सोमवार, 12 अप्रैल 2021

५५३.ज़िम्मेदारी



इस जगह एक स्टेशन है,

एक प्लेटफॉर्म भी है यहाँ,

पटरियाँ बिछी हैं सामने, 

यहाँ से होकर जाती हैं रेलगाड़ियाँ 

कोई इस ओर,तो कोई उस ओर.


किस गाड़ी में चढ़ना है,

किस तरफ़ जाना है,

जाना भी है या नहीं,

मुसाफ़िर को तय करना है. 


रास्ते में आते हैं 

एक के बाद एक स्टेशन,

किस पर उतरना है,

किसे छोड़ देना है,

मुसाफ़िर को तय करना है. 


स्टेशन,पटरियाँ, रेलगाड़ियाँ -

सब साधन हैं बस,

किनका इस्तेमाल करना है,

करना भी है या नहीं,

कैसे करना है,

कितना करना है,

कब करना है,

मुसाफ़िर को ही तय करना है. 


ज़िम्मेदारी उसे ही लेनी पड़ती है,  

जिसे मंज़िल पर पहुँचना होता है. 

10 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (14-04-2021) को  ""नवसम्वतसर आपका, करे अमंगल दूर"  (चर्चा अंक 4036)  पर भी होगी। 
    --   
    मित्रों! चर्चा मंच का उद्देश्य उन ब्लॉगों को भी महत्व देना है जो टिप्पणियों के लिए तरसते रहते हैं क्योंकि उनका प्रसारण कहीं भी नहीं हो रहा है। ऐसे में चर्चा मंच विगत बारह वर्षों से अपने धर्म को निभा रहा है। 
    --
    भारतीय नववर्ष, बैसाखी और अम्बेदकर जयन्ती की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
    --  

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  2. वाह! जिम्मेदारियों के ज़ज्बात!!

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  3. ज़िम्मेदारी उसे ही लेनी पड़ती है,

    जिसे मंज़िल पर पहुँचना होता है.

    बिलकुल सत्य कहा आपने।जैसी राह चुनेगे मंजिल भी वैसी ही मिलेगी।
    आपको नववर्ष और नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाये

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  4. ज़िम्मेदारी उसे ही लेनी पड़ती है जिसे मंजिल तक पहुँचाना पड़ता है .... लेकिन जब एक मंजिल तय हो तो मुसाफिर कहाँ कुछ तय कर पाता है ...

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