सोमवार, 19 अप्रैल 2021

५५६. कूक



एक अकेली कोयल 

पेड़ पर बैठी कूक रही है,

किसी को फ़ुर्सत नहीं 

कि चुपचाप सुने उसका गीत,

अपने आप में व्यस्त हैं 

सभी के सभी. 


बस एक चिड़िया है,

जो सामनेवाले पेड़ पर बैठी है,

बंद कर दिया है उसने चहचहाना,

उसे तन्मयता से सुनना है 

कोयल का राग. 


कोयल सोचती है,

उसे गाते रहना होगा 

इंसानों के लिए नहीं,

तो चिड़ियों के लिए ही सही. 


9 टिप्‍पणियां:

  1. सच कहा आपने। जीवन एक सपाट पथ की भांति है, बस बढते जाना है। कोई साथ दे या न दे। इसी में मुक्ति है और यही चक्र भी।

    बहुत-बहुत शुभकामनाएँ आदरणीय ओंकार जी।

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  2. कोयल के माध्यम से कर्म पथ पर चलने की प्रेरणा देती शानदार रचना ।

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  3. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (२१-०४-२०२१) को 'प्रेम में होना' (चर्चा अंक ४०४३) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

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  4. बहुत कमाल के भाव ... अच्छी रचना ...

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  5. अति सुंदर सृजन,सादर नमन आपको

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  6. बहुत सुन्दर।
    --
    श्री राम नवमी की हार्दिक शुभकामनाएँ।
    --
    मित्रों पिछले तीन दिनों से मेरी तबियत ठीक नहीं है।
    खुुद को कमरे में कैद कर रखा है।

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  7. कोयल सोचती है,
    उसे गाते रहना होगा
    इंसानों के लिए नहीं,
    तो चिड़ियों के लिए ही सही.
    लाजवाब भावाभिव्यक्ति।

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  8. वाह,बहुत सुंदर भावपूर्ण अभिव्यक्ति ।

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