बुधवार, 2 सितंबर 2020

४७६. बादलों से

Cloudy, Dark, Full Moon, Luna, Moon

बादलों,

मैं चाँद को देख रहा था 

और चाँद मुझे,

तुम क्यों आ गए बीच में ?

इतनी बड़ी दुनिया में 

कहीं भी चले जाते,

बस चाँद-भर आकाश छोड़ देते,

बाक़ी सब तुम्हारा था.

***

बादलों,

चाँद को छिपाकर

इतना मत इतराओ,

मैं देख सकता हूँ उसे 

आँखें बंद करके,

तुम्हारे होते हुए भी.

***

बादलों,

मैं कब से इंतज़ार में था 

कि चाँद निकले,

वह निकला भी,

पर तुमने उसे छिपा लिया,

बिना उससे पूछे 

कि वह छिपना चाहता था क्या?

अब हट भी जाओ रास्ते से,

तुम्हें नहीं पता,

पर मैं जानता हूँ 

कि चाँद बहुत उदास होगा.

15 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज गुरुवार 03 सितंबर 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार ४ सितंबर २०२० के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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  3. बेहतरीन सृजन।बहुत सुंदर।

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  4. गहन भाव लिए उत्कृष्ट सृजन

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  5. चाँद से अच्छी खासी चैट हो गयी... और बातों-बातों में कविता हो गयी एकदम आसान और सरल भाषा में... हाँ बातें हुईं बड़ी गहरीवाली... बधाई भाई जी...

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  6. " इतनी बड़ी दुनिया में

    कहीं भी चले जाते,

    बस चाँद-भर आकाश छोड़ देते,

    बाक़ी सब तुम्हारा था."- सारगर्भित रचना/विचार ...

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  7. वाह ! चाँद और बादलों से अच्छी सी गुफ्तगू ! सुंदर रचना !

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  8. वाह!!!
    बहुत ही सुन्दर मनभावन सृजन
    लाजवाब।

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  9. वाह बहुत सुंदर।
    तुमने पूछा उससे
    कि वह छिपना चाहता था क्या?
    अब हट भी जाओ रास्ते से,
    हो सकता है,चाँद उदास हो।
    सुंदर प्रस्तुति।

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  10. प्रकृति के रात्रिकालीन परिवेश को अनुभूत कराती सुन्दर रचना।

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