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गुरुवार, 13 जून 2024

७७१.यादों से

 


यादों, 

मैं तुम्हें छोड़ रहा हूँ,

तुमसे कहूँगा नहीं 

कि फिर मिलेंगे,

मिलना ही होता,

तो छोड़ता ही क्यों?


यादों,

तुम बेड़ियाँ हों मेरे पाँवों की,

मैं जब भी चलता हूँ,

तुम रोक लेती हो मुझे, 

ऐसे तो नहीं रोकती थी 

मेरी अपनी बेटी भी मुझे. 


यादों,

किस हक़ से रोकती हो मुझे,

तुम्हारा रिश्ता तो घटनाओं से है, 

घटनाओं ने तो एक बार ही तड़पाया,

तुम तो बार-बार तड़पाती हो मुझे. 


यादों,

कम-से-कम इतना लिहाज़ तो रखो 

कि मेरे बेडरूम में न घुसो, 

अक्सर जब तुम आती हो,

मेरी आँखें नींद से बोझिल होती हैं,

मुझे आराम की सख़्त ज़रूरत होती है. 


यादों,

मैं जानता हूँ कि मेरी बातें फ़िज़ूल हैं, 

जानता हूँ कि बहुत ज़िद्दी हो तुम, 

बहुत बार विदा किया तुम्हें,

पर तुमने मेरा पीछा ही नहीं छोड़ा. 


यादों,

यह कैसा एकतरफ़ा प्यार है, 

जिसमें ख़ुद पर आंच तक नहीं आती,

पर जिससे प्यार करो, वह तबाह हो जाता है. 


बुधवार, 5 जून 2024

७७०.मैं और मेरा मकान

 


मेरा मकान- 

बदरंग, 

जैसे बालों-भरे सिर पर 

गंजेपन का कोई टुकड़ा,

जैसे साफ़ कपड़े पर 

कोई तेल का धब्बा,

जैसे खुरचा हुआ कोई पुराना घाव. 


मेरा मकान-

अकेला,

जैसे घर के कोने में पड़ा 

पिछले साल का कैलेंडर,

जैसे जाड़े की रात में 

चौराहे पर खड़ा बूढ़ा,

जैसे अँधेरे में टिमटिमाती 

गाड़ी की पिछली बत्ती. 


मैं- 

बदरंग और अकेला,

जैसे मेरा मकान. 



गुरुवार, 30 मई 2024

७६९.मैं तुम्हें भूलूँ तो कैसे?

 


प्रिय, मैं तुम्हें भूलूँ तो कैसे?


सर्दियों का शर्मीला सूरज,

जब पत्तों के पीछे छिपकर 

ओस में भीगी घास को देखता है,

जब कमल की अधखिली कलियाँ 

पानी के कंधे पर सिर रखकर 

अनजानी ख़ुशी से कांपती है,

तो मुझे तुम याद आती हो. 


सांझ की निश्चिंतता में 

जब पक्षियों के झुण्ड 

अपने घोंसलों की ओर उड़ते हैं 

या समन्दर की लहरें 

बार-बार रूठकर भी 

साहिल की ओर लौटती हैं,

तो मुझे तुम याद आती हो. 


दूर कहीं चट्टान का कोई टुकड़ा 

जब नीचे की ओर खिसकता है 

या नदी की लहरों के टकराने से 

कोई किनारा टूटता है,

तो मुझे तुम याद आती हो. 


प्रिय,

सच में और स्वप्न में,

सुख में और दुःख में,

हर वक़्त तुम मेरे साथ हो,

मैं तुम्हें भूलूँ, तो भूलूँ कैसे?


शनिवार, 25 मई 2024

७६८. पानी में


 

मछलियां उछल रही हैं पानी में,

जाने क्या मज़ा है पानी में?


मदहोशी-सी छा गई मुझ पर,

ऐसा क्या मिलाया तूने पानी में?


डूबनेवाला भी वही, तैरनेवाला भी वही,

कुछ तो करिश्मा है नदी के पानी में. 


देखा नहीं कि प्यास बुझने लगी,

कोई तो बात है यहाँ के पानी में. 


हरेक बदल जाता है यहाँ आकर,

कुछ तो ख़ास है शहर के पानी में. 


कभी मुझे भी देना अचानक धक्का,

मैं भी देखूं, कैसे डूबते हैं पानी में. 


बिखेर देना मेरी राख खेतों में,

मुझे नहीं डूबना मरकर पानी में.  


जितना पिया, प्यास बढ़ती गई,

कुछ तो जादू था कुएँ के पानी में. 


डूबिए शौक़ से, गर चाहते हैं डूबना,

खींचिए मत किसी को अपने साथ पानी में. 


ऐसा भी क्या जीना कि बरसात से डरें,

फेंकिए छाता, भीगिए पानी में. 


बड़ा कमज़ोर था, जो हवा में उड़ता था,

डूबकर मर गया बित्ता-भर पानी में. 


बुधवार, 15 मई 2024

७६७.पानी

 


पत्थर वहीं रहता है, 

पर पानी बह जाता है, 

कहाँ वक़्त है उसके पास 

कि कहीं रुक जाए,

बहुत पत्थरों के ऊपर से 

गुज़रना होता है उसे,

बहुत-सी बाधाओं से 

निपटना होता है उसे.  


पत्थरों पर पानी के निशान

सन्देश हैं सभ्यता को 

कि मत बनो कठोर,

मत बनो अड़ियल,

पत्थर होकर रुकने से अच्छा है 

पानी होकर बह जाना.