शनिवार, 1 अप्रैल 2017

२५४. नीयत

अर्जुन, तुम्हें याद है ?
द्रोणाचार्य ने मुझसे 
गुरु-दक्षिणा में 
अंगूठा माँगा था,
उस ज्ञान के लिए,
जो उन्होंने मुझे दिया नहीं,
मैंने उनसे लिया था.

दुर्भावना थी उनके मन में,
कोई विराट उद्देश्य नहीं था,
बस एक चाह थी
कि कोई निकल न जाय 
तुमसे आगे....
इसके लिए चाहे जो करना पड़े-
अनीति,अधर्म,छल-कपट.

अर्जुन, नादान था मैं,
सच में उन्हें गुरु मान बैठा,
उनकी चालाकी से बेख़बर 
झट से अपना अंगूठा दे दिया,
उस गुरु-दक्षिणा का वे क्या करते?
क्या भला होना था उससे किसी का?

अर्जुन, अंगूठा खोकर मैंने जाना 
कि देना तभी चाहिए,
जब माँगनेवाले की नीयत ठीक हो.


9 टिप्‍पणियां:

  1. वाह....
    एक कटु सत्य का वर्णन
    सादर

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  2. बहुत ख़ूब ... इतिहास में कई प्रश्न शायद इसलिए ही छोड़े हैं की भविष्य में जवाब लिया जा सके ...

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (02-04-2017) को
    "बना दिया हमें "फूल" (चर्चा अंक-2613
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  4. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" रविवार 02 अप्रैल 2017 को लिंक की गई है.... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  5. तार्किक, सुंदर रचना आभार "एकलव्य"

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  6. एकलव्य ने वहीं किया जो सहीं था, लेकिन गुरू ने वो मांग जो सहीं नहीं कहीं जा सकती.

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  7. बहुत तार्किक और संदर्भित सुन्दर कविता

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  8. बहुत प्रभावपूर्ण रचना......
    मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपके विचारों का इन्तज़ार.....

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