गुरुवार, 23 सितंबर 2021

६०४. शिकायत



माँ,तुम्हारी हालत देखकर 

मुझे तरस आता है,

बहुत तकलीफ़ होती है,

थोड़ा गुस्सा भी आता है. 


आज क्यों मजबूर हो तुम,

क्यों खा रही हो 

दर-दर की ठोकरें,

क्या मिला तुम्हें प्यार लुटा के, 

तुम्हारा त्याग क्यों व्यर्थ गया?


माँ, तुम्हारा हाल मुझसे 

देखा नहीं जाता,

पर मैं कुछ कर नहीं सकती,

क्योंकि मैं तो हूँ ही नहीं,

मैं तो कभी जन्मी ही नहीं,

जन्म से पहले ही 

मुझे मौत दे दी गई, 

उनके इंतज़ार में, 

जिनको तुमने मर कर जीवन दिया,

जिन्होंने तुम्हें जीते जी मौत दी. 


माँ,आज अगर मैं होती,  

तो मेरी और तुम्हारी कहानी 

शायद कुछ और होती,

काश, मैं जन्म ले पाती।


मंगलवार, 21 सितंबर 2021

६०३. मौसम

 


बहुत गर्मी है आज,

सूरज चिलचिला रहा है,

हवाएं ख़ामोश हैं,

पत्ते गुमसुम,

पसीने की जैसे 

नदी बह रही है,

पर आज मौसम अच्छा है,

आज तुम घर जो आ रही हो. 


शनिवार, 18 सितंबर 2021

६०२. कोयल और कौआ



उसकी मीठी बोली पर मत जाना,

बड़ी चालबाज़ है वह, 

उसके अंडे दूसरे ही सेते हैं,

वह ख़ुद डाल पर बैठकर 

कुहू-कुहू करती रहती है. 


कितना आसान होता है 

अपना काम किसी को सौंपकर 

ख़ुद मस्ती में गीत गाना !


मुझे तरस आता है कौए पर,

जो अपनी काँव-काँव से 

सबके कान फोड़ता है,

पर दूसरों के अंडे 

अपने मानकर सेता है.  


मीठा बोलना अच्छा है,

पर भ्रम में मत रहना,

बोली ही सब कुछ नहीं होती.


गुरुवार, 16 सितंबर 2021

६०१.गुलेल



फेंक दो गुलेलें,

एक  यही तो खेल नहीं है.

देखो, पेड़ों की डालियों पर 

सहमे बैठे हैं पंछी,

क्या तुम्हें नहीं भाता 

उनका चहचहाना?

***

अगर नहीं फेंक सकते गुलेल,

तो यूँ कर लो,

पत्थर नहीं, फूल चलाओ,

जितना चाहो,

परिंदों पर बरसाओ. 

***

खेल के नाम पर 

बच्चों के हाथों में 

गुलेल मत दो,

चहचहाते पंछियों को 

ख़ामोश कर देना 

कुछ भी हो सकता है,

खेल नहीं हो सकता. 


सोमवार, 13 सितंबर 2021

६००.दूरी



काश कि मेरी ख़ुशी में 

तुम भी शामिल होते. 


एक वक़्त वह भी था,

जब हर ख़ुशी में 

हम साथ होते थे,

मैं तुम्हारे पास 

या तुम मेरे पास,

पर अब साथ होना 

सपना-सा हो गया है,

अब तुम अशक्त 

और मैं व्यस्त. 

अब तुम्हारे बिना ही मुझे 

मनानी होंगी सारी ख़ुशियाँ. 


अक्सर ऐसा क्यों होता है 

कि जब किसी की ज़रूरत 

सबसे ज़्यादा महसूस होती है,

वह अचानक दूर हो जाता है? 


बुधवार, 25 अगस्त 2021

५९९. गाँव की लड़की

 


गाँव की वह छोटी-सी लड़की 

सुबह-शाम आँगन बुहारती है,

गाय-भैंसों को चारा देती है,

माँ की बनाई हुई रोटियाँ 

खेत में बाप को पहुँचाती है. 


गाँव की वह छोटी-सी लड़की

बिना नाग़ा स्कूल जाती है,

परीक्षा में अच्छे नंबर लाती है,

हर शाम छोटी बहन को 

पाठ तैयार कराती है. 


गाँव की वह छोटी-सी लड़की

घर के हर बीमार को 

डॉक्टर तक ले जाती है, 

दवा, मिट्टी का तेल,राशन-

ज़रूरत का हर सामान 

दौड़कर दुकान से लाती है. 


गाँव की वह छोटी-सी लड़की

बहुत उदास हो जाती है,

जब भी उसके माँ-बाप कहते हैं,

‘काश,हमारे यहाँ बेटा पैदा होता.’


शुक्रवार, 20 अगस्त 2021

५९८. पसंद

 


कभी-कभी मैं सोचता हूँ 

कि तुममें ऐसा क्या है,

जो चाहने लायक हो. 


तुम्हारा गुस्सा,

तुम्हारा लालच,

तुम्हारा ओछापन,

तुम्हारी संवेदनहीनता -

कौन सा ऐसा ऐब है,

जो तुममें नहीं है?


फिर भी न जाने क्यों,

तुम मुझे बहुत पसंद हो,

सबसे ज़्यादा पसंद,

पर मुझे यह बात 

बिल्कुल पसंद नहीं 

कि मैंने बिना वजह तुम्हें 

इतना पसंद किया.


मंगलवार, 17 अगस्त 2021

५९७. सपने

 

मैं सपने नहीं देखता,

कितनी ही कोशिश क्यों न कर लूँ,

कोशिश से नींद तो आ सकती है,

सपने नहीं।


पर कल रात मैंने सपना देखा 

और सपने में गाँधी को,

उन्होंने पूछा,

‘स्वाधीनता दिवस कैसा रहा?’

मैंने कहा,

‘हर साल जैसा.’

उन्होंने कहा,

‘इस साल सपने देखना,

शायद अगला कुछ अलग हो.’

मैंने कहा,

‘मुझे तो सपने आते ही नहीं।’

वे हंसकर बोले,

‘मैं उन सपनों की बात कर रहा हूँ 

जो जागते हुए देखे जाते हैं. 

सोते में देखे गए सपने 

कुछ हासिल कर पाते हैं क्या?

जागते हुए सपने देखोगे,

सबके लिए देखोगे,

तभी देश स्वाधीन होगा.’


गांधीजी चले गए,

मेरी नींद टूट गई,

मैं सोचता हूँ,

सपने देखना आसान नहीं है,

रात को सपने आते नहीं,

और दिन में सपने देखने का 

न समय है, न साहस.


शनिवार, 14 अगस्त 2021

५९६. गुज़ारिश

 


तुमसे गुज़ारिश है कि आ जाओ, 

मैं कोई शिकायत नहीं करूंगा,

न रूठूँगा,न मनाऊँगा,

न पुरानी बातें दोहराऊंगा,

न तुम्हें असमंजस में डालूँगा. 


तुम कहोगी तो मैं चुप रहूंगा,

कुछ नहीं बोलूंगा,

यहाँ तक कि अपने चेहरे पर 

कोई भाव भी नहीं आने दूंगा,

ध्यान रखूंगा कि मेरी आँखों में

कोई चमक न कौंध जाय. 


घबराओ मत,

बस आ जाओ,

तब तक के लिए आ जाओ,

जब तक कि मर-मर के जीने वाला 

जी-जी के मर न जाय.  


रविवार, 8 अगस्त 2021

५९५.नदी

 


मुझे समंदर से मिलना है,

मुझे तेज़-तेज़ बहने दो, 

मत रोको मेरी राह,

मत रोको मेरा प्रवाह. 


सुदूर पर्वतों से आई हूँ,

लंबा सफ़र तय करना है, 

अभी बहुत दूर बहना है,

लक्ष्य तक पहुंचना है. 


जो मैं चलती रही,

तो तुम्हारा भला ही करूंगी,

तुम्हारी प्यास बुझाऊँगी ,

तुम्हारे खेतों को सींचूँगी,

तुम्हारी भूख मिटाऊँगी. 


ओ मेरे तट पर रहने वालों,

थोड़ा तो क़ाबू रखो ख़ुद पर,

तुम्हारे आत्मघाती लालच की

कोई हद है या नहीं ?


कहीं ऐसा न हो जाय 

कि विकराल रूप दिखाना पड़े मुझे  ,

विध्वंस पर उतरना पड़े

या बिना मंज़िल तक पहुंचे 

बीच में ही मर जाना पड़े. 


मुझे बहने दो, 

मुझे जीने दो,

मेरा जीवित रहना 

तुम्हारे जीने के लिए ज़रूरी है.


गुरुवार, 5 अगस्त 2021

५९४.जन्मदिन


मुझे अपना जन्मदिन अच्छा लगता है,

क्योंकि उस दिन तुमसे बात होती है. 


यूँ  तो तुम फ़ोन कर लेते हो कभी भी,

होली-दिवाली या उसके बिना भी,

पर मेरे जन्मदिन की शुरुआत 

तुम्हारे फ़ोन से ही होती है. 


जो होना तय है,

उसके इंतज़ार में मज़ा है,

जो अचानक हो जाय,

उसमें इंतज़ार का मज़ा कहाँ?


काश ऐसा हो सकता 

कि साल में एक से ज़्यादा 

जन्मदिन हुआ करते 

और हर जन्मदिन पर 

तुम्हारा फ़ोन आया करता. 


मंगलवार, 3 अगस्त 2021

५९३. शहर



इस शहर में कुछ नहीं बदला,

यहाँ सड़कें वही हैं,

मकान वही हैं,

बाज़ार वही हैं. 

गाड़ियाँ वही हैं.


हाँ, थोड़ा सा फ़र्क़ है,

सड़कें वीरान हैं,

लोग घरों में बंद हैं,

वाहन चुपचाप खड़े हैं,

बाज़ार सूने हैं. 


इस शहर में कुछ ख़ास नहीं बदला,

पर अब यह शहर शहर नहीं लगता,

बहुत ज़रूरी है शहर में शोर होना 

शहर को शहर बनाने के लिए.


शुक्रवार, 30 जुलाई 2021

५९२. सिग्नल पर ट्रेन

 

दूर कहीं से आ रही ट्रेन 

स्टेशन के बाहर सिग्नल पर 

अचानक ठहर गई है,

चलने का नाम नहीं ले रही. 


मैं प्लेटफॉर्म पर हूँ, बेचैन हूँ,

अब और इंतज़ार नहीं होता, 

जैसे किसी भूखे के पास थाली,

किसी प्यासे के पास पानी हो,

पर खाने-पीने की मनाही हो. 


ट्रेन,इससे तो अच्छा था 

कि तुम कहीं और रुक जाती,

मैं इंतज़ार कर लेता,

पर इतने पास आकर भी 

तुम्हारा इतनी दूर रहना

अब मुझसे सहा नहीं जाता. 


रविवार, 25 जुलाई 2021

५९१.माली से




माली,

तुमने अच्छा किया 

कि सुन्दर बगिया बनाई,

ऐसे फूल खिलाए,

जिनकी महक खींच लाए 

दूर से किसी को भी,

पर अब एक-से फूलों 

और एक-सी ख़ुश्बू से 

मेरा मन ऊब रहा है. 


माली,

अब दूसरे पौधे लगाओ,

दूसरे फूल खिलाओ,

जिनमें ख़ुश्बू भले कम हो, 

पर जो थोड़े अलग हों.  

बुधवार, 21 जुलाई 2021

५९०.अख़बार



मैं नहीं पढ़ता अख़बार,

उसमें छपी ख़बरें पढ़कर 

बस उदास हो जाता हूँ,

कुछ कर नहीं पाता. 


किसका बलात्कार हुआ,

किसकी हत्या,

किसका अपहरण,

कहाँ बम फटा,

कहाँ आग लगी,

किसने घोटाला किया,

बस यही तो छपता है 

हर रोज़ अख़बार में. 


लगता है,

न कुछ अच्छा हुआ है,

न हो रहा है,

न हो सकता है,

न कोई सच्चा है,

न कोई भरोसे-लायक. 


मेरे सामने अख़बार पढ़ो,

तो चुपचाप पढ़ना,

पन्ना पलटने की आवाज़ से भी 

डूबने लगती है 

मेरी बची-खुची उम्मीद.