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मंगलवार, 26 मई 2026

857. बारिश

 


बांसुरियों, सज जाओ होंठों पर,

बजो,

पायलों, बंध जाओ पाँवों में,

खनको,

गीतों,चढ़ जाओ ख़ुश्क जीभों पर,

गूँजो। 


बरस रहा है पानी रिमझिम,

तर हो गई है सूखी मिट्टी,

जुताई के लिए तैयार हैं खेत,

अब गूंजना चाहिए फ़ज़ाओं में 

उल्लास में तर संगीत। 



शुक्रवार, 22 मई 2026

856. क़तार के आख़िर में खड़ा आदमी

 


क़तार के आख़िर में खड़ा आदमी 

अनंत से अपनी बारी के इंतज़ार में है,

वह क़तार के आख़िर में इसलिए है 

कि नए-नए लोग आते गए

और यह कहकर आगे खड़े होते गए 

कि हम जहां खड़े हो जाते हैं,

लाइन वहीं से शुरू होती है। 


शुक्रवार, 8 मई 2026

855. माँ

कल मदर्स डे के अवसर पर सभी माँओं के सम्मान में मेरी यह कविता।

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उसने नहीं सीखा हथियार चलाना,

नहीं लड़ी कोई लड़ाई,

पर वह डटी रहती है 

मोर्चे पर हर वक़्त,

डरती नहीं किसी वर्दी से,

ख़ौफ़ नहीं उसे किसी दुश्मन का। 


उसका घर उसका देश है,

देहरी देश की सीमा,

बच्चे देश के नागरिक,

उसके होने भर से 

महफ़ूज़ रहता है उसका देश,

चैन से सोते हैं उसके बच्चे। 




शनिवार, 2 मई 2026

854. सुनो, जीतू मुंडा

 


जीतू मुंडा,

मुश्किल रहा होगा तुम्हारे लिए 

अपनी बहन को मरते देखना,

उसे क़ब्र में लिटाना,

उसके शव पर मिट्टी डालना,

फिर कोई जंगली फूल चढ़ाना। 


ऐसा करते वक़्त 

तुमने सपने में भी नहीं सोचा होगा 

कि तुम्हें कभी निकालना होगा 

क़ब्र से उसका कंकाल। 


कैसे चले होगे तुम 

बहन को कांधे पर लादे,

कितनी दूर जाना पड़ा होगा तुम्हें,

ज़्यादा भारी रहा होगा 

उसके शव से उसका कंकाल। 


जीतू मुंडा,

यहाँ मुश्किल है ज़िंदा लोगों के लिए 

ख़ुद को ज़िंदा साबित करना,

मुश्किल है लाशों के लिए 

ख़ुद को मृत साबित करना,

असंभव है कंकाल के लिए 

यह साबित करना 

कि वह तुम्हारी बहन है। 


जीतू मुंडा,

जिनके कारण तुम कंकाल ढो रहे हो,

वे चल-फिर रहे हैं,

सांस ले रहे हैं,

पर ज़िंदा नहीं हैं। 


मत ढोओ अपने कंधों पर 

इतना बड़ा बोझ,

सोने दो अपनी बहन को क़ब्र में,

बड़े भोले हो तुम,

इतना भी नहीं जानते 

कि नहीं पसीजता लाशों का दिल

कंकालों को देखकर। 


बुधवार, 29 अप्रैल 2026

853. इस साल बिहू में

 




इन दिनों असम में रंगाली बिहू की धूम है। यह उत्सव महीने-भर चलता है। बिहू की परंपराओं और उसके मूड पर आधारित है यह ग़ज़ल।
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मुर्दा दिलों में उमंग है बिहू में,
बेरंग चेहरों पर रंग है बिहू में।
ढोल जो बजा ,तो थिरकने लगे पाँव,
शराब में नहीं, जो नशा है बिहू में।
भटकते रहोगे जंगलों में कब तक,
लौट आओ बस्ती में इस साल बिहू में।
पेपा भी बजाता है, टोका भी, गगना भी,
हुनर उसका देखिए, तो देखिए बिहू में।
बांध लिया है उसने जो सिर पर गमछा,
मेरी ही नज़र न लग जाए उसे बिहू में।
झटके से दिल मेरा तोड़ दिया उसने,
पाँव छूए, गमछा दिया इस बार बिहू में।
झूम रहा है कपौ, फूला-फूला सा लगता है,
खोंसा जाएगा वह, किसी जूड़े में बिहू में।
काटने को दौड़ता है तुम्हारे बिना घर,
तुम्हारा ही घर है, चले आओ बिहू में।
पल-पल आज तुम नई सी लगती हो,
जादू है तुममें या जादू है बिहू में?