, Lens, Photo

मुझे रहने ही दो 

फ़ोटो से बाहर,

मुझे शामिल करोगे,

तो दिक्कत होगी तुम्हें.


मैं साफ़ कपड़े पहन लूँगा,

बाल बनवा लूँगा,

दाढ़ी-मूंछ कटवा लूँगा,

इत्र भी छिड़क लूँगा,

भले ही वह फ़ोटो में न आए,

पर क्लिक करते वक़्त 

जब तुम कहोगे 

कि मुस्कराओ,

तो मैं मुस्करा नहीं पाऊंगा.


मुझे नहीं आती

अन्दर से दुखी होकर 

बाहर से मुस्कराने की कला 

और तुम नहीं चाहोगे 

कोई ऐसा फ़ोटो खींचना,

जो सच बयाँ करे.

शुक्रवार, 11 सितंबर 2020

४७९. अनुभूति

silhouette of trees near mountain during sunset

आज कहीं नहीं जाना,

तो ऐसा करो,

अपने अन्दर उतरो,

गहरे तक उतरो.


तुम हैरान रह जाओगे,

वहां तुम्हें जाले मिलेंगे,

गन्दगी मिलेगी,

फैली हुई मिलेगी 

सड़ांध हर कोने में.


अपने अन्दर उतरोगे,

तो तुम्हें वह सब मिलेगा,

जो तुम हमेशा सोचते थे 

कि तुम्हारे अन्दर नहीं,

कहीं बाहर है.

मंगलवार, 8 सितंबर 2020

४७८. तीन कविताएँ


'रागदिल्ली' वेबसाइट पर प्रकाशित मेरी तीन कविताएँ.

बारिश से

बारिश, आज ज़रा जम के बरसना,
उन काँपती बूढ़ी हथेलियों में
थोड़ी देर के लिए ठहर जाना,
बहुत दिन हुए,
उन झुर्रियों को किसी ने छुआ नहीं है....

(पूरा पढ़ने के लिए लिंक खोलें)

https://www.raagdelhi.com/hindi-poetry-onkar/?


शनिवार, 5 सितंबर 2020

४७७.तीर

दशरथ ने चलाया है 

शब्दभेदी वाण,

मारा गया है श्रवण,

अनाथ हो गए हैं 

उसके अंधे माँ-बाप.


अफ़सोस है दशरथ को,

अयोध्यापति है वह,

पर उसके वश में नहीं है 

नुकसान की भरपाई करना.


मैं समझ नहीं पाता 

कि जिनके निशाने अचूक होते हैं,

वे किस अधिकार से 

बिना सोचे समझे 

कहीं भी तीर चला देते हैं?