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सोमवार, 14 सितंबर 2026

867. 15 सितंबर

 

हिन्दी आज उदास है,

कल ही तो आई थी वह,

गाजे-बाजे से स्वागत हुआ था उसका,

आज निकाल दी गई घर से। 


हर साल धोखा खाती है वह,

हर साल चली आती है बुलावे पर,

बस एक दिन की पूछ होती है,

फिर बेघर कर दिया जाता है उसे। 


चारा भी क्या है हिन्दी के पास,

कोई और ठौर नहीं है उसका,

उसका परिवार,उसके बच्चे सब यहीं हैं,

यहीं है उसकी ज़िंदगी। 


इसी उम्मीद में जी रही है हिन्दी

कि शायद कभी पसीजे अपनों का दिल,

शायद कभी अपने घर में मिले 

उसे अपना कोई कोना। 




बुधवार, 26 अगस्त 2026

866. भूला-भटका रास्ता

 


पेड़ खड़े हैं क़तार में,

किसी के इंतज़ार में, 

शायद आ जाए इस ओर  

कोई अजनबी मुसाफ़िर। 


सावधान खड़े हैं सब,

देख रहे हैं टकटकी बांधे,

न कहीं बादल, न कहीं बारिश,

आज ख़ुशनुमा है मौसम। 


इस सुनसान रास्ते पर 

न कंकड़ हैं, न कांटे,

पर कौन जाता है उधर,  

कोई नहीं जाता जिधर? 


इतना भी डर काहे का,

इतनी भी एहतियात क्यों

कोई तो करे हिम्मत,

कोई तो समझे 

कि ऐसे रास्तों पर चलकर ही 

मिला करती है ढंग की मंज़िल।  


शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

865. कौवे का इंतज़ार




     


जब कभी कोई कौवा 

उसके घर की मुंडेर पर 

कांव-कांव करता है,

बहुत ख़ुश  हो जाती है 

वह अकेली महिला। 


बनाने लगती है 

अपने बेटे के लिए 

बेसन के लड्डू,

आलू-मटर की सब्ज़ी,

झाड़ने लगती है 

उसके कमरे का कोना-कोना । 


जब कभी आ जाता है

घर उसका बेटा,

तो कौवे की कांव-कांव में 

बढ़ जाता है उसका भरोसा । 


कौवे को नहीं मालूम 

कि कितनी बेसब्री से 

उसका इंतज़ार करती है 

किसी घर में कोई माँ,

कितनी मीठी लगती है उसको 

कौवे की कांव-कांव। 

शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

864. समुद्र-तट पर मैंने जाना

 





समुद्र-तट पर मैंने देखी 

दूर तक फैली हुई रेत,

उंगली चलाई, तो देखा,

आसानी से चल रही थी। 


जल्दी-जल्दी लिखने लगा मैं,

तस्वीरें बनाने लगा,

अचानक एक लहर आई,

सब कुछ बहा ले गई। 


समुद्र-तट पर मैंने जाना 

कि जहां लिखना आसान होता है, 

वहाँ मिट जाने का ख़तरा 

बहुत ज़्यादा होता है। 



शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

863. पाटखोड़ी

 


क्या आपने जूट की लकड़ी देखी है?

मेरे यहाँ पाटखोड़ी कहते हैं इसे, 

पतली-सी होती है,कमज़ोर सी,

पाँव पड़ते ही टूट जाती है,

पर जब यह जलती है,

तो देखने लायक होता है इसका जलना,

एकदम से धधक उठती है सिर से पाँव तक. 


एक बार जल उठे,

तो रोकना मुश्किल होता है इसे,

फिर राख होने तक जलती है, 

फिर जलाकर ही मानती है यह।