गुरुवार, 20 जनवरी 2022

६३४.समीक्षा




मैंने जो सैकड़ों कविताएँ लिखी हैं,

उनकी समीक्षा होनी चाहिए. 


एक-एक कविता को अब 

ध्यान से पढ़ा जाना चाहिए,

उसमें खोजा जाना चाहिए 

चिलचिलाती गर्मी में 

अपने खेत में काम करता 

पसीने से लथपथ कोई किसान,

सिर पर ईंट-गारा उठाए 

नई बनती किसी इमारत में 

बल्लियों के सहारे 

ऊपर चढ़ता कोई मज़दूर,

न्याय के लिए अदालतों के 

धक्के खाता कोई आम आदमी. 


ज़रूरी है कि मेरी कविताओं में 

खोजी जाय वह गृहिणी,

जो दिन-रात तिरस्कृत होकर भी 

लगी रहती है काम में,

खोजी जाय वह युवती 

जिसका दिन-दहाड़े 

बलात्कार हो गया था. 


ज़रूरी है कि खोजा जाय 

वह लाचार बाप,

जिसका इकलौता बच्चा 

दवा के इंतज़ार में झूल रहा हो 

ज़िन्दगी और मौत के बीच. 


मेरी जिन कविताओं में 

ऐसा कोई व्यक्ति न मिले,

वे कितनी ही अच्छी 

क्यों न लिखी गई हों,

उन्हें बेरहमी से फाड़कर 

कूड़े के ढेर में फेंक दिया जाय. 

 


बुधवार, 12 जनवरी 2022

६३३. हमसफ़र



मैं निकला था मंज़िल की ओर,

तुम भी उसी ट्रेन में चढ़ी,

डिब्बा वही था, बर्थ भी वही,

हम साथ-साथ बैठे रहे,

ट्रेन भी चलती रही,

हमसफ़र बन गए हम दोनों. 


मैंने कहा, मैं वहीं उतर जाऊंगा,

जहाँ तुम्हें उतरना है,

तुम भी ख़ुश थी मेरे फ़ैसले से. 


अचानक ऐसा क्या हुआ 

कि तुम्हारी कोई मंज़िल ही नहीं रही,

अब तुम तैयार हो 

किसी भी उस जगह उतरने को,

जहाँ मुझे नहीं उतरना है. 


साथ-साथ बैठे-बैठे 

अचानक ऐसा क्या हो जाता है 

कि एक ही जगह उतरनेवाले 

अपना स्टेशन बदल लेते हैं. 

 

रविवार, 2 जनवरी 2022

६३२. कोहरा

 


घने कोहरे में हो जाता है

जीवन अस्त-व्यस्त,

भिड़ जाते हैं वाहनों से वाहन,

खड़े  रह जाते हैं विमान,

थम जाती हैं रेलगाड़ियाँ,

चुप हो जाती हैं सड़कें,

देर से लगते हैं दफ़्तर,

गिरे रहते हैं दुकानों के शटर,

यहाँ तक कि पंछी भी 

बंद कर देते हैं चहचहाना. 


जब हाथ को हाथ नहीं सूझता,

चारों ओर सन्नाटा छा जाता है,

मैं अपने अंदर झांकता हूँ.


सोते में सपने देखे जा सकते हैं,

अंदर नहीं उतरा जाता

और जागते हुए इतना शोर होता है 

कि अंदर की आवाज़ सुनाई नहीं देती. 


कोहरा मुझे बहुत पसंद है,

क्योंकि कोहरे में सब कुछ 

साफ़-साफ़ सुनता है,

साफ़-साफ़ दिखता है. 


बुधवार, 29 दिसंबर 2021

६३१. अजीब दुनिया

 


मैं जब नफ़रत की बात करता हूँ,

तो सारे कान खड़े हो जाते हैं,

पर जब प्यार की बात करता हूँ,

तो किसी को कुछ नहीं सुनता. 


किसी का ख़ून बहाना हो,

तो भीड़ जमा हो जाती है,

किसी की जान बचानी हो,

तो मैं अकेला रह जाता हूँ. 


किसी को दूर करना हो,

तो एक पल भी नहीं लगता,

किसी को गले लगाना हो,

तो सालों बीत जाते हैं. 


यह दुनिया भी अजीब दुनिया है,

दुःख के पीछे दौड़ती है 

और जो सामने खड़ा है,

उस सुख के लिए तरसती है. 


शुक्रवार, 24 दिसंबर 2021

६३०. जकड़न



पत्तों,

ज़रा-सी बारिश क्या हुई,

तुम तो सज-धजकर 

तैयार हो गए 

कि सुहाने मौसम में 

कहीं घूमने जाएंगे,

पर संभव नहीं है 

तुम्हारा कहीं घूमने जाना।


ऐसा करो कि जहाँ हो,

वहीं थोड़ा-सा नाच लो, 

जिस पेड़ ने तुम्हें 

जकड़ रखा है,

न वह ख़ुद कहीं जाएगा,

न तुम्हें जाने देगा.