शनिवार, 12 जून 2021

५७८. पिता

 


मैंने पिता को कभी रोते नहीं देखा,

किसी अपने की मौत पर भी नहीं,

ग़म का पहाड़ टूटने पर भी नहीं, 

बस उनकी आवाज़ भर्रा जाती थी,

या दिख जाती थी थोड़ी-सी नमी

उनकी पलकों के ठीक पीछे. 


रात को मेरी नींद उचटती थी,

तो एक सिसकी सुनाई पड़ती थी,

दबी-कुचली, ज़िद्दी-सी सिसकी,

पिता थोड़े चिड़चिड़े हो गए थे,

बूढ़े होने की जल्दी में लगते थे. 


काश कि वे खुलकर रो लेते,

काश कि मैं उनसे कह पाता 

कि पिता भी कभी-कभी रो सकते हैं. 


8 टिप्‍पणियां:

  1. पिता कभी कभी रो सकते हैं ..... बस एक आह और ....वाह .

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  2. उफ़! झकझोर दिया आपने।
    सार्थक सृजन।

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  3. नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा सोमवार (14-06-2021 ) को 'ये कभी सत्य कहने से डरते नहीं' (चर्चा अंक 4095) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है।

    चर्चामंच पर आपकी रचना का लिंक विस्तारिक पाठक वर्ग तक पहुँचाने के उद्देश्य से सम्मिलित किया गया है ताकि साहित्य रसिक पाठकों को अनेक विकल्प मिल सकें तथा साहित्य-सृजन के विभिन्न आयामों से वे सूचित हो सकें।

    यदि हमारे द्वारा किए गए इस प्रयास से आपको कोई आपत्ति है तो कृपया संबंधित प्रस्तुति के अंक में अपनी टिप्पणी के ज़रिये या हमारे ब्लॉग पर प्रदर्शित संपर्क फ़ॉर्म के माध्यम से हमें सूचित कीजिएगा ताकि आपकी रचना का लिंक प्रस्तुति से विलोपित किया जा सके।

    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।

    #रवीन्द्र_सिंह_यादव

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  4. वाह!सच कहा आपने । सटीक अभिव्यक्ति।

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  5. बहुत ही मार्मिक सृजन।
    सादर

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  6. सुंदर मर्मस्पर्शी रचना....

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