गुरुवार, 9 दिसंबर 2021

६२७. दंड

 



धीरे-धीरे सालों तक

सुलगती रही लकड़ी

अब कुछ भी बाक़ी नहीं

जलने-सुलगने को,

पर जो धुआँ फैला है

ख़त्म ही नहीं होता.

धुआँ भी ऐसा

कि आँखों में आँसू आ जाएं,

पर यह तो सहना ही पड़ेगा,

सालों तक सुलगाने का दंड  

सबको भुगतना पड़ेगा.


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