शुक्रवार, 7 मई 2021

५६३.मशविरा



वह कौन है,

जो ज़ोर-ज़ोर से 

अस्पताल के दरवाज़े पर 

दस्तक दे रहा है?


उसे कहो,

यहाँ कोई बेड नहीं है,

कहीं कोई बेड नहीं है,

वह कितना ही क्यों न पीटे,

दरवाज़ा नहीं खुलेगा.  


उसे कहो,

वापस घर जाए,

क्या उसे नहीं मालूम 

कि कोरोना-काल में 

जहाँ तक संभव हो,

घर में ही रहना बेहतर है? 

12 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा रविवार ( 09-05-2021) को
    "माँ के आँचल में सदा, होती सुख की छाँव।। "(चर्चा अंक-4060)
    पर होगी। चर्चा में आप सादर आमंत्रित है.धन्यवाद

    "मीना भारद्वाज"

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  2. सच में घर सबसे बेहतर। मौत भी आयेगी तो अपनों के सामने। भावपूर्ण रचना ओंकार जी। हार्दिक शुभकामनाएं,👌👌🙏🙏

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  3. बेहद हृदयस्पर्शी सृजन

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  4. भावपूर्ण कविता \सादर अभिवादन

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  5. अत्यंत मर्मस्पर्शी सृजन ।

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  6. बहुत सुंदर संवेदनशील

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  7. वाह! अद्भुत। अद्वितीय। बेहतरीन व्यंग्य एवं सलाह भी।

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