जब कभी कोई कौवा
उसके घर की मुंडेर पर
कांव-कांव करता है,
बहुत ख़ुश हो जाती है
वह अकेली महिला।
बनाने लगती है
अपने बेटे के लिए
बेसन के लड्डू,
आलू-मटर की सब्ज़ी,
झाड़ने लगती है
उसके कमरे का कोना-कोना ।
जब कभी आ जाता है
घर उसका बेटा,
तो कौवे की कांव-कांव में
बढ़ जाता है उसका भरोसा ।
कौवे को नहीं मालूम
कि कितनी बेसब्री से
उसका इंतज़ार करती है
किसी घर में कोई माँ,
कितनी मीठी लगती है उसको
कौवे की कांव-कांव।


