अबकी बार आना,
तो कुछ देर ठहर जाना,
हम नहीं चढ़ेंगे तुम्हारे डिब्बों में,
ठीक से देख लेना हमारा गाँव,
फिर अपने रास्ते चली जाना।
वंदे भारत की तरह नहीं,
कभी पैसेंजर की तरह भी आओ,
मेरे छोटे से स्टेशन पर
एक दिन के लिए ही सही,
थोड़ी देर रुक जाओ।
हिन्दी आज उदास है,
कल ही तो आई थी वह,
गाजे-बाजे से स्वागत हुआ था उसका,
आज निकाल दी गई घर से।
हर साल धोखा खाती है वह,
हर साल चली आती है बुलावे पर,
बस एक दिन की पूछ होती है,
फिर बेघर कर दिया जाता है उसे।
चारा भी क्या है हिन्दी के पास,
कोई और ठौर नहीं है उसका,
उसका परिवार,उसके बच्चे सब यहीं हैं,
यहीं है उसकी ज़िंदगी।
इसी उम्मीद में जी रही है हिन्दी
कि शायद कभी पसीजे अपनों का दिल,
शायद कभी अपने घर में मिले
उसे अपना कोई कोना।
पेड़ खड़े हैं क़तार में,
किसी के इंतज़ार में,
शायद आ जाए इस ओर
कोई अजनबी मुसाफ़िर।
सावधान खड़े हैं सब,
देख रहे हैं टकटकी बांधे,
न कहीं बादल, न कहीं बारिश,
आज ख़ुशनुमा है मौसम।
इस सुनसान रास्ते पर
न कंकड़ हैं, न कांटे,
पर कौन जाता है उधर,
कोई नहीं जाता जिधर?
इतना भी डर काहे का,
इतनी भी एहतियात क्यों,
कोई तो करे हिम्मत,
कोई तो समझे
कि ऐसे रास्तों पर चलकर ही
मिला करती है ढंग की मंज़िल।
जब कभी कोई कौवा
उसके घर की मुंडेर पर
कांव-कांव करता है,
बहुत ख़ुश हो जाती है
वह अकेली महिला।
बनाने लगती है
अपने बेटे के लिए
बेसन के लड्डू,
आलू-मटर की सब्ज़ी,
झाड़ने लगती है
उसके कमरे का कोना-कोना ।
जब कभी आ जाता है
घर उसका बेटा,
तो कौवे की कांव-कांव में
बढ़ जाता है उसका भरोसा ।
कौवे को नहीं मालूम
कि कितनी बेसब्री से
उसका इंतज़ार करती है
किसी घर में कोई माँ,
कितनी मीठी लगती है उसको
कौवे की कांव-कांव।