शनिवार, 4 फ़रवरी 2017

२४६. गाँव का स्टेशन

गाँव के लोग उठ जाते हैं 
मुंह अँधेरे,
पर गाँव का स्टेशन सोया रहता है.
उसे जल्दी नहीं उठने की,
उठ भी जाएगा तो करेगा क्या?
हांफते-हांफते 
दोपहर बाद पंहुचेगी 
गाँव में रुकनेवाली 
इकलौती पैसेंजर ट्रेन 
और फिर सन्नाटा.
कभी गाड़ी लेट हो जाती है 
या रद्द हो जाती है,
तो अकेलापन महसूस करता है 
गाँव का स्टेशन,
बहुत उदास हो जाता है 
गाँव का स्टेशन,
सोचता है कि अगर वह नहीं होता 
तो भी गाँव को 
शायद ही कोई फ़र्क पड़ता.

6 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी रचना बहुत सुन्दर है। हम चाहते हैं की आपकी इस पोस्ट को ओर भी लोग पढे । इसलिए आपकी पोस्ट को "पाँच लिंको का आनंद पर लिंक कर रहे है आप भी कल रविवार 5 फरवरी 2017 को ब्लाग पर जरूर पधारे ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "अंधा घोड़ा और हम - ब्लॉग बुलेटिन “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

    उत्तर देंहटाएं
  3. बिलकुल यथार्थ ।।।बहुत सुंदर ।।।

    उत्तर देंहटाएं
  4. दुखद पहलु है अब गांव सूने होते जा रहे हैं
    सार्थक चिंतनशील रचना

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सुन्दर और सटीक अभिव्यक्ति...

    उत्तर देंहटाएं