शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026
852. उसके हिस्से में
रविवार, 5 अप्रैल 2026
851. आज का युद्ध
सुनो सीता,
अच्छा होता,
अगर रावण से युद्ध आज होता,
न उतना समय लगता,
न उतना कष्ट होता।
न कहीं जाने की ज़रूरत होती,
न बंदर-भालू इकट्ठा करने की,
न समुद्र पर पुल बनाना पड़ता,
बस कुछ मिसाइलें काफ़ी होतीं।
जला देते लंका बिना हनुमान के,
गुप्तचरों से पूछ लेते ज़रूरी ठिकाने,
चुपके से गिरा देते वहाँ बम,
मार देते रावण, कुंभकर्ण, मेघनाद को।
सुनो, सीता,
मैं राम हूँ, मर्यादा पुरुषोत्तम हूँ,
तुम्हारा अपहरण नहीं होता,
तो मैं युद्ध नहीं करता,
पर मेरी जगह कोई और होता,
तो चढ़ाई कर देता बिना कारण,
उठवा लेता लंका का सारा सोना।
मंगलवार, 31 मार्च 2026
850. वह बच्ची
एक गोरी-चिट्टी बच्ची,
जो युद्ध में मारी गई,
ईरानी थी,
वह अमेरिका के स्कूल में होती,
तो कहना मुश्किल था
कि वह अमेरिकी नहीं, ईरानी है।
रविवार, 29 मार्च 2026
849. युद्ध के दिनों में
जानता हूँ तुम्हें
नौ महीने हो गए गर्भ में,
पर छटपटाओ मत,
हो सके, तो अंदर ही रहो,
बाहर हवा ज़हरीली है,
ड्रोन, बम और मिसाइलें
तुम्हारे इंतज़ार में हैं।
**
एक ऐसा युद्ध करते हैं,
जिसमें मिसाइलें बरसाएँ फूल,
तोपों की नलियाँ फेंकें गुलाल,
बंदूकों से निकले इत्र,
सिपाही खुरचकर मिटा दें
मुल्कों के बीच खींची लकीरें।
शनिवार, 21 मार्च 2026
848. निश्चय
रात को बार-बार चौंकती है,
झटके से उठ जाती है लड़की,
पसीने से लथपथ हो जाती है,
डरकर सहम जाती है लड़की।
पानी के घूंट हलक से उतारती है,
उठकर खिड़की तक जाती है,
चुपके से गली में झाँकती है,
सब कुछ ठीक पाती है लड़की।
फिर से बिस्तर पर आकर
नींद का इंतज़ार करती है,
आज तय करती है लड़की,
कल से टी.वी. नहीं देखेगी,
न ही अख़बार पढ़ेगी लड़की।
बुधवार, 11 मार्च 2026
847.पंछी से
शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026
846. गुलाब
एक ख़ूबसूरत-सा ख़्वाब देखा मैंने,
गुलाब के हाथों में गुलाब देखा मैंने।
कहते हैं आँखें उसकी झील सी हैं,
गुलाब में झील, झील में गुलाब देखा मैंने।
न कभी सुना था, न कभी सोचा था,
एक चलता-फिरता गुलाब देखा मैंने।
जहां न खिला था, न खिल सकता था,
उसी सहरा में गुलाब देखा मैंने।
गुलाब नावाक़िफ़ था गुलाब होने से,
उसने माना ही नहीं कि गुलाब देखा मैंने।
जानता हूँ, उसने कांटे देखे मुझमें,
उसे पता है, उसमें गुलाब देखा मैंने।
इस बात से वह नाराज़ है मुझसे,
उसमें काँटा नहीं, गुलाब देखा मैंने।
न नींद आती है, न चैन पड़ता है,
किस मनहूस घड़ी में गुलाब देखा मैंने?
बुधवार, 4 फ़रवरी 2026
832. कीचड़ कमल से
कमल,
इतना भी मत इतराओ,
मुझमें ही हैं तुम्हारी जड़ें,
तुमसे मैं नहीं,
मुझसे तुम हो।
मैं खिला सकता हूँ
तुम जैसे कई कमल,
ज़िंदा रह सकता हूँ
तुम्हारे बिना भी।
भ्रम में मत रहो,
मैं तुम्हारे पैरों में हूँ,
पर अपने लिए नहीं,
तुम्हारे लिए।
मैं आधार हूँ तुम्हारा,
तुम्हारी ज़मीन हूँ मैं,
मैंने ही बचा रखा है तुम्हें
लहरों में बह जाने से।
सोमवार, 19 जनवरी 2026
831. पतंग
बहुत पतंगें थीं आसमान में,
जिनमें से एक हठात कट गई,
बड़ी देर से उड़ रही थी,
हिचकोले खा रही थी,
फिर संभल भी रही थी।
लड़ना आता था उसे,
मज़बूत थी उसकी डोर,
तेज़ था उसका माँझा,
लग नहीं रहा था कि कटेगी,
हिम्मतवाली थी वह बूढ़ी पतंग।
कोई नहीं जानता
कि कब तक उड़ेगी कौन सी पतंग ,
पर इतना तो तय है
कि कितनी भी जीवटवाली हो पतंग,
कितना भी तेज़ हो उसका माँझा,
कितनी भी मज़बूत हो उसकी डोर,
कटना ही पड़ता है हर पतंग को,
फटना ही पड़ता है कभी-न-कभी।
मंगलवार, 13 जनवरी 2026
830. इस बार का भोगाली बिहू
गुरुवार, 8 जनवरी 2026
829. किसे ले गई ट्रेन ?
कई लोग थे प्लेटफॉर्म पर,
एक को चढ़ना था,
बाक़ी सब चढ़ाने आए थे।
ट्रेन आई, तो वह चढ़ गया,
जो चढ़ाने आया था,
जिसका कोई इरादा नहीं था
यात्रा पर निकलने का,
जिसका सामान घर पर रखा था।
जिसे चढ़ना था,
उसका सामान बंधा ही रह गया,
वह प्लेटफॉर्म पर बैठा
इंतज़ार कर रहा है अगली ट्रेन का
जो न जाने कब आएगी,
न जाने किसे ले जाएगी।


.jpg)