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बुधवार, 11 मार्च 2026

847.पंछी से

 


पंछी,

ठंड बहुत है, 

पर भागकर मत जाना, 

यहीं रहना। 

यहाँ की मिट्टी, 

यहाँ के पेड़,

यहाँ की हवा- 

मरने नहीं देंगे तुम्हें। 


पंछी, 

तुम्हारे परों में ताक़त है, 

आसानी से जा सकते हो तुम 

हज़ारों किलोमीटर दूर,   

मगर पंख उड़ने के लिए होते हैं,

भागने के लिए नहीं। 


पंछी, 

मुझे तो यहीं रहना है, 

तुम्हें जाना है, तो जाओ,

पर इतना कहा मानना,

लौटकर मत आना, 

बड़ी मुश्किल से पड़ती है 

किसी के बिना रहने की आदत। 


शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026

846. गुलाब



एक ख़ूबसूरत-सा ख़्वाब देखा मैंने,

गुलाब के हाथों में गुलाब देखा मैंने। 


कहते हैं आँखें उसकी झील सी हैं,

गुलाब में झील, झील में गुलाब देखा मैंने। 


न कभी सुना था, न कभी सोचा था, 

एक चलता-फिरता गुलाब देखा मैंने। 


जहां न खिला था, न खिल सकता था,

उसी सहरा में गुलाब देखा मैंने। 


गुलाब नावाक़िफ़ था गुलाब होने से,

उसने माना ही नहीं कि गुलाब देखा मैंने। 


जानता हूँ, उसने कांटे देखे मुझमें,

उसे पता है, उसमें गुलाब देखा मैंने। 


इस बात से वह नाराज़ है मुझसे,

उसमें काँटा नहीं, गुलाब देखा मैंने। 


न नींद आती है, न चैन पड़ता है,

किस मनहूस घड़ी में गुलाब देखा मैंने? 







बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

832. कीचड़ कमल से

 


कमल,

इतना भी मत इतराओ,

मुझमें ही हैं तुम्हारी जड़ें, 

तुमसे मैं नहीं, 

मुझसे तुम हो। 


मैं खिला सकता हूँ 

तुम जैसे कई कमल,

ज़िंदा रह सकता हूँ 

तुम्हारे बिना भी। 


भ्रम में मत रहो, 

मैं तुम्हारे पैरों में हूँ, 

पर अपने लिए नहीं, 

तुम्हारे लिए। 


मैं आधार हूँ तुम्हारा, 

तुम्हारी ज़मीन हूँ मैं, 

मैंने ही बचा रखा है तुम्हें 

लहरों में बह जाने से। 



सोमवार, 19 जनवरी 2026

831. पतंग


 

बहुत पतंगें थीं आसमान में,

जिनमें से एक हठात कट गई,

बड़ी देर से उड़ रही थी,

हिचकोले खा रही थी,

फिर संभल भी रही थी। 


लड़ना आता था उसे,

मज़बूत थी उसकी डोर,

तेज़ था उसका माँझा,

लग नहीं रहा था कि कटेगी,

हिम्मतवाली थी वह बूढ़ी पतंग। 


कोई नहीं जानता 

कि कब तक उड़ेगी कौन सी पतंग ,

पर इतना तो तय है 

कि कितनी भी जीवटवाली हो पतंग,

कितना भी तेज़ हो उसका माँझा,

कितनी भी मज़बूत हो उसकी डोर,

कटना ही पड़ता है हर पतंग को,

फटना ही पड़ता है कभी-न-कभी। 


मंगलवार, 13 जनवरी 2026

830. इस बार का भोगाली बिहू

 


इस साल लड्डुओं में
मिठास कुछ कम है,
भेलाघर* अच्छा है,
पर पहले-सा नहीं है।

मेजी** की आंच मद्धिम है,
चिड़वा थोड़ा कच्चा,
दही खट्टा है,
गुड़ का रंग अच्छा है,
पर स्वाद वैसा नहीं है।

गुनगुना तो रहे हैं सभी,
पर गीतों में रस नहीं है,
नाच भी रहे हैं, पर पाँवों में
वह थिरकन नहीं है।

सब कुछ पहले-सा है,
पर ध्यान से देखूँ,
तो बदला-बदला,
बुझा-बुझा सा है ।

समय लगता है मौसम को
करवट बदलने में,
ज़्यादा दूर नहीं है रंगाली बिहू,
न जाने कितना अलग होगा वह
इस साल के भोगाली बिहू से ।

*भेलाघर- एक अस्थाई झोपड़ी, जो भोगाली बिहू के अवसर पर बनाई जाती है।
**मेजी- पवित्र अग्नि