शनिवार, 19 अगस्त 2017

२७३. अस्तित्व


रेलगाड़ी की दो पटरियां 
एक दूसरे का साथ देती 
चलती चली जाती हैं 
एक ही मंजिल की ओर.

सर्दी-गर्मी,धूप-बरसात 
सब साथ-साथ सहती हैं,
फिर भी बनाए रखती हैं
अपना अलग अस्तित्व.

रेलगाड़ी की पटरियां सिखाती हैं 
कि दो लोग कितने ही क़रीब क्यों न हो,
उन्हें इतना क़रीब नहीं होना चाहिए 
कि अपना अस्तित्व ही खो दें.

11 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (20-08-2017) को "चौमासे का रूप" (चर्चा अंक 2702) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" रविवार 20 अगस्त 2017 को लिंक की गई है.................. http://halchalwith5links.blogspot.com पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  3. वाह्ह्ह....लाज़वाब भाव लिए सुंदर रचना आपकी।

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  4. बहुत उम्दा ! आभार
    "एकलव्य"

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  5. बहुत सुन्दर यथार्परक सृजन। बधाई।

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  6. बहुत सुंदर भावनाओं से ओत-प्रोत

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  7. उन्हें इतना क़रीब नहीं होना चाहिए
    कि अपना अस्तित्व ही खो दें......बहुत सुन्दर!!!

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  8. कई बार ऐसे में जब अस्तित्व खो जाता है तो परिणाम भयानक हो जाते हैं ...
    अर्थपूर्ण रचना ...

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