मंगलवार, 15 जून 2021

५७९. पहाड़

 


धीरे-धीरे कम हो रहा है 

आपदा का पहाड़,

चार से तीन लाख,

तीन से दो,

दो से एक,

अब एक से कम. 


साफ़ होने लगा है कुछ-कुछ 

पहाड़ के पीछे का आसमान,

उड़ते दिख रहे हैं पंछी,

बन रहा है इंद्रधनुष. 


ग़ायब हो जाएगा जल्दी ही 

यह आपदा का पहाड़,

कितना ही ताक़तवर क्यों न हो,

ख़त्म तो होना ही है इसे. 


हम कोशिश करेंगे 

कि ऐसा पहाड़  

फिर खड़ा न हो,

हो भी, तो उसकी ऊंचाई 

एक पहाड़ी से ज़्यादा न हो.


10 टिप्‍पणियां:

  1. आमीन ! मगर एक ड्सरे पहाड़ की खबर मिलने लगी है

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  2. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार (18-06-2021) को "बहारों के चार पल'" (चर्चा अंक- 4099) पर होगी। चर्चा में आप सादर आमंत्रित हैं।
    धन्यवाद सहित।

    "मीना भारद्वाज"

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  3. बहुत ही सुंदर सृजन सर।
    सादर

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  4. वाह बहुत ही सुंदर अहसास ।
    सुंदर सृजन ।

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  5. ऐसे पहाड़ भी हमारे ही बनाए हुए हैं ! शायद अब सीख ले ली हो

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  6. आपकी दुआ के साथ हमारी भी दुआ शामिल है,परमात्मा करे ऐसा ही हो,मगर ये तभी होगा जब हम सब जागरूक रहेंगे , सादर नमन आपको

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  7. बेहद सकारात्‍मक पंक्‍त‍ियां ओंकार जी....ग़ायब हो जाएगा जल्दी ही

    यह विपत्तियों का पहाड़,

    कितना ही ताक़तवर क्यों न हो,

    ख़त्म तो होना ही है इसे.

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  8. साफ़ होने लगा है कुछ-कुछ

    पहाड़ के पीछे का आसमान,

    उड़ते दिख रहे हैं पंछी,

    बन रहा है इंद्रधनुष. बहुत ही सार्थक सृजन ।

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  9. काश सब मिल कर कोशिश करें ।
    सुंदर भाव

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