शुक्रवार, 15 सितंबर 2017

२७७. मदद

मैं सोया हुआ हूँ,
पर साँसें चल रही हैं,
दिल धड़क रहा है,
रक्त शिराओं में बह रहा है.

मैं सोया हुआ हूँ,
पर ये सब जाग रहे हैं,
काम पर लगे हुए हैं,
ताकि मैं सो भी सकूं,
ज़िन्दा भी रह सकूं.

शुक्रवार, 8 सितंबर 2017

२७६. पिता

तुम्हारे जाने के बाद मैंने जाना 
कि कितना चाहता था मैं तुम्हें.
जब तुम ज़िन्दा थे,
पता ही नहीं चला,
चला होता तो कह ही देता,
बहुत ख़ुश हो जाते तुम,
मैं भी हो जाता 
अपराध-बोध से मुक्त.

ऐसा क्यों होता है 
कि एक ज़िन्दगी गुज़र जाती है
और हमें इतना भी पता नहीं चलता 
कि हम किसको कितना चाहते हैं.

शनिवार, 2 सितंबर 2017

२७५. बूढ़ा चिड़िया से



चिड़िया, क्यों चहचहा रही हो
मेरी खिड़की पर बैठ कर?
क्यों जगा रही हो मुझे 
सुबह-सवेरे?
कौन है जिसे इंतज़ार है
मेरे जगने का?
कौन सा काम रुक जाएगा 
मेरे सोए रहने से?

चिड़िया, तुम्हें नहीं मालूम 
कि अकेले-अकेले दिन काटना 
कितना मुश्किल होता है,
कितनी चुभती है 
अनदेखी अपनों की,
कितना सालता है 
पल-पल का अपमान.

चिड़िया, तुम जो दिनभर उड़ती रहती हो,
ख़ुशी से चहचहाती रहती हो,
तुम्हें क्या मालूम 
कि चुपचाप बैठे रहने से 
चुपचाप सोए रहना ज़्यादा अच्छा है.

शनिवार, 26 अगस्त 2017

२७४. मसालेदार कविता

कविता लिखो,
तो सादी मत लिखना,
कौन पसंद करता है आजकल 
सादी कविता ?
तेज़ मसाले डालना उसमें,
मिर्च डालो,
तो तीखी डालना,
ऐसी कि पाठक पढ़े,
तो मुंह जल जाय उसका,
आंसू निकल जायँ उसके,
पता चल जाय उसे 
कि किसी कवि से पाला पड़ा था.

कविता लिखो,
तो रेसिपी ऐसी रखना 
कि समझ ही न पाए पाठक 
कि वह बनी कैसे है.

ऐसी कविता लिख सके तुम,
तो डर जाएगा पढ़नेवाला,
वाह-वाह कर उठेगा
और अगर सादी कविता लिखी,
उसकी समझ में आ गई,
तो हो सकता है 
वह तुम्हें कवि मानने से ही 
इन्कार कर दे.  


शनिवार, 19 अगस्त 2017

२७३. अस्तित्व


रेलगाड़ी की दो पटरियां 
एक दूसरे का साथ देती 
चलती चली जाती हैं 
एक ही मंजिल की ओर.

सर्दी-गर्मी,धूप-बरसात 
सब साथ-साथ सहती हैं,
फिर भी बनाए रखती हैं
अपना अलग अस्तित्व.

रेलगाड़ी की पटरियां सिखाती हैं 
कि दो लोग कितने ही क़रीब क्यों न हो,
उन्हें इतना क़रीब नहीं होना चाहिए 
कि अपना अस्तित्व ही खो दें.