शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017

२५७. वह दुनिया

जी करता है,
फिर से संकरी पगडंडियों पर चलूँ,
लहलहाते धान के खेतों को देखूं,
फूलों पर पड़ी ओस की बूंदों को छूऊँ,
ताज़ी ठंडी हवा जी भर के पीऊँ.

जी करता है,
टीन के छप्पर पर रात को बरसती 
बारिश का संगीत सुनूँ,
आँगन में लगे आम के पेड़ पर 
उग आए बौरों को देखूं.

जी तो बहुत करता है,
पर अब वह दुनिया कहाँ से लाऊँ,
जिसे इस दुनिया के लिए 
मैंने बहुत पहले बदल दिया था.

8 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (23-04-2017) को
    "सूरज अनल बरसा रहा" (चर्चा अंक-2622)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  2. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" रविवार 23 अप्रैल 2017 को लिंक की गई है.... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  3. उम्दा, आपने स्वयं के हाथों खो दी गई अपनी नैसर्गिक खुशी का अच्छा चित्रण किया है। सराहनीय व विचारणीय ।

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  4. सत्य कहा आदरणीय आपने, बीते दिन वापस नहीं आते ,सुन्दर रचना !आभार

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  5. भौतिकता के पसरते अम्बार से व्याकुल मन कुछ इसी तरह भटकता है और आज व बीते कल की तुलना करता हुआ कल्पना में खो जाता है। शोचनीय सवालों का पुंज है यह प्रस्तुति। बधाई।

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  6. बस यह बात समय की साथ ही समझ आती है ...

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  7. सच में,
    "जी तो बहुत करता है, पर अब वह दुनिया कहाँ से लाऊँ,
    जिसे इस दुनिया के लिए, मैंने बहुत पहले बदल दिया था" :(

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