शनिवार, 21 नवंबर 2020

५०६. कोरोना में दूरी



इन दिनों ज़रूरी है 

दूरी बनाए रखना,

थोड़ी नहीं,ज़्यादा.


इन दिनों ज़रूरी है 

किसी के गले न लगना,

किसी से हाथ न मिलाना, 

किसी के पास न जाना.


इन दिनों ज़रूरी है 

दिलों का क़रीब होना,

इतना कि ज़रा सा भी 

फ़ासला न रहे.


इन दिनों ज़रूरी है 

दूसरों के काम आना,

उनका दर्द महसूस करना 

और यह सब संभव है 

दो गज की दूरी रखकर भी.


बुधवार, 18 नवंबर 2020

५०५. गूँगा

मुँह में ज़बान न होने का मतलब 

गूँगा होना नहीं है.

हो सकता है,

किसी के मुँह में ज़बान न हो,

पर वह आँखों से बोलता हो.

जो बोलता है,

वह गूँगा नहीं है,

भले वह आँखों से बोले.

वह आदमी ज़रूर गूँगा है,

जो बोल तो सकता है,

पर कुछ बोलता नहीं,

न ज़बान से, न आँखों से.

सोमवार, 16 नवंबर 2020

५०४. बेसुरा गीत



एक परिंदा कहीं से 

उड़ता हुआ आया,

गाने लगा कोई बेसुरा-सा गीत,

नाचने लगा कोई बेढंगा-सा नाच,

पर मुग्ध हो गई डाली,

झूमने लगी ख़ुशी से.


थोड़ी देर में उड़ जाएगा परिंदा,

बैठ जाएगा कहीं और जाकर,

पर झूमती रहेगी वह डाली,

जिस पर नृत्य किया था परिंदे ने 

और मन की गहराइयों से गाया था 

एक बेसुरा-सा गीत.


शनिवार, 14 नवंबर 2020

५०३. इस साल दिवाली में



इस साल दिवाली में 

बुझ गया एक दीया,

जिसे बुझना नहीं था.


उसमें तेल पूरा था,

उसकी बाती ठीक थी,

हवाएं भी ख़ामोश थीं,

फिर भी वह बुझ गया.


इस तरह असमय 

जब बुझ जाता है 

कोई जगमगाता दीया,

तो ऐसा घना अँधेरा छाता है

कि सैकड़ों दीये मिलकर भी 

उसे दूर नहीं कर सकते.

गुरुवार, 12 नवंबर 2020

५०२.मौत के बाद


वह कौन है,

जिसकी आवाज़ 

हर ओर सुनाई देती है,

जिसकी हँसी

हमेशा कानों में गूंजती है?

कई दिन बीत गए,

जिसे विदा किए,

पर जिसकी सूरत 

हर तरफ़ दिखाई पड़ती है.


यह कैसा भ्रम है

कि वह दिखता भी है 

और नहीं भी,

वह वाचाल भी है 

और चुप भी,

वह है भी 

और नहीं भी.


असल में वह नहीं है,

पर अपने न होने में 

वह पहले से कहीं ज़्यादा है,

जैसे कि वह पूरा ज़िन्दा हुआ हो 

अपनी मौत के बाद.