रविवार, 30 सितंबर 2012

५०.बारिश

जब आकाश में बादल छाए,
लगा कि तुम रूठ गई,
फिर अचानक बिजली चमकी,
जैसे एक झलक मिली 
और फिर तुम गायब.

जब बादल जोर से टकराए, 
लगा, मेरी किसी बात पर 
तुम्हें गुस्सा आ गया.

कभी-कभार का तुम्हारा थोड़ा सा प्यार,
जैसे अचानक बूंदा-बांदी हुई 
और बस...

सूख रही हैं उम्मीदें,
अब तो तरस खाओ,
मेरे छप्पर पर एक बार 
जम के बरस जाओ.

6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर रचना...
    मन के भावो की कोमल अभिव्यक्ति...
    :-)

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  2. waah ..kya baat ..bahoot badhiya sir,,koi mujhe plz ye btaye ki kaise hindi mai comment karte hain..

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  3. कोमलता से कही मन की बात ॥
    शुभकामनायें ...

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  4. waah....
    bahut khoobsoorat...

    tum barso aur indradhanush khilga mere aakaash mei...

    saadar

    anu

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