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शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

865. कौवे का इंतज़ार




     


जब कभी कोई कौवा 

उसके घर की मुंडेर पर 

कांव-कांव करता है,

बहुत ख़ुश  हो जाती है 

वह अकेली महिला। 


बनाने लगती है 

अपने बेटे के लिए 

बेसन के लड्डू,

आलू-मटर की सब्ज़ी,

झाड़ने लगती है 

उसके कमरे का कोना-कोना । 


जब कभी आ जाता है

घर उसका बेटा,

तो कौवे की कांव-कांव में 

बढ़ जाता है उसका भरोसा । 


कौवे को नहीं मालूम 

कि कितनी बेसब्री से 

उसका इंतज़ार करती है 

किसी घर में कोई माँ,

कितनी मीठी लगती है उसको 

कौवे की कांव-कांव। 

शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

864. समुद्र-तट पर मैंने जाना

 





समुद्र-तट पर मैंने देखी 

दूर तक फैली हुई रेत,

उंगली चलाई, तो देखा,

आसानी से चल रही थी। 


जल्दी-जल्दी लिखने लगा मैं,

तस्वीरें बनाने लगा,

अचानक एक लहर आई,

सब कुछ बहा ले गई। 


समुद्र-तट पर मैंने जाना 

कि जहां लिखना आसान होता है, 

वहाँ मिट जाने का ख़तरा 

बहुत ज़्यादा होता है। 



शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

863. पाटखोड़ी

 


क्या आपने जूट की लकड़ी देखी है?

मेरे यहाँ पाटखोड़ी कहते हैं इसे, 

पतली-सी होती है,कमज़ोर सी,

पाँव पड़ते ही टूट जाती है,

पर जब यह जलती है,

तो देखने लायक होता है इसका जलना,

एकदम से धधक उठती है सिर से पाँव तक. 


एक बार जल उठे,

तो रोकना मुश्किल होता है इसे,

फिर राख होने तक जलती है, 

फिर जलाकर ही मानती है यह। 



गुरुवार, 23 जुलाई 2026

862. जुगनू

 


जब डूब जाता है सूरज,

आकाश में नहीं होते चाँद-सितारे,

जब नहीं चमकती बिजली,

नहीं जलती कोई लालटेन,

चुक जाते हैं दीपक के तेल-बाती,

जब नहीं भड़कता कहीं कोई शोला, 

जब नहीं सूझता हाथ को हाथ,

घनघोर अंधेरा हँसता है ठठाकर,

तब मैं उठाता हूँ बीड़ा,

निकलता हूँ बाहर,

ललकारता हूँ अँधेरे को,

करता हूँ उद्घोष 

कि रौशनी अभी ज़िंदा है। 


शुक्रवार, 10 जुलाई 2026

861.दृष्टि

 



जितना झुक सकता था,

उससे ज़्यादा झुक गया हूँ मैं, 

जीने के लिए अब उठना, 

खड़ा होना ज़रूरी है। 


और मत झुकाओ मुझे,

ज़रा सीधा होने दो,

इतना झुक चुका हूँ मैं 

कि मुझे साफ़-साफ़ दिखने लगा है 

अपना ज़रूरत से ज़्यादा झुकना,

तुम्हारा ज़रूरत से ज़्यादा तनना।