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गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026

873. करवा चौथ

 


मेरे घर आना,

तो करवा चौथ पर आना,

वही एक दिन है,

जब मुझे अपना घर 

अपना-सा लगता है। 

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हर करवा चौथ के दिन 

मैं चाँद से कहता हूँ,

समय पर उग जाना,

वह देर से उगता है,

तो न जाने क्यों,

दोषी मैं ठहराया जाता हूँ। 

++

करवा चौथ के दिन 

इतनी शांति होती है घर में 

कि मुझे लगता है,

यह मेरा नहीं, 

किसी और का घर है। 

++

करवा चौथ के बाद 

पत्नी का मूड ऐसे बदलता है,

जैसे बरसात के तुरंत बाद 

निकल आए कड़ी धूप। 


गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026

872. लड़ाइयाँ

 


मैं बीवी से लड़ा,

बच्चों से लड़ा, 

परिवार से लड़ा,

पड़ोसियों से लड़ा। 


मैं मुहल्ले से लड़ा,

शहर से लड़ा,

देश से लड़ा,

दुनिया से लड़ा। 


मैं भूल गया 

ख़ुद  से लड़ना,

ख़ुद से लड़ा होता,

तो मुझे नहीं लड़नी पड़तीं

इतनी सारी लड़ाइयाँ। 




बुधवार, 14 अक्टूबर 2026

871. सीमाएं

 



जो मैंने सोचा था,

वह मैं कर नहीं पाया,

जो मैं कर पाया,

वह मैंने सोचा नहीं था। 


जो मैं कर पाया,

वह बहुत अच्छा था,

पर जो मैं कर नहीं पाया,

उसको न  कर पाने की कसक 

हमेशा मेरे साथ रहती है। 


अब मैं न वह कर पाता हूँ, 

जो मैंने सोचा है,

न वह, जो मैं कर सकता हूँ,

पर जो मैंने सोचा नहीं है।  

मंगलवार, 29 सितंबर 2026

870. मालगाड़ी




मैं मालगाड़ी हूँ,

धीरे-धीरे चलती हूँ,

हर पैसेंजर, हर एक्सप्रेस को 

चुपचाप रास्ता देती। 


मेरी राह में भी आते हैं 

बहुत सारे स्टेशन,

पर किसी को नहीं रहता   

मेरा इंतज़ार,

किसी को फ़र्क़ नहीं पड़ता 

मेरे आने, न आने से। 


कोई सूचना नहीं दी जाती 

मेरे पहुँचने या छूटने की,

अफ़रा-तफ़री नहीं मचती 

मेरे स्टेशन पहुँचने पर। 


ऊँघते रहते हैं कुली अपनी जगहों पर, 

चायवाले नहीं संभालते अपनी केतलियाँ,

हॉकर नहीं दौड़ते उठकर,

मनचले नहीं झाँकते खिड़कियों से। 


अपमान, अनदेखी को अनदेखा कर,

मैं बढ़ती रहती हूँ मंज़िल की ओर,

जहां हो रहा होता है 

उस सामान का बेसब्री से इंतज़ार,

जो मैं चुपचाप ढो रही हूँ। 

रविवार, 27 सितंबर 2026

869. ठीक से देख लेना गाँव

 


वंदे भारत,
अबकी बार आना,
तो कुछ देर ठहर जाना,
हम नहीं चढ़ेंगे तुम्हारे डिब्बों में, 
ठीक से देख लेना हमारा गाँव,
फिर अपने रास्ते चली जाना।