बुधवार, 1 दिसंबर 2021

६२४.नदी



बहती चली जाती है नदी,

आवाज़ देकर बुलाती है,

प्यासों की प्यास बुझाती है, 

इंसान,जानवर,परिंदा -

जो चाहे आए,

जितना चाहे पानी पी जाए,

बदले में कुछ नहीं मांगती,

शुक्रिया भी नहीं,

आगे निकल जाती है नदी. 

**

चट्टानों से टकराती है,

जंगलों से गुज़रती है,

अपना रास्ता ख़ुद बनाती है,

अनवरत संघर्ष करती है, 

कभी थकती नहीं,

कभी रुकती नहीं,

गुनगुनाना नहीं छोड़ती 

यह मस्तमौला नदी.

 

9 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार(०३-१२ -२०२१) को
    'चल जिंदगी तुझको चलना ही होगा'(चर्चा अंक-४२६७)
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

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  2. वाह!!!
    मस्तमौला नदी...शुक्रिया भी नहीं चाहती...
    बहुत सुन्दर।

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  3. बहुत सुन्दर !
    ज़िंदगी भी काश इसी नदी की तरह मस्तमौला होती.

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