शुक्रवार, 18 जून 2021

५८०. कोरोना में प्रेम कविताएँ

यूँ परेशान मत होओ,

हाथ-पाँव मत मारो,

कोई असर नहीं होगा

रेमडेसिविर,प्लाज़्मा का,

मैं कोरोना नहीं हूँ,

एक बार दिल में घुस गया,

तो निकलता नहीं हूँ. 

**

मैं कोरोना नहीं हूँ 

कि तुम मास्क लगा लो 

और दूर कर दो मुझे,

मास्क लगाकर तो तुमसे

ठीक से इन्कार भी नहीं होता. 

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वैसे तो हज़ारों हैं यहाँ,

पर तुम नहीं, तो कोई नहीं,

मैं कोरोना नहीं हूँ 

कि किसी को भी हो जाऊँ।


मंगलवार, 15 जून 2021

५७९. पहाड़

 


धीरे-धीरे कम हो रहा है 

आपदा का पहाड़,

चार से तीन लाख,

तीन से दो,

दो से एक,

अब एक से कम. 


साफ़ होने लगा है कुछ-कुछ 

पहाड़ के पीछे का आसमान,

उड़ते दिख रहे हैं पंछी,

बन रहा है इंद्रधनुष. 


ग़ायब हो जाएगा जल्दी ही 

यह आपदा का पहाड़,

कितना ही ताक़तवर क्यों न हो,

ख़त्म तो होना ही है इसे. 


हम कोशिश करेंगे 

कि ऐसा पहाड़  

फिर खड़ा न हो,

हो भी, तो उसकी ऊंचाई 

एक पहाड़ी से ज़्यादा न हो.


शनिवार, 12 जून 2021

५७८. पिता

 


मैंने पिता को कभी रोते नहीं देखा,

किसी अपने की मौत पर भी नहीं,

ग़म का पहाड़ टूटने पर भी नहीं, 

बस उनकी आवाज़ भर्रा जाती थी,

या दिख जाती थी थोड़ी-सी नमी

उनकी पलकों के ठीक पीछे. 


रात को मेरी नींद उचटती थी,

तो एक सिसकी सुनाई पड़ती थी,

दबी-कुचली, ज़िद्दी-सी सिसकी,

पिता थोड़े चिड़चिड़े हो गए थे,

बूढ़े होने की जल्दी में लगते थे. 


काश कि वे खुलकर रो लेते,

काश कि मैं उनसे कह पाता 

कि पिता भी कभी-कभी रो सकते हैं. 


गुरुवार, 10 जून 2021

५७७.अंत



गुलमोहर के पेड़ पर खिले 

आख़िरी फूल,

तुम्हारी जिजीविषा को सलाम।


गिरते रहे एक-एक कर 

तुम्हारे साथ खिले फूल,

पर तुम डटे रहे,

लड़ते रहे तूफ़ानों से,

भिड़ते रहे बारिशों से,

पर अब तुम्हें जाना होगा,

मिलना होगा मिट्टी में. 


जिन पत्तों से तुम घिरे हो,

जिस डाल पर खिले हो,

जिस पेड़ से जुड़े हो,

सब होंगे एक दिन धराशाई,

कोई पहले,कोई बाद में. 


यहाँ तक कि तुम्हारे पेड़ की जड़ें,

जो घुस गई हैं ज़मीन में गहरे तक,

एक दिन सूख जाएंगी,

अंत निश्चित है उनका भी.


बुधवार, 9 जून 2021

५७६.रात

 


कोई-कोई रात 

बहुत अंधेरी होती है,

पूनम का चाँद खिला हो,

तो भी ऐसा हो सकता है. 


सब दिखता है आँखों से,

पर नींद जैसे रूठकर 

कोसों दूर चली जाती है,

दिमाग़ जैसे सुन्न हो जाता है. 


ऐसे में ख़ुद को थामे रखिए,

हाथों में हाथ डाले रहिए,

इंतज़ार कीजिए,

यह वक़्त भी गुज़र जाएगा. 


कोई रात कितनी ही डरावनी क्यों न हो,

सुबह को आने से नहीं रोक सकती.