शनिवार, 20 फ़रवरी 2021

५३६. मृत्य के बाद




ज़िन्दगी भर मैं हिन्दू बना रहा,

पर ज़रूरी नहीं कि मृत्यु के बाद 

मेरा शरीर भी सिर्फ़ हिन्दू बना रहे.


मेरी मौत के बाद 

मेरा शरीर थोड़ा जला देना,

थोड़ा दफना देना,

थोड़ा चील-कौवों को खिला देना.


मैं चाहता हूँ 

कि मौत के बाद 

मैं सिर्फ़ हिन्दू न रहूँ,

मुस्लिम, ईसाई, पारसी 

जैन और सिख भी बन जाऊं.


जो काम मैं ख़ुद न कर सका,

अपने बेजान शरीर से कराना चाहता हूँ.

17 टिप्‍पणियां:

  1. ये बात भी एक हिन्दू ही सोच सकता है ।।गहन अभिव्यक्ति

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  2. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" सोमवार 22 फरवरी 2021 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  3. गहन और हृदयस्पर्शी भावाभिव्यक्ति ।

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  4. वाह!!क्या बात है ,बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति ।

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  5. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (23-2-21) को 'धारयति इति धर्मः'- (चर्चा अंक- 3986) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    --
    कामिनी सिन्हा

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  6. आपको हिंदू बने रहने की कोई बाध्यता नहीं है. तत्काल हिंदू धर्म छोड़ दीजिए.

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  7. विचारोत्तेजक कविता...

    हार्दिक शुभकामनाएं 🙏

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  8. संगीता जी की बात बहुत खूब रही, आपकी रचना भी कमाल की सोच लिए हुए है ,वाकई भारत धर्म निर्पेक्ष देश है , जहाँ इंसान के विचार इतने ऊँचे है कि वो चाहे जिस धर्म से जुड़ा हुआ हों,लेकिन उसके मन में सम्मान सभी धर्म के लिए समान रूप से है , मन खुश हो गया आपकी रचना को पढ़कर , मेरी भी यही धारणा है ,धर्म तो जन्म से जुड़े हुए हैं , मगर इस दुनिया में हम इंसान पहले है , क्या बात है , इस रचना की जितनी तारीफ की जाये कम है, क्योंकि इस तरह के विचारों वाले लोग बहुत ही कम होते है ।आपका हार्दिक आभार सादर नमन

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  9. ऐसी सोच एक रचनाकार ही रख सकता है।
    सादर नमन।

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  10. मेरे मन की बात कही है आपने ओंकार जी । ऐसी सोच रामकृष्ण परमहंस जी की थी । बहुत अच्छा लगा पढ़कर ।

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  11. जोकाम मैं ख़ुद न कर सका,
    अपने बेजान शरीर से कराना चाहता हूँ.!!!
    निशब्द!!!!

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