शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017

२५७. वह दुनिया

जी करता है,
फिर से संकरी पगडंडियों पर चलूँ,
लहलहाते धान के खेतों को देखूं,
फूलों पर पड़ी ओस की बूंदों को छूऊँ,
ताज़ी ठंडी हवा जी भर के पीऊँ.

जी करता है,
टीन के छप्पर पर रात को बरसती 
बारिश का संगीत सुनूँ,
आँगन में लगे आम के पेड़ पर 
उग आए बौरों को देखूं.

जी तो बहुत करता है,
पर अब वह दुनिया कहाँ से लाऊँ,
जिसे इस दुनिया के लिए 
मैंने बहुत पहले बदल दिया था.

शुक्रवार, 14 अप्रैल 2017

२५६. मंज़िल

मुसाफ़िर,
न जाने क्यों मुझे लगा 
कि मैं तुम्हारी मंज़िल हूँ.

इसमें तुम्हारा क़सूर नहीं,
मेरी ही ग़लती थी 
कि मुझे ऐसा लगा,
पर जब लग ही गया,
तो मुसाफ़िर,
बस इतना कर देना 
कि जब मेरी गली से गुज़रो,
तो मेरी ओर देख लेना.

अगर देख कर मुस्करा सको,
तो और भी अच्छा,
मुझे लगेगा 
कि मेरी ग़लतफ़हमी से 
तुम नाराज़ नहीं हो,
मुझे लगेगा 
कि मैं तुम्हारी मंज़िल नहीं था,
पर मुझे मेरी मंज़िल मिल गई.

शुक्रवार, 7 अप्रैल 2017

२५५. अहम्

मुझे पता था
कि तुम दरवाज़े पर हो,
तुम्हें भी पता था 
कि मुझे पता है.

मैं इंतज़ार करता रहा 
कि तुम दस्तक दो,
तुम सोचती रही 
कि मैं बिना दस्तक के 
खोल दूं दरवाज़ा.

दोनों ही चाहते थे 
कि दरवाज़ा खुल जाय,
पर न तुमने दस्तक दी,
न मैंने दरवाज़ा खोला. 

शनिवार, 1 अप्रैल 2017

२५४. नीयत

अर्जुन, तुम्हें याद है ?
द्रोणाचार्य ने मुझसे 
गुरु-दक्षिणा में 
अंगूठा माँगा था,
उस ज्ञान के लिए,
जो उन्होंने मुझे दिया नहीं,
मैंने उनसे लिया था.

दुर्भावना थी उनके मन में,
कोई विराट उद्देश्य नहीं था,
बस एक चाह थी
कि कोई निकल न जाय 
तुमसे आगे....
इसके लिए चाहे जो करना पड़े-
अनीति,अधर्म,छल-कपट.

अर्जुन, नादान था मैं,
सच में उन्हें गुरु मान बैठा,
उनकी चालाकी से बेख़बर 
झट से अपना अंगूठा दे दिया,
उस गुरु-दक्षिणा का वे क्या करते?
क्या भला होना था उससे किसी का?

अर्जुन, अंगूठा खोकर मैंने जाना 
कि देना तभी चाहिए,
जब माँगनेवाले की नीयत ठीक हो.


शुक्रवार, 24 मार्च 2017

२५३. मैं और वो

शहर की सुंदर लड़की,
तेज़-तर्रार,
नाज़-नखरेवाली,
साफ़-सुथरी,
सजी-धजी,
शताब्दी ट्रेन की तरह 
सरपट दौड़ती.

मैं, गाँव का लड़का,
सीधा-सादा, भोला-भाला,
पटरी पर खड़ा हूँ,
जैसे कोई पैसेंजर ट्रेन.

उसे मुझसे आगे निकलना है.