शुक्रवार, 16 अप्रैल 2021

५५५. सेमल



लो,गिरा दिए मैंने सारे पत्ते,

अब फूल ही फूल बचे हैं,

पर मेरी अनदेखी अभी जारी है

समझ में नहीं आता, क्या करूं 

कि तुम्हारी नज़र मुझ पर पड़े. 


चलो, मैंने फ़ैसला कर लिया है,

फूल भी गिरा दूंगा एक-एक करके,

बिल्कुल ठूँठ बन जाऊंगा,

तब तुम मेरी ओर देखना,

हैरानी,दया या हिक़ारत से,

पर मेरी अनदेखी मत करना. 

14 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना आज शनिवार १७ अप्रैल २०२१ को शाम ५ बजे साझा की गई है......... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन " पर आप भी सादर आमंत्रित हैं ....धन्यवाद! ,

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  2. आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल रविवार (18-04-2021) को चर्चा मंच   "ककड़ी खाने को करता मन"  (चर्चा अंक-4040)  पर भी होगी!--सूचना देने का उद्देश्य यह है कि आप उपरोक्त लिंक पर पधार कर चर्चा मंच के अंक का अवलोकन करे और अपनी मूल्यवान प्रतिक्रिया से अवगत करायें।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
    --

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  3. सच है अनदेखी बहुत मन को दुःख देती है । आपकी होली पर लिखी कविता भी याद आ गयी । उसमें भी कुछ अनदेखी की ही बात थी ।

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  4. हृदयस्पर्शी भावाभिव्यक्ति ।

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  5. मैं इस कविता में छुपे दर्द को महसूस कर रहा हूं ओंकार जी।

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  6. बेहतरीन भाव संजोए, लाजवाब सृजन। साधुवाद आदरणीय ओंकार जी।

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  7. सुंदर और सटीक. मैंने सेमल ठूंठ बनते देखे हैं। कभी गिद्धों के आश्रयदाता थे, अब न वे पक्षी बचे न उनके घर :(

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  8. चलो, मैंने फ़ैसला कर लिया है,

    फूल भी गिरा दूंगा एक-एक करके,

    बिल्कुल ठूँठ बन जाऊंगा,

    तब तुम मेरी ओर देखना,

    हैरानी,दया या हिक़ारत से,

    पर मेरी अनदेखी मत करना.

    सशक्त बिबं-प्रधान भाव उद्वेलन

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  9. बहुत ही सुंदर,सार्थक,हृदय स्पर्शी सृजन ।

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