पेड़ खड़े हैं क़तार में,
किसी के इंतज़ार में,
शायद आ जाए इस ओर
कोई अजनबी मुसाफ़िर।
सावधान खड़े हैं सब,
देख रहे हैं टकटकी बांधे,
न कहीं बादल, न कहीं बारिश,
आज ख़ुशनुमा है मौसम।
इस सुनसान रास्ते पर
न कंकड़ हैं, न कांटे,
पर कौन जाता है उधर,
कोई नहीं जाता जिधर?
इतना भी डर काहे का,
इतनी भी एहतियात क्यों,
कोई तो करे हिम्मत,
कोई तो समझे
कि ऐसे रास्तों पर चलकर ही
मिला करती है ढंग की मंज़िल।


