मंगलवार, 9 नवंबर 2021

६१८. काँव -काँव


 

बहुत दिनों तक कोई मेहमान

मेरे घर नहीं आता,

तो मैं इंतज़ार करता हूँ 

किसी कौए की काँव-काँव का. 


कहते हैं,जब कोई कौआ  

घर की मुंडेर पर बैठकर 

काँव-काँव करता है,

तो कोई आने वाला होता है. 


लम्बे इंतज़ार के बाद 

जब भी कोई कौआ 

मेरे घर की मुंडेर पर आकर 

काँव-काँव करने लगता है,

तो मैं बहुत ख़ुश हो जाता हूँ,

उसकी काँव-काँव के आगे 

कोयल की कूक भी मुझे 

फ़ीकी लगने लगती है. 


11 टिप्‍पणियां:

  1. एकांतवासी की मनोदशा का हृदय स्पर्शी शब्द चित्र । अति सुन्दर सृजन ।

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  2. सुन्दर कौआ अब कहां दिखाई देता है ?

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  3. क्या वाक़ई कोई आता भी है या केवल कांव कांव ही सुनने को मिलती है

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  4. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल गुरुवार(११-११-२०२१) को
    'अंतर्ध्वनि'(चर्चा अंक-४२४५)
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

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  5. वाह क्या बात कही है सर सच में कुछ ऐसा ही लगता है! बहुत ही सुंदर रचना

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  6. बहुत सुंदर! सच मन की पिपासा मन ही समझता है,कोयल से मधुर कितनी बार कौवे की काँव काँव लगती है।
    अद्भुत।

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  7. धीरे-धीरे कौए और मेहमान गायब होते जा रहे हैं, फिर भी रिश्‍तों की डोर से बंधे हमें इंतजार करना अच्‍छा लगता है

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  8. वाह ओंकार जी !
    माता कौशल्या की तरह आपको भी क्या किसी श्री राम के आने की आस है?
    'बैठी सगुन मनावत माता,
    कब अइहैं मोरे बाल कुसल घर, कहहु काग पुर बासा !

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  9. कहीं मेहमान का इस तरह इंतजार कि कौवे की काँव काँव से खुशी मिल जाती है तो कहीं मेहमानदारी निभाने से कतराते है ..
    वाह!!!

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  10. बहुत बढ़िया ओंकार बीवीजी। किसी का पास होना ही बहुत बड़ा सौभाग्य है आजाकल्त कोयल न सही कौआ ही सही।

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