गुरुवार, 6 सितंबर 2012

४७.जूता

बहुत बुरा लगा मुझे,
जब उसने पहली बार पावों में डालकर
मुझे धूल,मिट्टी और कीचड़ में घसीटा.

अपमानित महसूस किया मैंने,
बहुत कसमसाया,बहुत कुनमुनाया,
यहाँ तक कि उसके मुलायम पावों को 
कहीं-कहीं से काट खाया,
पर वह ढीठ बना रहा,
मुझे ऊपर उठने ही नहीं दिया.

अब मैं अपमान का आदी हो गया हूँ,
न कसमसाता हूँ, न कुनमुनाता हूँ,
न काट खाने की कोशिश करता हूँ,
बस उसके पावों की हिफाज़त करता हूँ,
उसके आराम का ख्याल रखता हूँ.

कभी-कभी वह मेरी धूल झाड़ देता है,
मुझ पर पालिश कर देता है,
मैं सम्मानित महसूस करता हूँ,
मारे खुशी के मैं दमक उठता हूँ.

7 टिप्‍पणियां:

  1. जूते की व्यथा कथा....
    लोग तो इंसानों से ऐसा व्यवहार करते हैं....फिर ये तो जूता है..

    गहन रचना..
    सादर
    अनु

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  2. उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।

    बूता जूता का घटा, लटा बड़ा है पैर |
    बारह घंटे नित खटा, बारह पैर बगैर |
    बारह पैर बगैर, सैर पर सुबह सवेरे |
    दौडाए है ढेर, शाम तक पूरा पेरे |
    निकल गई सब अकड़, जकड़ न पाए जूता |
    लतियाया इस कदर, ख़तम है रविकर बूता ||

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  3. अनुपम भाव लिए बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

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  4. sir,mujhe toh jute mai ek lachar aadmi ki parchai nazar aayi.,.bahoot sundar bhav.,.kavi sochta hu unke liye kya mangalwar aur kya brihaspatwar,,,agar iss din v baasi maans mil jaye toh bhagwan se kya darna.,.aapke shabd sahi jagah pe prahar karte hain,,.bahoot badhiya

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  5. बेहतर प्रस्तुति किया,एक जूते की कथा
    सहता कष्ट दूसरों का,होती क्या है व्यथा,,,,,,

    बहुत बढ़िया बेहतरीन प्रस्तुति,,,,
    RECENT POST,तुम जो मुस्करा दो,

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  6. कभी-कभी वह मेरी धूल झाड़ देता है,
    मुझ पर पालिश कर देता है,
    मैं सम्मानित महसूस करता हूँ,
    मारे खुशी के मैं दमक उठता हूँ....
    .........बेहतरीन प्रस्तुति....

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