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बुधवार, 29 अप्रैल 2026

853. इस साल बिहू में

 




इन दिनों असम में रंगाली बिहू की धूम है। यह उत्सव महीने-भर चलता है। बिहू की परंपराओं और उसके मूड पर आधारित है यह ग़ज़ल।
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मुर्दा दिलों में उमंग है बिहू में,
बेरंग चेहरों पर रंग है बिहू में।
ढोल जो बजा ,तो थिरकने लगे पाँव,
शराब में नहीं, जो नशा है बिहू में।
भटकते रहोगे जंगलों में कब तक,
लौट आओ बस्ती में इस साल बिहू में।
पेपा भी बजाता है, टोका भी, गगना भी,
हुनर उसका देखिए, तो देखिए बिहू में।
बांध लिया है उसने जो सिर पर गमछा,
मेरी ही नज़र न लग जाए उसे बिहू में।
झटके से दिल मेरा तोड़ दिया उसने,
पाँव छूए, गमछा दिया इस बार बिहू में।
झूम रहा है कपौ, फूला-फूला सा लगता है,
खोंसा जाएगा वह, किसी जूड़े में बिहू में।
काटने को दौड़ता है तुम्हारे बिना घर,
तुम्हारा ही घर है, चले आओ बिहू में।
पल-पल आज तुम नई सी लगती हो,
जादू है तुममें या जादू है बिहू में?

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

852. उसके हिस्से में

 


वह खाना अच्छा बनाती थी,
उसके हाथों में जादू था,
चटखारे लेकर खाते थे घरवाले,
तारीफ़ करते थे उसके खाने की।
वह खाना इतना अच्छा बनाती थी
कि उसके हिस्से में तारीफ़ आती थी,
पूरा खाना कभी नहीं आता था।


रविवार, 5 अप्रैल 2026

851. आज का युद्ध

 

सुनो सीता,

अच्छा होता,

अगर रावण से युद्ध आज होता,

न उतना समय लगता,

न उतना कष्ट होता। 


न कहीं जाने की ज़रूरत होती,

न बंदर-भालू इकट्ठा करने की, 

न समुद्र पर पुल बनाना पड़ता, 

बस कुछ मिसाइलें काफ़ी होतीं। 


जला देते लंका बिना हनुमान के, 

गुप्तचरों से पूछ लेते ज़रूरी ठिकाने,

चुपके से गिरा देते वहाँ बम,

मार देते रावण, कुंभकर्ण, मेघनाद को। 


सुनो, सीता,

मैं राम हूँ, मर्यादा पुरुषोत्तम हूँ, 

तुम्हारा अपहरण नहीं होता, 

तो मैं युद्ध नहीं करता,

पर मेरी जगह कोई और होता,

तो चढ़ाई कर देता बिना कारण,

उठवा लेता लंका का सारा सोना।







मंगलवार, 31 मार्च 2026

850. वह बच्ची

 



एक गोरी-चिट्टी बच्ची,

जो युद्ध में मारी गई,

ईरानी थी, 

वह अमेरिका के स्कूल में होती,

तो कहना मुश्किल था 

कि वह अमेरिकी नहीं, ईरानी है। 


रविवार, 29 मार्च 2026

849. युद्ध के दिनों में

 


जानता हूँ तुम्हें 

नौ महीने हो गए गर्भ में, 

पर छटपटाओ मत,

हो सके, तो अंदर ही रहो,

बाहर हवा ज़हरीली है,

ड्रोन, बम और मिसाइलें 

तुम्हारे इंतज़ार में हैं। 

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एक ऐसा युद्ध करते हैं,

जिसमें मिसाइलें बरसाएँ फूल,

तोपों की नलियाँ फेंकें गुलाल,

बंदूकों से निकले इत्र,

सिपाही खुरचकर मिटा दें 

मुल्कों के बीच खींची लकीरें।