मैं बीवी से लड़ा,
बच्चों से लड़ा,
परिवार से लड़ा,
पड़ोसियों से लड़ा।
मैं मुहल्ले से लड़ा,
शहर से लड़ा,
देश से लड़ा,
दुनिया से लड़ा।
मैं भूल गया
ख़ुद से लड़ना,
ख़ुद से लड़ा होता,
तो मुझे नहीं लड़नी पड़तीं
इतनी सारी लड़ाइयाँ।
मैं बीवी से लड़ा,
बच्चों से लड़ा,
परिवार से लड़ा,
पड़ोसियों से लड़ा।
मैं मुहल्ले से लड़ा,
शहर से लड़ा,
देश से लड़ा,
दुनिया से लड़ा।
मैं भूल गया
ख़ुद से लड़ना,
ख़ुद से लड़ा होता,
तो मुझे नहीं लड़नी पड़तीं
इतनी सारी लड़ाइयाँ।
जो मैंने सोचा था,
वह मैं कर नहीं पाया,
जो मैं कर पाया,
वह मैंने सोचा नहीं था।
जो मैं कर पाया,
वह बहुत अच्छा था,
पर जो मैं कर नहीं पाया,
उसको न कर पाने की कसक
हमेशा मेरे साथ रहती है।
अब मैं न वह कर पाता हूँ,
जो मैंने सोचा है,
न वह, जो मैं कर सकता हूँ,
पर जो मैंने सोचा नहीं है।
धीरे-धीरे चलती हूँ,
हर पैसेंजर, हर एक्सप्रेस को
चुपचाप रास्ता देती।
मेरी राह में भी आते हैं
बहुत सारे स्टेशन,
पर किसी को नहीं रहता
मेरा इंतज़ार,
किसी को फ़र्क़ नहीं पड़ता
मेरे आने, न आने से।
कोई सूचना नहीं दी जाती
मेरे पहुँचने या छूटने की,
अफ़रा-तफ़री नहीं मचती
मेरे स्टेशन पहुँचने पर।
ऊँघते रहते हैं कुली अपनी जगहों पर,
चायवाले नहीं संभालते अपनी केतलियाँ,
हॉकर नहीं दौड़ते उठकर,
मनचले नहीं झाँकते खिड़कियों से।
अपमान, अनदेखी को अनदेखा कर,
मैं बढ़ती रहती हूँ मंज़िल की ओर,
जहां हो रहा होता है
उस सामान का बेसब्री से इंतज़ार,
जो मैं चुपचाप ढो रही हूँ।
वंदे भारत की तरह नहीं,
कभी पैसेंजर की तरह भी आओ,
मेरे छोटे से स्टेशन पर
एक दिन के लिए ही सही,
थोड़ी देर रुक जाओ।