रविवार, 18 नवंबर 2012

५६. मेरे अलावा

आजकल जिससे भी मिलता हूँ,
उसमें कमी नज़र आती है मुझे,
किसी का चेहरा-मोहरा नहीं जंचता
तो किसी की चाल-ढाल,
किसी का चाल-चलन चुभता है,
तो किसी के बोलने का अंदाज़,
किसी के मुंह की दुर्गन्ध नहीं सुहाती,
तो किसी के पसीने की बदबू.

आजकल जल्दी उकता जाता हूँ मैं,
बना नहीं पाता किसी को भी अपना,
भागता फिरता हूँ हर किसी से,
बस खुद के साथ रहता हूँ मैं.

आजकल बहुत परेशान हूँ मैं,
यही सोचता रहता हूँ 
कि बाकी सब वैसे क्यों नहीं 
जैसा मैं हूँ,
मेरे अलावा ऐसा कोई क्यों नहीं 
जो मुझे अच्छा लगे.

8 टिप्‍पणियां:

  1. जैसा मैं हूँ,
    मेरे अलावा ऐसा कोई क्यों नहीं
    जो मुझे अच्छा लगे.,,,bahut acchee,vichaar

    recent post...: अपने साये में जीने दो.

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  2. मन दुविधा में हो तो
    ऐसा होता है..

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  3. ये बैचेनी कुछ दिनों की मेहमान है....
    खुद से नाखुश आखिर कब तक रहा जा सकता है :-)

    सादर
    अनु

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  4. ye pareshani to aaj sabhi ko hai vyakul bhavon ko bahut sundar shabdon me abhivyakt kiya hai aapne.

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  5. भावमय करते शब्‍द ... बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

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  6. शब्दों की जीवंत भावनाएं.सुन्दर चित्रांकन,पोस्ट दिल को छू गयी..कितने खुबसूरत जज्बात डाल दिए हैं आपने.बहुत खूब.
    बहुत सुंदर भावनायें और शब्द पोस्ट दिल को छू गयी.......कितने खुबसूरत जज्बात डाल दिए हैं आपने...बहुत खूब.आपका ब्लॉग देखा मैने और नमन है आपको और बहुत ही सुन्दर शब्दों से सजाया गया है लिखते रहिये और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.

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