रविवार, 26 फ़रवरी 2012

२३.गृहिणी 


सुबह से शाम तक जुटी रहती है गृहिणी,
चौका-चूल्हा,झाड़ू-पोंछा,खेत-खलिहान,
हर जगह पिली रहती है गृहिणी.


खाना कम, डांट ज्यादा खाती है गृहिणी,
बात-बात पर झिड़की,अपमान अनदेखी,
मर-मर कर जीती रहती है गृहिणी.


सब कुछ चुपचाप सहती है गृहिणी,
देखकर अनदेखा,सुनकर अनसुना,
बस मन ही मन उबलती है गृहिणी.


गृहिणी को पसंद है ओखली-मूसल, सिलबट्टा,
कूट डालती है अन्दर का सारा गुस्सा,
पीस डालती है सारी टीस चटनी के साथ 
तैयार हो जाती है अगले दिन के लिए गृहिणी.

11 टिप्‍पणियां:

  1. गृहिणी को पसंद है ओखली-मूसल, सिलबट्टा,
    कूट डालती है अन्दर का सारा गुस्सा,
    पीस डालती है सारी टीस चटनी के साथ
    तैयार हो जाती है अगले दिन के लिए गृहिणी.

    सटीक भावभिव्यक्ति

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  2. गृहिणी को पसंद है ओखली-मूसल, सिलबट्टा,
    कूट डालती है अन्दर का सारा गुस्सा,
    पीस डालती है सारी टीस चटनी के साथ
    तैयार हो जाती है अगले दिन के लिए गृहिणी.

    ....बहुत सटीक और सुंदर प्रस्तुति...

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  3. तैयार होने में ही तो बहुत कुछ छुपा है ...

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  4. सच कहा....मगर कई सकारात्मक पहलु भी हैं गृहिणी के....

    अच्छी रचना..
    बधाई.

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  5. yadi aap mere dwara sampadit kavy sangrah mein shamil hona chahte hain to sampark karen
    rasprabha@gmail.com

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  6. अति उत्तम,सराहनीय प्रस्तुति,सुंदर रचना के लिए बधाई ....

    NEW POST काव्यान्जलि ...: चिंगारी...

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  7. सुन्दर सृजन , बधाई.

    मेरे ब्लॉग meri kavitayen की नवीनतम प्रविष्टि पर आप सादर आमंत्रित हैं.

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  8. सुन्दर प्रस्तुति.
    पर सब ग्रहणी एक् सी कहाँ होतीं हैं.

    आपके ब्लॉग पर पहली दफा आया हूँ.
    बहुत अच्छा लगा आपको पढकर.

    मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है.

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