शनिवार, 9 फ़रवरी 2019

३४५.ठंड में बारिश


बारिश,  
बरसने से पहले
थोड़ा तो सोचा होता
कि अस्पतालों के बाहर
मरीज़ सो रहे हैं। 

थोड़ा तो सोचा होता
कि फुटपाथों पर
कुछ बच्चे, कुछ बूढ़े
कुछ महिलाएं, कुछ पुरुष
सो रहे हैं। 

बारिश
तुमने बहुत ग़लत किया
जो घरों से बाहर थे
तुमने एक बार फिर
उन्हें बेघर कर दिया।

रविवार, 3 फ़रवरी 2019

३४४. रिटायरमेंट के बाद का दिन

बड़ी सुहानी सुबह है आज,
रज़ाई थोड़ी कुनकुनी सी है,
अभी अभी खुली है नींद,
पर आज नहीं बजा अलार्म।

पंछी चहचहा रहे हैं कहीं,
आवाज़ लगा रहा है दूधवाला,
कमरे में बिखरने को बेताब है
मोटे परदे के पार की धूप।

उबल रही है चाय पतीले में,
ख़ुशबू फैल रही है घर भर में,
रबर से बंधा पड़ा है अख़बार,
बाल्टी भर रही है गुसलखाने में।

यहीं कहीं पड़ा होगा ब्रीफ़केस,
बिख़रे होंगे टिफिन के डिब्बे,
कोई डर नहीं है आज मुझे
किसी बायोमिट्रिक मशीन का।



शनिवार, 26 जनवरी 2019

३४३. कोमल पत्ते


वसंत ने दस्तक दी है,
हल्की-सी ठंडी हवा चली है,
कांप उठे हैं नए कोमल पत्ते।

मत रोको उन्हें,
कुछ ग़लत नहीं है 
उनके सिहरने में,
इस उम्र और इस मौसम में 
ऐसा ही होता है.

अगर रोकोगे उन्हें,
तो पीले पड़ जाएंगे, 
तुम जैसे हो जाएंगे। 

शनिवार, 19 जनवरी 2019

३४२. रेलगाड़ी


मुझे रेलगाड़ी अच्छी लगती है,
दौड़ती चली जाती है
दो पटरियों पर लगातार, 
जैसे ध्यान-मग्न हो.

दिखाती चलती है 
धरती के अलग-अलग रंग,
मिलाती है अजनबियों से,
रुक जाती है प्लेटफ़ॉर्म पर 
सब के लिए बाहें फैलाए.

वैसे तो हवाई जहाज 
बड़ी जल्दी पहुंचा देता है 
अपनी मंज़िल पर,
मगर उसमें यात्रा का 
वह आनंद कहाँ,
जो रेलगाड़ी में है.

मुझे हवाई जहाज 
इसलिए भी पसंद नहीं 
कि वह हवा में उड़ता है 
और मुझे अच्छा लगता है 
ज़मीन से जुड़े रहना.

शुक्रवार, 11 जनवरी 2019

३४१. कविता का अर्थ


ज़रा-सी देर में मैंने 
लिख डाली एक कविता,
फिर सालों-साल निकलते रहे 
उसके कई-कई अर्थ.

जैसे एक नहीं,
कई कविताएं लिख दी हों मैंने,
फिर सौंप दिया हो उन्हें 
अनगिनत पाठकों को.

जो कविता लिखी थी मैंने,
छोड़ गई मुझको,
मुझसे बिछड़कर जैसे 
हवा में बिखर गई. 

अब मैं लिखूंगा 
एक और कविता,
संभालकर रखूँगा उसे, 
वह सिर्फ़ मेरी होगी 
और उसका अर्थ भी 
सिर्फ़ मेरा होगा.