शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

२२.वसंत


कितना सुंदर है वसंत!


बीत गए दिन अब
कडकडाती सर्दी के,
ख़त्म हुई खींचतान
फटी-पुरानी चादर-सी
कम्बल के लिए.


नहीं चिपकना पड़ता अब
लड़ाई के बाद भाई से,
नहीं सहनी पड़ती रातों को
बदबू उसके बदन की -
तपिश की खोज में.


नहीं खोजनी पड़ती टहनियां 
सुबह से शाम तक 
ताकि रातें बीत सकें 
उनके सहारे जैसे-तैसे.


जाड़े को लील गया,
कितना सुन्दर है वसंत!

10 टिप्‍पणियां:

  1. भावपूर्ण बहुत अच्छी अभिव्यक्ति,..सुंदर रचना...

    MY NEW POST ...काव्यान्जलि...सम्बोधन...

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  2. वाह!!!!!भावपूर्ण बहुत अच्छी अभिव्यक्ति,सुंदर रचना

    MY NEW POST ...सम्बोधन...

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  3. नहीं खोजनी पड़ती टहनियां
    सुबह से शाम तक
    ताकि रातें बीत सकें
    उनके सहारे जैसे-तैसे.... अब तो पंखे का वक़्त आ गया

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  4. अब तो साथ फूलों का है....
    बहुत सुन्दर..

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  5. बहुत ख़ूबसूरत वसन्त का स्वागत...

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  6. bahut sundar rachna. sheet aur vasant ke sath manviye samvedna ka judaav, bahut achchhe bhaav. shubhkaamnaayen.

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  7. बहुत,बेहतरीन अच्छी प्रस्तुति,सुंदर सटीक रचना के लिए बधाई,.....
    मै पहले से ही आपका समर्थक बन गया हूँ आप भी बने मुझे खुशी होगी

    NEW POST...काव्यांजलि...आज के नेता...
    NEW POST...फुहार...हुस्न की बात...

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  8. खूबसूरत प्रस्तुति है आपकी.

    जाते जाते भी जाड़ा बसंत को टंगड़ी मार ही देता है,ओंकार जी.

    आभार.

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