बुधवार, 9 जून 2021

५७६.रात

 


कोई-कोई रात 

बहुत अंधेरी होती है,

पूनम का चाँद खिला हो,

तो भी ऐसा हो सकता है. 


सब दिखता है आँखों से,

पर नींद जैसे रूठकर 

कोसों दूर चली जाती है,

दिमाग़ जैसे सुन्न हो जाता है. 


ऐसे में ख़ुद को थामे रखिए,

हाथों में हाथ डाले रहिए,

इंतज़ार कीजिए,

यह वक़्त भी गुज़र जाएगा. 


कोई रात कितनी ही डरावनी क्यों न हो,

सुबह को आने से नहीं रोक सकती.


13 टिप्‍पणियां:

  1. वाह ! बहुत सुंदर संदेश देती, नव ऊष्मा देती रचना ।

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  2. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर गुरुवार 10 जून 2021 को लिंक की जाएगी ....

    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!

    !

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  3. बस यही आशा है इस अंधेरी रात के बाद जल्द सूर्योदय हो।
    बहुत सुन्दर सृजन।

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  4. बस यही तो जीवन है कभी दुःस्वप्न और कभी रेशमी अहसास से भरी सुबह का इंतज़ार - - बहुत सुन्दर सृजन।

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  5. कोई रात कितनी ही डरावनी क्यों न हो,

    सुबह को आने से नहीं रोक सकती. ---सच कहा आपने...अक्सर तूफान के बाद अगली सुबह बहुत अधिक चमकीली होती है....वह हमारे लिए उम्मीदें भी बरसाती है...। सुंदर सृजन।

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  6. सच है! सुंदर आशापरक सृजन

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  7. " यह वक़्त भी गुज़र जाएगा."- निश्चित रूप से वक्त, बुरा हो या अच्छा, गुजर ही जाएगा .. बस ! .. पीछे अपनी रफ़्तार के अनुसार ग़ुबार छोड़ जाएगा .. जिसे हमें झेलना होता है .. शायद ...

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  8. सत्य कहा सुबह ज़रूर आयेगी!सुन्दर रचना!

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  9. हां सुबह तो जरूर आयेगी , सुंदर आशा का संदेश देती सुंदर रचना।

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