शुक्रवार, 9 दिसंबर 2022

६८४. सड़कें

 


सुना है,

सड़कों को अच्छे लगते हैं

सरसों के खेत,

सिर पर रखे हुए 

पानी के मटके,

घरों से उठते 

धुएँ के गोले,

चबूतरे पर बैठकर 

हुक्का गुड़गुड़ाते बूढ़े,

गलियों में दौड़ते 

अधनंगे बच्चे,

पर किसी को परवाह नहीं 

कि सड़कें क्या चाहती हैं,

सब उन्हें उधर ही ले जाते हैं,

जिधर पहले से ही सड़कें हैं.

मंगलवार, 6 दिसंबर 2022

६८३. आइसक्रीम

 



मैं बच्चा था,

तो मुलायम था 

आइसक्रीम की तरह,

बड़ा हुआ,

तो सख़्त होता गया. 

अब मन करता है,

फिर से आइसक्रीम हो जाऊं,

पर इतना आसान नहीं होता 

पत्थर का आइसक्रीम हो जाना,

उससे भी मुश्किल है 

लोगों का यह मान लेना 

कि कल तक जो पत्थर था,

आज आइसक्रीम हो गया है.  

**

मैंने माँगा नहीं,

पर मुझे मिल गईं 

दो-दो आइसक्रीम,

मैं सोचता रहा, 

पहले कौन सी खाऊं,

सोचने-सोचने में पिघल गईं 

दोनों आइसक्रीम. 

**

मुझमें मिठास हो न हो,

उजियारा होना चाहिए,

मैं तैयार हूँ पिघलने को,

पर आइसक्रीम की तरह नहीं,

मोमबत्ती की तरह.  


 

गुरुवार, 1 दिसंबर 2022

६८२. मेरा शरीर

 


बहुत प्यार है मुझे अपने शरीर से,

पर आख़िर यह है किसका?

मेरा है,तो क्यों अपनी मर्ज़ी से 

बीमार पड़ जाता है?

क्यों उधर चल पड़ता है,

जिधर मैं जाना नहीं चाहता,

क्यों मेरी बातों को सुनकर भी  

अनसुना कर देता है?


मेरा शरीर अगर सच में मेरा है, 

तो क्यों मुझे जाना होगा  

इसे यहीं छोड़कर एक दिन?

क्यों जला देंगे इसे दूसरे लोग 

मेरी अनुमति के बिना?


शुक्रवार, 25 नवंबर 2022

६८१.रिश्ते

 



मेरे रीसायकल बिन में 

बहुत से टूटे हुए रिश्ते हैं,

कुछ मैंने तोड़ दिए थे,

कुछ ग़लती से डिलीट हो गए. 


अब रीसायकल बिन में जगह नहीं है,

सोचता हूँ, हर रिश्ते को ध्यान से देखूँ,

कुछ तो ऐसे ज़रूर मिलेंगे,

जिनका टूट जाना ठीक नहीं था, 

चाहता हूँ, उन्हें रिस्टोर कर दूँ. 


मुश्किल यह है कि 

बाक़ियों का क्या करूँ,

सदा के लिए उन्हें कैसे हटाऊँ,

क्या आप कोई ऐसी कमांड जानते हैं,

जिससे ऐसा करना संभव हो?


शुक्रवार, 18 नवंबर 2022

६८०.उँगलियाँ

 


मेरे बालों में धीरे-धीरे 

टहल रही हैं कुछ उँगलियाँ,

अच्छी लगती हैं 

नर्म-नाज़ुक,जानी-पहचानी उँगलियाँ. 

मैं उनसे कहता हूँ,

ज़रा देर तक टहलो,

अच्छा होता है सेहत के लिए 

लम्बा टहलना. 

***

अब वे उँगलियाँ 

पहले-सी नर्म-नाज़ुक नहीं रहीं,

मेरे बाल भी घने नहीं रहे,

मगर अच्छी लगती हैं,

जब वे घूमती हैं

मेरे कम होते बालों में,

उँगलियों को भी अच्छा लगता है,

मेरे बालों में टहलना. 

***

अब नहीं रहीं वे उँगलियाँ,

जो अधिकार से टहला करती थीं

मेरे घने काले बालों में,

अच्छा ही हुआ 

कि अब वे बाल भी नहीं रहे.