शुक्रवार, 15 दिसंबर 2017

२८९. राक्षस

कभी अपने अन्दर का 
राक्षस देखना हो,
तो उग्र भीड़ में 
शामिल हो जाना.

जब भीड़ से निकलो,
तो सोचना 
कि जिसने पत्थर फेंके थे,
आगजनी की थी,
तोड़-फोड़ की थी,
बेगुनाहों पर जुल्म किया था,
जिसमें न प्यार था, न ममता,
न इंसानियत थी, न करुणा,
जो बिना वज़ह 
पागलों-सी हरकतें कर रहा था,
वह कौन था?

उसे जान लो,
अच्छी तरह पहचान लो,
देखो, तुम्हें पता ही नहीं था 
कि वह तुम्हारे अन्दर ही 
कहीं छिपा बैठा है.

6 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (17-12-2017) को
    "लाचार हुआ सारा समाज" (चर्चा अंक-2820)

    पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. सत्य कहा, एकदम सत्य ! अर्थपूर्ण तर्क

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  3. बहुत अर्थपूर्ण ...
    काश की कोई हर कोई इस राक्षस को पहचान सके ...

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  4. बहुत सुदर और सार्थक अभिव्यक्ति....

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