शुक्रवार, 19 मई 2017

२६१. पैसेंजर और राजधानी


धीरे-धीरे बढ़ रहा हूँ 
मैं तुम्हारी ओर,
जैसे बढ़ती है 
कोई पैसेंजर गाड़ी 
हर स्टेशन पर रुकती,
यात्रियों को चढ़ाती-उतारती.

लगता है,
यूँ ही रुकते-रुकाते,चलते-चलाते,
तुमसे हो ही जाएगी मुलाक़ात,
पर मेरा मुंह चिढ़ाती,
राजधानी ट्रेन की तरह 
तुम सर्र से निकल मत जाना.

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (21-05-2017) को
    "मुद्दा तीन तलाक का, बना नाक का बाल" (चर्चा अंक-2634)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  2. जी हाँ,चलते ही जाना है।
    संदेश देती सुंदर रचना।

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