मंगलवार, 15 सितंबर 2020

४८१. इन दिनों



आजकल मेरे साथ कोई नहीं,

पर मैं अकेला नहीं हूँ.


सुबह-सवेरे आ जाते हैं 

मुझसे मिलने परिंदे,

मैं बालकनी में 

आराम-कुर्सी पर बैठ जाता हूँ,

मुंडेर पर जम जाते हैं वे,

फिर ख़ूब बातें करते हैं हम.


मैं खिड़की के पार 

पेड़ों पर उग आईं

कोमल पत्तियों को देखता हूँ,

हवा में झूमती 

डालियों को देखता हूँ.


मैं गमलों में खिल रहे 

फूलों को देखता हूँ,

कलियों को देखता हूँ,

जो फूल बनने के इंतज़ार में हैं.


मैं देखता हूँ 

आकाश को लाल होते,

सूरज को निकलते,

उसे रंग बदलते.


शाम को सूरज से मिलने 

मैं फिर पहुँच जाता हूँ,

देखता हूँ उसका रंग बदलना

और धीरे-धीरे डूब जाना.


रात को बालकनी से 

मैं देखता हूँ घटते-बढ़ते चाँद को,

बादलों से उसकी लुकाछिपी,

फिर थककर सो जाता हूँ.


आजकल मैं अकेला नहीं हूँ,

न ही फ़ुर्सत में हूँ,

आजकल मैं उनके साथ हूँ 

जिनकी मैंने हमेशा अनदेखी की है.


8 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज बुधवार 16 सितंबर 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

    जवाब देंहटाएं
  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (18-09-2020) को   "सबसे बड़े नेता हैं नरेंद्र मोदी"  (चर्चा अंक-3828)   पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।  
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ 
    सादर...!--
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 

    जवाब देंहटाएं
  3. वाह!!!
    बहुत ही सुन्दर सटीक भावाभिव्यक्ति।

    जवाब देंहटाएं
  4. आजकल मैं अकेला नहीं हूँ,

    न ही फ़ुर्सत में हूँ,

    आजकल मैं उनके साथ हूँ

    जिनकी मैंने हमेशा अनदेखी की है.
    बहुत सुंदर।

    जवाब देंहटाएं