मंगलवार, 7 दिसंबर 2021

६२६. प्रकृति और आदमी



मैंने माँगा नहीं,

पर पेड़ों ने छाँव दी,

पौधों ने फूल दिए,

फूलों ने ख़ुश्बू दी,

झरनों ने पानी दिया,

हवा ने ताज़गी दी,

सूरज ने रौशनी दी, 

चाँद ने शीतलता दी. 


सबने बिना मांगे 

कुछ-न-कुछ दिया, 

मैंने आदमी से माँगा,

उसने कहा,

‘मेरे पास इतना कहाँ है 

कि तुम्हें कुछ दे सकूं.’


7 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल बुधवार (08-12-2021) को चर्चा मंच          "निमित्त है तू"   (चर्चा अंक 4272)     पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य यह है कि आप उपरोक्त लिंक पर पधार करचर्चा मंच के अंक का अवलोकन करे और अपनी मूल्यवान प्रतिक्रिया से अवगत करायें।
    -- 
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'   

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  2. वाह!बहुत ही सुंदर प्रकृति निवार्थ भाव से लुटाती है।
    सादर

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  3. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर गुरुवार 09 दिसंबर 2021 को लिंक की जाएगी ....

    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!

    !

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  4. प्राकृति ऐसी ही है ... सब कुछ देती है बस ...

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  5. बहुत ही शानदार प्रस्तुति👌👌

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  6. प्रकृति का दोहनकर पर को क्या देगा

    सुन्दर रचना

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