बुधवार, 12 मई 2021

५६५.लाशें


ये लाशें, जो बहकर आई हैं,

किनकी है, कहाँ से आई हैं?

किस गाँव,किस क़स्बे,किस शहर से, 

क्यों आई हैं, पता तो करो.  


ये बीमारों की लाशें हैं,

तो लावारिश-जैसी क्यों हैं?

अंतिम संस्कार तो होना था इनका, 

कोई तो अपना रहा होगा इनका.  


अपनों की कोई मजबूरी थी,

तो क्या थी, पता तो करो,

अंतिम संस्कार के लिए जगह कम थी

या छुटकारा चाहिए था किसी को?


ये बेजान लाशें सवाल कर रही हैं,

अब इन्हें जला दो या दफ़ना दो,

तो भी ये सवाल पूछना बंद नहीं करेंगी. 

सोमवार, 10 मई 2021

५६४.ख़बरें



अगर आती रहीं ऐसे ही 

अपनों के जाने की ख़बरें,

तो आदत सी पड़ जाएगी,

बहुत शर्म आएगी ख़ुद पर 

जब फ़र्क पड़ना बंद हो जाएगा. 

**

इन दिनों मैं सहमा हुआ हूँ,

खटका लगा रहता है हर वक़्त

कि न जाने कब किसके 

जाने की ख़बर आ जाय.

बहुत से अपने चले गए हैं,

न जाने किसका बुलावा आ जाय,

मैं जाने से नहीं डरता,

अकेला रह जाने से डरता हूँ. 

शुक्रवार, 7 मई 2021

५६३.मशविरा



वह कौन है,

जो ज़ोर-ज़ोर से 

अस्पताल के दरवाज़े पर 

दस्तक दे रहा है?


उसे कहो,

यहाँ कोई बेड नहीं है,

कहीं कोई बेड नहीं है,

वह कितना ही क्यों न पीटे,

दरवाज़ा नहीं खुलेगा.  


उसे कहो,

वापस घर जाए,

क्या उसे नहीं मालूम 

कि कोरोना-काल में 

जहाँ तक संभव हो,

घर में ही रहना बेहतर है? 

मंगलवार, 4 मई 2021

५६२.साँस


मुझे नहीं चाहिए

कोई एम्बुलेंस,

कोई अस्पताल,

कोई बेड,

कोई डॉक्टर,

कोई नर्स,

कोई इंजेक्शन,

कोई दवा. 


कुछ भी नहीं चाहिए मुझे,

पर आप ही कहें 

कि इस देश का नागरिक होने के नाते 

या इंसान होने के नाते 

साँस लेने के लिए 

थोड़ी-सी हवा पर  

मेरा हक़ है कि नहीं

और यह हवा मुझ तक पहुँचाना 

आपकी ज़िम्मेदारी है कि नहीं?

शुक्रवार, 30 अप्रैल 2021

५६१.शव परेशान हैं


शवों की क़तार लगी है 

श्मशान के सामने,

जलने को बेताब हैं वे,

परेशान हैं,

नहीं जानते थे 

कि अस्पताल से निकलकर भी 

क़तारों का सिलसिला ख़त्म नहीं होगा. 


ज़िंदा होते,

तो धक्का-मुक्की करते,

आगे निकल जाते,

पर अब तो कोई चारा नहीं है. 


शव चिंता में हैं 

कि चिता तक पहुँचने में 

ज़्यादा देर हुई,

तो वे भी न भाग जाएँ,

जो मुश्किल से साथ आए हैं.