रविवार, 23 मई 2021

५७०. सुनो कवि



सुनो कवि,

तुम्हें नहीं सुनती कोई कराह,

तुम्हें नहीं सुनता कोई क्रंदन,

पर कितना आश्चर्य है 

कि तुम्हें साफ़-साफ़ सुन जाती है 

कोयल की कूक. 

***

सुनो कवि,

तुम अंधे तो नहीं हो,

देख सकते हो,

बहरे भी नहीं हो,

सुन सकते हो,

फिर इस तांडव के बीच 

कैसे लिख लेते हो तुम 

कोई प्रेम कविता?

***

सुनो कवि,

मैं नहीं कहता 

कि तुम मत लिखो,

लिखो,ख़ूब लिखो,

पर सच लिखो।

याद रखना,

तुम्हारी अपनी आँखें 

तुम्हारी क़लम की ओर 

टकटकी बांधे देख रही हैं.


13 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (24 -5-21) को "अब दया करो प्रभु सृष्टि पर" (चर्चा अंक 4076) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    --
    कामिनी सिन्हा

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  2. तुम्हें नहीं सुनती कोई कराह,

    तुम्हें नहीं सुनता कोई क्रंदन,

    पर कितना आश्चर्य है

    कि तुम्हें साफ़-साफ़ सुन जाती है

    कोयल की कूक. ---बहुत गहरी पंक्तियां हैं

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  3. सोच में जब भरा हो धुआँ ही धुआँ

    उनका सुनना भी क्या और सुनाना भी क्या !



    वो जमीं के मसाइल न हल कर सके

    चाँद पर फिर महल का बनाना भी क्या !----बहुत गहरी पंक्तियां हैं ...

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  4. बहुत ख़ूबसूरत और उत्कृष्ट रचना।

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  5. सुनो कवि,

    तुम अंधे तो नहीं हो,

    देख सकते हो,

    बहरे भी नहीं हो,

    सुन सकते हो,

    फिर इस तांडव के बीच

    कैसे लिख लेते हो तुम

    कोई प्रेम कविता?
    वाह!!!
    लाजवाब।

    जवाब देंहटाएं
  6. इस तांडव के बीच 

    कैसे लिख लेते हो तुम 

    कोई प्रेम कविता?

    लाजवाब

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  7. इस माहौल में लोग प्रेम और प्रकृति को पूरी ही तरह भूल गए हैं, जो कोरोना से पीड़ित हैं वही नहीं, जो स्वस्थ और सकुशल हैं वह भी। लोग अवसाद में ना चले जाएँ इसलिए प्रेम कविता लिखना जरूरी है।

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  8. सच , इस माहौल में कोई कैसे लिख सकता है प्रेम कविता । भाव पूर्ण अभिव्यक्ति ।

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