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रविवार, 29 मार्च 2026

849. युद्ध के दिनों में

 


जानता हूँ तुम्हें 

नौ महीने हो गए गर्भ में, 

पर छटपटाओ मत,

हो सके, तो अंदर ही रहो,

बाहर हवा ज़हरीली है,

ड्रोन, बम और मिसाइलें 

तुम्हारे इंतज़ार में हैं। 

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एक ऐसा युद्ध करते हैं,

जिसमें मिसाइलें बरसाएँ फूल,

तोपों की नलियाँ फेंकें गुलाल,

बंदूकों से निकले इत्र,

सिपाही खुरचकर मिटा दें 

मुल्कों के बीच खींची लकीरें। 


शनिवार, 21 मार्च 2026

848. निश्चय

 



रात को बार-बार चौंकती है,

झटके से उठ जाती है लड़की,

पसीने से लथपथ हो जाती है,

डरकर सहम जाती है लड़की। 


पानी के घूंट हलक से उतारती है, 

उठकर खिड़की तक जाती है, 

चुपके से गली में झाँकती है,

सब कुछ ठीक पाती है लड़की। 


फिर से बिस्तर पर आकर 

नींद का इंतज़ार करती है,

आज तय करती है लड़की, 

कल से टी.वी. नहीं देखेगी,

न ही अख़बार पढ़ेगी लड़की। 







बुधवार, 11 मार्च 2026

847.पंछी से

 


पंछी,
ठंड बहुत है,
पर दूर मत जाना,
यहीं रहना।

यहाँ की मिट्टी,
यहाँ के पेड़,
यहाँ की हवा-
मरने नहीं देंगे तुम्हें।

पंछी,
तुम्हारे परों में ताक़त है,
आसानी से भाग सकते हो तुम
मगर पंख उड़ने के लिए होते हैं,
भागने के लिए नहीं।

पंछी,
तुम्हें जाना है, तो जाओ,
पर इतना कहा मानना,
कभी लौटकर मत आना,
बड़ी मुश्किल से पड़ती है
किसी के बिना रहने की आदत।

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026

846. गुलाब



एक ख़ूबसूरत-सा ख़्वाब देखा मैंने,

गुलाब के हाथों में गुलाब देखा मैंने। 


कहते हैं आँखें उसकी झील सी हैं,

गुलाब में झील, झील में गुलाब देखा मैंने। 


न कभी सुना था, न कभी सोचा था, 

एक चलता-फिरता गुलाब देखा मैंने। 


जहां न खिला था, न खिल सकता था,

उसी सहरा में गुलाब देखा मैंने। 


गुलाब नावाक़िफ़ था गुलाब होने से,

उसने माना ही नहीं कि गुलाब देखा मैंने। 


जानता हूँ, उसने कांटे देखे मुझमें,

उसे पता है, उसमें गुलाब देखा मैंने। 


इस बात से वह नाराज़ है मुझसे,

उसमें काँटा नहीं, गुलाब देखा मैंने। 


न नींद आती है, न चैन पड़ता है,

किस मनहूस घड़ी में गुलाब देखा मैंने? 







बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

832. कीचड़ कमल से

 


कमल,

इतना भी मत इतराओ,

मुझमें ही हैं तुम्हारी जड़ें, 

तुमसे मैं नहीं, 

मुझसे तुम हो। 


मैं खिला सकता हूँ 

तुम जैसे कई कमल,

ज़िंदा रह सकता हूँ 

तुम्हारे बिना भी। 


भ्रम में मत रहो, 

मैं तुम्हारे पैरों में हूँ, 

पर अपने लिए नहीं, 

तुम्हारे लिए। 


मैं आधार हूँ तुम्हारा, 

तुम्हारी ज़मीन हूँ मैं, 

मैंने ही बचा रखा है तुम्हें 

लहरों में बह जाने से।