गुरुवार, 4 मार्च 2021

५४१. पेड़ काटनेवाले



पेड़ कट रहे हैं,

कट रहे हैं काटनेवाले,

पर नहीं सुनी उन्होंने 

ख़ुद के कटने की आवाज़,

महसूस नहीं किया थोड़ा भी 

ख़ुद के कटने का दर्द.


पागल हो जाते हैं वे 

जिनके पास कुल्हाड़ियाँ होती हैं,

कुछ नहीं सुनता उन्हें,

कुछ महसूस नहीं होता. 


एक दिन जब पेड़

धराशाई हो जाएंगे

और बंद हो जाएंगी 

कटने की आवाज़ें,

तब महसूस होगा काटनेवालों को 

कि उन्होंने पेड़ों को नहीं 

ख़ुद को काटा था.


सोमवार, 1 मार्च 2021

५४०.मंज़िल


बहुत दिनों बाद 

आज अवसर आया है 

कि प्लेटफ़ॉर्म पर हूँ.


घंटी हो चुकी है,

ट्रेन बस पहुँचने ही वाली है,

पर अब जब रवानगी पास है,

तो दिल बहुत उदास है.


सोचता हूँ,

कहीं कोई गड़बड़ तो नहीं है,

वह ट्रेन जो पहुँचने ही वाली है,

मुझे मंज़िल तक ले जाएगी 

या मंज़िल से दूर?

शनिवार, 27 फ़रवरी 2021

५३९.यात्रा




धड़धड़ाती हुई ट्रेन 

गुज़रती है पुल के ऊपर से,

नीचे बह रही है विशाल नदी,

उसकी लहरें उछल-उछलकर 

लील जाना चाहती है सब कुछ.


आँखें बंद कर लेता हूँ मैं,

विनती करता हूँ पटरियों से,

संभाले रखना ट्रेन को,

प्रार्थना करता हूँ ट्रेन से,

रुकना नहीं, सर्र से निकल जाना.


भूल जाता हूँ मैं 

कि यह आख़िरी नदी नहीं है,

आगे और भी नदियाँ हैं,

जिन्हें मुझे पार करना है. 

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

५३८. आत्मा


कौन कहता है 

कि आत्मा नहीं मरती,

मैं रोज़ देखता हूँ,

शरीर को ज़िन्दा रहते 

और आत्मा को मरते.


मैं रोज़ देखता हूँ 

कि शरीर मज़बूत होते जाते हैं 

और आत्माएं कमज़ोर,

आख़िर में शरीर बच जाता है 

और आत्मा मर जाती है.


एक दिन शरीर भी मर जाता है,

उसे जला दिया जाता है 

या दफना दिया जाता है,

अंतिम संस्कार शरीर का होता है,

आत्मा का हो ही नहीं सकता,

वह तो पहले ही मर चुकी होती है.

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2021

५३७. कौए


पिता, तुम्हें याद है न,

कौए मुझे कितने नापसंद थे,

सख़्त नफ़रत थी मुझे 

उनकी काँव-काँव से,

उनका मुंडेर पर आकर बैठना 

बिल्कुल नहीं सुहाता था मुझे,

उड़ा देता था मैं उन्हें 

तरह-तरह के उपाय करके.


पर जब से तुम गए हो,

मुझे कौए अच्छे लगते हैं,

उनकी काँव-काँव अब 

कर्कश नहीं लगती मुझे.

मैं बुलाता हूँ उन्हें

कटोरी में पकवान रखकर, 

इंतज़ार करता हूँ उनका, 

पर वे आते ही नहीं,

दूर से देखते रहते हैं.


पिता, अगर उस झुण्ड में तुम हो,

तो चले आओ अपनी मुंडेर पर,

अब मैं पहले जैसा नहीं रहा,

अब मुझे कौओं से प्यार हो गया है.