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शुक्रवार, 1 अक्तूबर 2021

६०७.डूबना

 


बहुत से लोग खड़े थे 

इंतज़ार में साहिल पर

कि मैं डूब जाऊँ,

तो वे बचाने आएँ.

**

मैं जब डूब रहा था,

कई गोताखोर थे साहिल पर,

पर तय नहीं कर पा रहे थे 

कि मुझे कौन बचाएगा. 

**

तैरना नहीं आता,

तो शांति से डूब जाओ,

जो साहिल पर खड़े हैं,

तुम्हें बचाने नहीं,

तमाशा देखने आए हैं. 

**

लहर कहती है,

आओ,मेरे साथ चलो,

ये जो साहिल पर खड़े हैं,

ऐसे बहुतेरे देखे हैं मैंने. 

***

साहिल की ओर देखोगे,

तो मायूसी हाथ लगेगी,

कोई बचाने नहीं आएगा,

चैन से मर भी नहीं पाओगे.


5 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना  ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" रविवार 03 अक्टूबर 2021 को साझा की गयी है....
    पाँच लिंकों का आनन्द पर
    आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (3-10-21) को "दो सितारे देश के"(चर्चा अंक-4206) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है,आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी।
    ------------
    कामिनी सिन्हा


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  3. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

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  4. हकिकत को बयां करती बहुत उम्दा रचना

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  5. बहुत लाजवाब लिखा है इस को कोई कवि ही समझ सकता हैं

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