कल मदर्स डे के अवसर पर सभी माँओं के सम्मान में मेरी यह कविता।
कविताएँ
शुक्रवार, 8 मई 2026
शनिवार, 2 मई 2026
854. सुनो, जीतू मुंडा
जीतू मुंडा,
मुश्किल रहा होगा तुम्हारे लिए
अपनी बहन को मरते देखना,
उसे क़ब्र में लिटाना,
उसके शव पर मिट्टी डालना,
फिर कोई जंगली फूल चढ़ाना।
ऐसा करते वक़्त
तुमने सपने में भी नहीं सोचा होगा
कि तुम्हें कभी निकालना होगा
क़ब्र से उसका कंकाल।
कैसे चले होगे तुम
बहन को कांधे पर लादे,
कितनी दूर जाना पड़ा होगा तुम्हें,
ज़्यादा भारी रहा होगा
उसके शव से उसका कंकाल।
जीतू मुंडा,
यहाँ मुश्किल है ज़िंदा लोगों के लिए
ख़ुद को ज़िंदा साबित करना,
मुश्किल है लाशों के लिए
ख़ुद को मृत साबित करना,
असंभव है कंकाल के लिए
यह साबित करना
कि वह तुम्हारी बहन है।
जीतू मुंडा,
जिनके कारण तुम कंकाल ढो रहे हो,
वे चल-फिर रहे हैं,
सांस ले रहे हैं,
पर ज़िंदा नहीं हैं।
मत ढोओ अपने कंधों पर
इतना बड़ा बोझ,
सोने दो अपनी बहन को क़ब्र में,
बड़े भोले हो तुम,
इतना भी नहीं जानते
कि नहीं पसीजता लाशों का दिल
कंकालों को देखकर।
बुधवार, 29 अप्रैल 2026
853. इस साल बिहू में
शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026
852. उसके हिस्से में
रविवार, 5 अप्रैल 2026
851. आज का युद्ध
सुनो सीता,
अच्छा होता,
अगर रावण से युद्ध आज होता,
न उतना समय लगता,
न उतना कष्ट होता।
न कहीं जाने की ज़रूरत होती,
न बंदर-भालू इकट्ठा करने की,
न समुद्र पर पुल बनाना पड़ता,
बस कुछ मिसाइलें काफ़ी होतीं।
जला देते लंका बिना हनुमान के,
गुप्तचरों से पूछ लेते ज़रूरी ठिकाने,
चुपके से गिरा देते वहाँ बम,
मार देते रावण, कुंभकर्ण, मेघनाद को।
सुनो, सीता,
मैं राम हूँ, मर्यादा पुरुषोत्तम हूँ,
तुम्हारा अपहरण नहीं होता,
तो मैं युद्ध नहीं करता,
पर मेरी जगह कोई और होता,
तो चढ़ाई कर देता बिना कारण,
उठवा लेता लंका का सारा सोना।

