शनिवार, 16 जून 2018

३१३. अमलतास से


अच्छे लगते हो तुम अमलतास,
जब खिल उठते हो वसंत में,
पर मैं जब तुम्हें देखता हूं,
तो सोचता हूं
कि तुम इतने पीले क्यों हो.

तुम सुंदर तो बहुत हो,
पर कमज़ोर भी लगते हो,


मेरी मानो अमलतास,
तो बगल में खड़े गुलमोहर से
थोड़ी सी सुर्ख़ी ले लो,
सुंदर भी लगोगे, ताकतवर भी,
वरना बेवजह पत्थर झेलोगे.

जो कमज़ोर दिखते हैं,
उन्हें अपनी ख़ूबियों के बावज़ूद
पत्थर खाने ही पड़ते हैं.

शनिवार, 9 जून 2018

३१२. तितलियां


आजकल ख़तरे में हैं तितलियां।

आजकल कोई भी, 
कहीं भी,
किसी भी तितली के
पर नोच सकता है,
महफूज़ नहीं हैं आजकल तितलियां।

नहीं मिलती आजकल
रंग - बिरंगी,मस्त,
उड़नेवाली तितलियां,
ऐसी तितलियों पर
प्रतिबंध है आजकल।

खुले घूमते हैं नोचने वाले,
तितलियों से पूछा जाता है,
क्या किया उन्होंने
कि नोच लिए गए उनके पर।

दरवाजे बंद हैं सब
तितलियों के लिए,
अब ख़ुद ही करनी होगी उन्हें 
अपने परों की हिफाज़त,
तमाम तितलियों के लिए
यह परीक्षा का समय है।

रविवार, 27 मई 2018

३११. बारिश


क्या तुमने कभी रात में 
बिस्तर पर लेटे-लेटे
छत पर टपकती 
बारिश की बूंदों को सुना है?

कभी धीरे से,
तो कभी ज़ोर से
बारिश की बूँदें 
तुम्हें पुकारती हैं,
तुमसे बात करना चाहती हैं,
पर तुम जागकर भी 
कुछ सुन नहीं पाते.

कहीं नाराज़ न हो जाएं 
ये बारिश की बूँदें,
छोड़ न दें 
तुम्हारी छत पर बरसना,
पर क्या फ़र्क पड़ेगा तुम्हें,
तुम्हें तो मालूम ही नहीं 
कि छत पर बरसती बूंदों का 
संगीत कैसा होता है?

मेरी मानो,
कंक्रीट की छत हटा दो,
टीन की डाल लो,
इतनी ग़रीबी में भी क्या जीना 
कि बारिश की आवाज़ भी न सुने.

शनिवार, 5 मई 2018

310. लोग

बड़े स्वार्थी होते हैं लोग,
अपना काम हो,
तो गधे को भी 
बाप बना लेते हैं,
काम निकल जाने के बाद 
दूध से मक्खी की तरह 
निकाल फेंकते हैं 
किसी को भी.

एहसानफ़रमोश होते हैं लोग,
धोखेबाज़ भी,
ज़रूरत पड़े,
तो किसी की भी पीठ में 
छुरा भोंक सकते हैं.

दोगले होते हैं लोग,
अपने लिए उनके नियम अलग 
और दूसरों के लिए अलग होते हैं,
अंदर से वे वैसे नहीं होते,
जैसे बाहर से दिखते हैं,
वे कहते कुछ और हैं, 
सोचते कुछ और हैं.

मुझे पूरा यक़ीन है
कि जो मैंने कहा है,
बिल्कुल सही है,
क्योंकि मैं ख़ुद भी 
ऐसा ही हूँ.

गुरुवार, 26 अप्रैल 2018

309. इंसान

वह आदमी,
जिससे मैं सुबह मिला था,
कमाल का इंसान था,
बड़ा दयावान,
बड़ा संवेदनशील,
किसी का बुरा न करनेवाला,
किसी का बुरा न चाहनेवाला,
सब की खुशी में खुश,
सबके दुख में दुखी.

वही आदमी जब शाम को मिला,
तो बदला हुआ था,
निहायत घटिया किस्म का,
दूसरों के दर्द से बेपरवाह,
स्वार्थी, संवेदनहीन,
पीठ में छुरा भोंकनेवाला।

मैं सोचता हूँ,
सुबह का इंसान 
शाम तक अमानुष कैसे बन जाता है,
सचमुच आसान नहीं होता 
इन्सानों को समझना.